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बदलते राजनीतिक समीकरणों की सबसे बड़ी प्रयोगशाला बनी फरीदपुर विधानसभा सीट, विजयपाल सिंह की राह में कांटे ही कांटे, बढ़ता विरोध सपा के लिए बना सिरदर्द, यादव, जाटव और मुस्लिम असंतोष तक ने बिगाड़ा विजयपाल का सियासी गणित, पढ़ें क्या कहते हैं मौजूदा सियासी हालात?

नीरज सिसौदिया, बरेली
बरेली जिले की फरीदपुर विधानसभा सीट पर समाजवादी पार्टी की राजनीति इस समय सबसे ज्यादा दो चेहरों के इर्द-गिर्द घूम रही है। इनमें एक हैं- चंद्रसेन सागर और दूसरे विजयपाल सिंह। कभी फरीदपुर में सपा का मजबूत चेहरा माने जाने वाले विजयपाल सिंह अब धीरे-धीरे पार्टी के लिए सबसे बड़ी राजनीतिक उलझन बनते जा रहे हैं। लगातार तीन विधानसभा चुनाव हारने के बाद भी वह टिकट की दौड़ में बने रहना चाहते हैं, लेकिन जमीन पर बन रहे हालात यह संकेत दे रहे हैं कि इस बार उनकी राह पहले से कहीं ज्यादा कठिन हो चुकी है। पार्टी के भीतर बढ़ता विरोध, यादव और जाटव समाज की नाराजगी, मुस्लिम वोटरों में पनपता असंतोष, सत्ता में आने पर पुलिसवालों को पेशाब पिलाने की धमकी और बाहर से सक्रिय हो रहे कई राजनीतिक खिलाड़ी विजयपाल सिंह की दावेदारी को लगातार कमजोर कर रहे हैं। यही वजह है कि अब फरीदपुर की राजनीति में यह सवाल तेजी से उठने लगा है कि क्या समाजवादी पार्टी चौथी बार भी विजयपाल सिंह पर दांव लगाने का जोखिम उठाएगी।
फरीदपुर में जाटव समाज से आने वाले विजयपाल सिंह की मुश्किलों की सबसे बड़ी वजह अब उनका अपना सामाजिक आधार ही बनता दिखाई दे रहा है। समाजवादी पार्टी की राजनीति लंबे समय से यादव-मुस्लिम समीकरण पर टिकी रही है, लेकिन फरीदपुर में अब यादव समाज का बड़ा हिस्सा विजयपाल सिंह से दूरी बनाता नजर आ रहा है। पिछले दिनों पार्टी प्रभारी की मौजूदगी में हुई बैठक में जिस तरह यादव नेताओं ने खुलकर विजयपाल सिंह के खिलाफ नाराजगी जताई, उसने पार्टी नेतृत्व को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है। स्थानीय स्तर पर कई यादव नेता यह मानते हैं कि लगातार हार के बावजूद विजयपाल सिंह को आगे करना पार्टी के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है। यही कारण है कि गांव-गांव में यादव समाज के बीच अब नए चेहरे की मांग सुनाई देने लगी है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि अगर यादव वोट पूरी मजबूती से सपा के साथ नहीं रहा तो फरीदपुर सीट पर पार्टी की स्थिति बेहद कमजोर हो सकती है।
वहीं, दूसरी ओर जाटव समाज में भी विजयपाल सिंह को लेकर उत्साह दिखाई नहीं दे रहा। फरीदपुर का चुनावी इतिहास बताता है कि यहां जाटव वोट किसी भी उम्मीदवार का खेल बना और बिगाड़ सकता है। इस बार यही जाटव वोट विजयपाल सिंह की सबसे बड़ी चिंता बनता जा रहा है। इसकी एक वजह हैं ब्रह्मस्वरूप सागर। ब्रह्मस्वरूप सागर पिछले विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी का हिस्सा थे और टिकट की प्रबल दावेदारी कर रहे थे। लेकिन जब पार्टी ने उन्हें नजरअंदाज कर विजयपाल सिंह को उम्मीदवार बना दिया तो उन्होंने पूरी ताकत से विजयपाल सिंह का विरोध किया। राजनीतिक गलियारों में आज भी चर्चा होती है कि पिछले चुनाव में विजयपाल सिंह की हार के पीछे ब्रह्मस्वरूप सागर की रणनीति ने भी बड़ी भूमिका निभाई थी।
