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बरेली में मृतप्राय हो चुका है विपक्ष, महंगाई-बेरोजगारी और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर आंदोलन की नहीं जुटा पा रहे हिम्मत, आम आदमी रो रहा है और विपक्ष सो रहा है 

नीरज सिसौदिया, बरेली
एक सशक्त विपक्ष मजबूत लोकतंत्र का आधार होता है. जनता जब सरकारी नीतियों से त्रस्त होती है तो उसे विपक्ष से यह उम्मीद होती है कि उसकी बात को सत्ता पक्ष तक विपक्ष बेहतर तरीके से पहुंचाएगा. यदि फिर भी बात नहीं बनी तो सड़कों पर उतरकर आंदोलन करने से भी पीछे नहीं हटेगा. लेकिन बरेली में इन दिनों जो हालात देखने को मिल रहे हैं उससे लगता है कि विपक्ष की अवधारणा ही दम तोड़ चुकी है. पेट्रो मूल्य वृद्धि, बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे अब विपक्ष के लिए कोई मायने नहीं रखते. महानगर कांग्रेस अध्यक्ष अजय शुक्ला के नेतृत्व में तो फिर भी कभी कभी सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन देखने को मिल जाता है लेकिन समाजवादी पार्टी तो जैसे सभी मुद्दों से किनारा कर चुकी है. कोरोना काल में हुई लूट खसोट, अव्यवस्था और विभिन्न मुद्दों पर भी सपा और बसपा कोई बड़ा आंदोलन खड़ा नहीं कर सकीं जिससे जनता को राहत मिल सके और सरकार पर लगाम लगाई जा सके. इतना भयभीत और निष्क्रिय विपक्ष शायद ही इतिहास में पहले कभी देखने को मिला होगा.

एक दौर था जब बात-बात पर आंदोलन हुआ करते थे और सरकार अपने गलत फैसलों को वापस लेने पर मजबूर हो जाया करती थी. पुलिस एक आंदोलनकारी को गिरफ्तार करती थी तो प्रदेश भर में जेल भरो आंदोलन हो जाया करते थे. आखिरकार सत्ता को झुकना पड़ता था और जनहित की लड़ाई लड़ने वाले विपक्ष की जीत होती थी. तब न लाठियों का डर होता था और न ही जेल जाने का. गलत नीतियों पर समझौता तो किसी नामुमकिन सपने जैसा हुआ करता था पर आज डरा सहमा विपक्ष अपनों की लड़ाई लड़ने से भी घबरा रहा है. जेल जाने के डर से जनहित के मुद्दे तक नहीं उठा पा रहा है. ऐसा विपक्ष कौन सा क्रांतिकारी काम करेगा इसका अंदाजा खुद ब खुद लगाया जा सकता है.