अब हालात पहले से ज्यादा बदल चुके हैं। ब्रह्मस्वरूप सागर अब आजाद समाज पार्टी कांशीराम का हिस्सा हैं और चंद्रशेखर आजाद का बढ़ता राजनीतिक प्रभाव उनके लिए नई ताकत बन चुका है। फरीदपुर के जाटव समाज में चंद्रशेखर आजाद की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है और इसका सीधा असर सपा के पारंपरिक वोट बैंक पर पड़ सकता है। ब्रह्मस्वरूप सागर संगठन के मजबूत खिलाड़ी माने जाते हैं। वह लंबे समय से क्षेत्र में सामाजिक और राजनीतिक नेटवर्क तैयार करते रहे हैं। माना जा रहा है कि अगर विजयपाल सिंह को दोबारा टिकट मिलता है तो ब्रह्मस्वरूप सागर पूरी ताकत से उनके खिलाफ मोर्चा खोल सकते हैं। हालांकि उनका लक्ष्य चुनाव लड़ना नहीं, बल्कि विजयपाल सिंह को राजनीतिक रूप से कमजोर करना है।
फरीदपुर में जाटव राजनीति की एक और कड़ी हैं हरीश लाखा। हरीश लाखा जमीन कारोबार से जुड़े बताए जाते हैं और लंबे समय से क्षेत्र में अपनी राजनीतिक जमीन तैयार कर रहे हैं। सपा के भीतर वह खुद को टिकट का दावेदार मानते हैं। अगर पार्टी उन्हें नजरअंदाज करती है और विजयपाल सिंह पर भरोसा जताती है तो वह भी समीकरण बिगाड़ सकते हैं। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि फरीदपुर में चुनाव सिर्फ पार्टी के सिंबल पर नहीं, बल्कि स्थानीय सामाजिक समीकरणों पर ज्यादा लड़ा जाता है। ऐसे में अगर जाटव समाज का प्रभावशाली हिस्सा अलग रुख अपनाता है तो इसका नुकसान सीधे सपा को होगा।
इसी कड़ी में शालिनी सिंह का नाम भी काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पिछले विधानसभा चुनाव में जब उन्हें सपा से टिकट नहीं मिला था तो उन्होंने बसपा के टिकट पर चुनाव लड़कर जाटव वोटों में सेंध लगा दी थी। उस चुनाव में जाटव वोटों का बंटवारा विजयपाल सिंह की हार की बड़ी वजह माना गया था। अब एक बार फिर राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि अगर इस बार भी हालात वैसा ही बने तो शालिनी सिंह फिर अलग रास्ता अपना सकती हैं। यही कारण है कि विजयपाल सिंह के समर्थकों की चिंता लगातार बढ़ रही है।
फरीदपुर की राजनीति में एक और नाम तेजी से चर्चा में है और वह हैं जयप्रकाश भास्कर। धोबी समाज से आने वाले जयप्रकाश भास्कर कभी समाजवादी पार्टी का हिस्सा थे और उन्हें पूर्व मंत्री अता उर रहमान का करीबी माना जाता था। पिछले चुनाव में अता उर रहमान उन्हें फरीदपुर से टिकट दिलाना चाहते थे, लेकिन टिकट विजयपाल सिंह को मिल गया। इसके बाद जयप्रकाश भास्कर ने सपा छोड़ दी और अपनी अलग राजनीतिक राह चुन ली। यहां तक कहा जाता है कि उनकी सर्वजन आम पार्टी का गठन ही विजयपाल सिंह की राजनीतिक ताकत कम करने के मकसद से किया गया।
पिछले पांच वर्षों में जयप्रकाश भास्कर लगातार क्षेत्र में सक्रिय रहे हैं। भले ही उनकी पार्टी बहुत बड़ा चुनावी असर पैदा करने की स्थिति में न हो, लेकिन वह जाटव और धोबी समाज के दो-ढाई हजार वोटों में सेंध लगाने की क्षमता रखते हैं। खासतौर पर अगर विजयपाल सिंह उम्मीदवार बनते हैं तो डेढ़-दो हजार वोट भी चुनावी तस्वीर बदल सकते हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर सपा किसी नए चेहरे को मौका देती है तो यादव और जाटव वोटों का बिखराव काफी हद तक रुक सकता है, लेकिन विजयपाल सिंह के नाम पर यह खतरा लगातार बना रहेगा।
इन सबके बीच फरीदपुर में सबसे ज्यादा तेजी से उभरता और सबसे पुराना विश्वसनीय चेहरा हैं पांच बार के विधायक स्वर्गीय सियाराम सागर के छोटे भाई और दो बार के ब्लॉक प्रमुख रहे चंद्रसेन सागर। चंद्रसेन सागर ने राजनीति से ज्यादा सामाजिक अभियानों के जरिए अपनी पहचान बनाई है। उन्होंने गांव-गांव जाकर 10वीं और 12वीं के हजारों विद्यार्थियों को सम्मानित करने और पुरस्कृत करने का अभियान शुरू किया। इस अभियान का असर सिर्फ छात्रों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उनके परिवारों तक पहुंच गया। तपती गर्मी में गांव-गांव जाकर बच्चों को सम्मानित करने की उनकी शैली ने हर जाति और वर्ग के लोगों का ध्यान खींचा है।
आज हालात यह हैं कि फरीदपुर के गांवों में चंद्रसेन सागर का नाम सिर्फ जाटव समाज तक सीमित नहीं रहा। यादव, ठाकुर, मुस्लिम और अन्य वर्गों में भी उनकी चर्चा हो रही है। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि उन्होंने जातीय राजनीति से ऊपर उठकर अपनी अलग पहचान बनाने की कोशिश की है। जून में उनका यह अभियान दोबारा शुरू होने वाला है और माना जा रहा है कि इससे उनकी लोकप्रियता और बढ़ सकती है। यही वजह है कि अब फरीदपुर में कई लोग चंद्रसेन सागर को भविष्य के मजबूत राजनीतिक चेहरे के तौर पर देखने लगे हैं। एक दौर था जब चंद्रसेन सागर ब्लॉक प्रमुख थे तो विजयपाल सिंह उस वक्त उत्तर प्रदेश में सत्तारूढ़ बहुजन समाज पार्टी से विधायक हुआ करते थे। उस वक्त विजयपाल सिंह ने चंद्रसेन सागर को ब्लॉक प्रमुख पद से हटाने के लिए पूरी ताकत झोंक दी थी लेकिन चंद्रेसन सागर कोर्ट से जीत गए थे और विजयपाल सिंह उन्हें हटा नहीं पाए थे। चंद्रसेन सागर के जेहन में आज भी इस बात की नाराजगी बरकरार है। अगर सपा विजयपाल सिंह को उम्मीदवार बनाती है तो जाहिर है कि अपने राजनीतिक धुर विरोधी को हराने में जाटव समाज से आने वाले चंद्रसेन सागर भी कोई कसर नहीं छोड़ने वाले।
दूसरी तरफ विजयपाल सिंह अब जमीन पर कम और संगठन के भीतर ज्यादा सक्रिय दिखाई दे रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक, उन्हें एहसास हो चुका है कि फरीदपुर में उनकी स्थिति पहले जैसी नहीं रही। उनके कार्यक्रमों की खाली कुर्सियां इसकी गवाही पहले भी दे चुकी है। इसलिए अब वह पार्टी नेतृत्व और संगठन के प्रभावशाली नेताओं को साधने में जुटे हैं। बताया जा रहा है कि वह सपा के नए जिला अध्यक्ष शुभलेश यादव के साथ भी नजदीकियां बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं ताकि टिकट वितरण के समय उनकी पैरवी मजबूत हो सके।
पार्टी के अंदर यह चर्चा भी है कि विजयपाल सिंह के कुछ करीबी नेता शुभलेश यादव के भी करीबी माने जाते हैं और उसी रिश्ते के सहारे विजयपाल अपनी दावेदारी मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि शुभलेश यादव को समझदार नेता माना जाता है और वह सिर्फ व्यक्तिगत संबंधों के आधार पर पार्टी हाईकमान को गुमराह करने वालों में नहीं गिने जाते। लेकिन राजनीति में समीकरण तेजी से बदलते हैं और यहां “दुश्मन का दुश्मन दोस्त” वाली स्थिति भी बन सकती है, क्योंकि शुभलेश यादव के विरोधी माने जाने वाले कुछ नेता विजयपाल सिंह के भी कट्टर विरोधी हैं।
बताया यह भी जा रहा है कि विजयपाल सिंह अखिलेश यादव की कोर टीम के कुछ नेताओं से भी संपर्क साधने में लगे हैं ताकि किसी तरह टिकट की दौड़ में खुद को मजबूत बनाए रख सकें। लेकिन राजनीतिक जानकारों का कहना है कि सिर्फ संगठनात्मक पैरवी से अब फरीदपुर की जमीनी हकीकत नहीं बदली जा सकती। क्षेत्र में लगातार बढ़ती नाराजगी और अलग-अलग सामाजिक समूहों की दूरी उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती बन चुकी है।
फरीदपुर की राजनीति इस समय जिस मोड़ पर खड़ी है, वहां समाजवादी पार्टी के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या वह एक बार फिर विजयपाल सिंह पर भरोसा करेगी या नहीं? क्योंकि अगर पार्टी फिर पुराने समीकरणों के सहारे चुनाव में उतरती है तो इसका फायदा भाजपा को मिल सकता है। यही कारण है कि अब फरीदपुर सीट सिर्फ एक विधानसभा सीट नहीं, बल्कि समाजवादी पार्टी के अंदर बदलते राजनीतिक समीकरणों की सबसे बड़ी प्रयोगशाला बनती जा रही है।

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