कुछ दिनों पूर्व एक अस्पताल की लूट खसोट के खिलाफ पार्टी के महानगर महासचिव गौरव सक्सेना ने आवाज बुलंद की थी. चूंकि अस्पताल भाजपा नेता का था इसलिए गौरव सक्सेना का आंदोलन एकदिवसीय पब्लिसिटी स्टंट तक ही सीमित रह गया. सीएमओ के कहने के बावजूद गौरव सक्सेना न तो उस अस्पताल के खिलाफ लिखित शिकायत देने की हिम्मत जुटा पाए और न ही समाजवादी पार्टी इस मुद्दे को जनांदोलन में तब्दील करने की हिम्मत जुटा सकी. सपा के पूर्व जिला महासचिव एवं जिला सहकारी संघ के पूर्व अध्यक्ष महेश पांडेय ने जरूर इसकी शिकायत की लेकिन पार्टी नेताओं का उन्हें कोई साथ नहीं मिला. इतने बड़े मुद्दे पर विपक्ष ने एक बैठक तक करना मुनासिब नहीं समझा. न जाने कितने लोग इस लूट के शिकार बने होंगे. अगर विपक्ष इस मुद्दे को आंदोलन का रूप देने में सफल होता तो एक बड़ी आबादी को अस्पतालों की लूट खसोट से निजात मिल सकती थी पर ऐसा नहीं हुआ. नतीजतन जनहित का एक बड़ा मुद्दा दफन हो गया.
यह तो एक उदाहरण मात्र है. समाजवादी पार्टी इन दिनों सैनेटाइजेशन अभियान को लेकर चर्चा में है. विपक्ष के इस कार्य की जगह-जगह सराहना भी हो रही तो कई जगहों पर भर्त्सना भी की जा रही है. पार्टी के ही कुछ नेताओं का मानना है कि सैनेटाइजेशन करना या राशन वितरण करके फोटो खिंचवाकर अखबारों में सुर्खियां बटोरने का काम विपक्ष का नहीं बल्कि नए नए समाजसेवियों का होता है. अगर सैनेटाइजेशन की वाकई आवश्यकता थी तो विपक्ष को अपने आंदोलन के माध्यम से नगर निगम और मेयर की नाक में इतना दम कर देना चाहिए था कि नगर निगम घर-घर जाकर सैनेटाइजेशन अभियान चलाने को मजबूर हो जाता. हालांकि नगर निगम ने सैनेटाइजेशन अभियान चलाया भी और पार्षदों ने अपने स्तर पर भी अभियान चलाया.
जनता का कहना है कि विपक्ष बुरी तरह भयभीत है इसलिए जनहित के मुद्दों को आंदोलन का रूप देने से घबरा रहा है. कुछ लोगों का मानना है कि योगी सरकार के कार्यकाल में जिस तरह से सपा नेताओं के खिलाफ मुकदमे दर्ज कर उन्हें जेल में डाला गया है उससे विपक्षी भयाक्रांत हो चुके हैं क्योंकि कहीं न कहीं कुछ विपक्षियों के दामन भी दागदार हैं. वहीं कुछ सपा नेताओं का कहना है कि हम आंदोलन तो करते मगर योगी सरकार ने फिलहाल किसी भी प्रकार के आंदोलन पर रोक लगा रखी है. अगर आंदोलन होगा तो सरकार की पुलिस उन्हें जेल में डाल देगी. हैरानी की बात है कि जो समाजवादी कभी जनता के लिए सिर पर कफन बांध कर निकलता था आज वह पुलिस की लाठियों के डर जनहित के मुद्दे उठाने से भी कतरा रहा है. यह कैसा समाजवाद है जो सत्ता में रहकर मलाई तो खाना चाहता है पर विपक्ष में बैठने पर जनहित के मुद्दों के लिए पुलिस की मार से घबराता है. चूंकि समाजवादी पार्टी इस समय मुख्य विपक्षी पार्टी है इसलिए जनता को उम्मीदें भी समाजवादियों से ही थीं कि मुश्किल घड़ी में जरूरत पड़ने पर ये समाजवादी उसके लिए सड़कों पर उतरकर आंदोलन करने से भी पीछे नहीं हटेंगे लेकिन आज आम आदमी रो रहा है और समाजवादी अपने-अपने घरों में सो रहा है. समाजवादी नेता सिर्फ फेसबुकिया शेर बनकर रह गए हैं. ट्विटर पर लोकतांत्रिक क्रांति की बात की जा रही है, सोशल मीडिया पर तरह-तरह की बातें लिखी जा रही हैं पर सड़कों पर उतरकर जनता की लड़ाई लड़ने का माद्दा किसी में नहीं है. जनता का कहना है कि इससे बेहतर तो भाजपाई थे जो विपक्ष में रहते हुए जनता की आवाज बुलन्द करने की हिम्मत तो रखते थे. क्या वाकई बरेली में समाजवादी पार्टी इतनी कमजोर हो चुकी है कि वह जनांदोलन से घबरा रही है? क्या ऐसी पार्टी को जनता सत्ता की चाबी सौंपेगी जो विपक्ष में रहकर जनता की ही आवाज नहीं उठा पा रही? क्या समाजवादी पार्टी के स्थानीय नेता इतने लाचार हो चुके हैं कि वे महंगाई, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, बिजली, पानी, सड़क, सीवर, सफाई, स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर भी जनांदोलन करने से घबराते हैं? निश्चित तौर पर विपक्ष इतना कमजोर कभी नहीं था. बरेली में आज विपक्ष की जो हालत है उसे देखकर स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि यह विपक्ष वर्ष 2022 में बरेली से जीत की हकदार तो बिल्कुल भी नहीं है. अपनी हार की इबारत समाजवादी खुद ही लिख रहे हैं. अब भी वक्त है, समाजवादी पार्टी को विपक्ष के रूप में अपनी भूमिका और उपयोगिता पर मंथन करना होगा. इतिहास गवाह है कि जनांदोलन ने बड़े बड़े तख्त पलटकर रख दिए हैं. समाजवादियों को फिर से वही पुराने तेवर अपनाने होंगे जिनके बल पर कभी उसने एकछत्र राज किया था.

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