विचार

सेवानिवृत्ति दूसरी पारी की शुरुआत है…

अभी भी छूने को ऊपर ऊंचा आसमान है। एक वरिष्ठ नागरिक का अनुभव महान है।। सेवानिवृत्ति तो अंत नहीं है इस जीवन का। इसके बाद भी बहुत काम पहचान सम्मान है।। हर वरिष्ठ नागरिक अनुभव की खान होता है। अपने में ज्ञान समेटे एक वरदान होता है।। समाज का होता है वह एक पथ प्रदर्शक। […]

यूपी

काला धन भी उजला होकर डोलेगा

अपनेपन का नाटक करने वालों का, कच्चा चिट्ठा कौन भला अब खोलेगा मानवता की सेवा में चतुराई से, काला धन भी उजला होकर डोलेगा। जनहित की बातों का तो अब क्या कहना, झूठे वादों में फँसकर पीड़ा सहना बनीं योजनाएँ जाने किसके हित में, निर्बल को तो बस आँसू पीकर रहना समरसता में भेद-भाव जब […]

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आज माफिया की चलती है

पता नहीं है कौन कहाँ पर, हाय मवाली अब कहलाए आज माफिया की चलती है, जो सज्जन का दिल दहलाए। हुई व्यवस्था ध्वस्त यहाँ पर, सत्ता का मुँह भला क्यों सिला बनकर क्यों मौसेरा भाई, चोर- चोर से खूब अब मिला फँसा मुचलका पाबंदी में, सद्भावों को जो सहलाए आज माफिया की चलती है, जो […]

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लौट कर फिर वही दिन आयेंगे…

बचो और बचाओ यही आज वक़्त की जरूरत है। बच्चे बड़े घर पर ही रहें सुरक्षा की एक सूरत है।। कभी दिखें लक्षण कॅरोना के तुरंत करवायें टेस्ट। यह महा दैत्य. कॅरोना यमराज ही की एक मूरत है।। दूर जरूर रहें पर संवेदनाये कभी हमारी शून्य न हों। जरूर है संकट पर दिल से दिल […]

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वो होता विजेता जिसको संघर्ष स्वीकार होता है

विचारों से ही कर्म का निर्माण होता है। कर्म से ही परिणाम का भान होता है।। विचार श्रेष्ठता बहुत जरूरी है जीवन में। कर्मानुसार ही उत्पन्न जीवन ज्ञान होता है।। कामयाबी चाहिये संघर्ष से घबराना नहीं। सफलता के लिये धूप से दूर जाना नहीं।। छाँव मिलते ही तो कदम ठहर जाते हैं। कदापि विश्वास को […]

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योग दिवस पर विशेष : करो योग रहो निरोग

योग से काया मनुष्य हो निरोगी स्वास्थ्य ये लाया योग करता दृढ़ता है बढ़ती रोग हटता योग आहार शुद्ध होते विचार स्वस्थ आकार अक्षय ऊर्जा योग भगाये रोग बचता खर्चा योग का मार्ग स्वास्थ्य और संयम ये रोग भाग योग से बल योग से आत्मबल शरीर चल निरोगी काया भोग विलास दूर योग की माया […]

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डा. निशा शर्मा की कविताएं : चांद तारों का रौशन जहाँ चाहिए…

चांद तारों का रौशन जहाँ चाहिए उस जहाँ में मगर मुझको तू चाहिए जिंदगी में मेरी हाँ कमी न कोई बिन तेरे जिन्दगानी नहीं चाहिए रोज आना तेरा, मुस्कुराना तेरा राब्ता अब मुकम्मल मुझे चाहिए तू तो मशहूर है दिल्लगी के लिये ज़िक्र अपना जुबाँ से तेरी चाहिये माना दुनिया है तारों की रौशन मगर […]

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प्रमोद पारवाला की कविताएं : “सागर’

हे।जलधि तुम मौन क्यों हो कुछ तो बोलो ज्वार बनकर विष धरणी का खींच लो। कालकूट भी तो तुम्ही ने था उगला, नीलकण्ठ ने ही तो जिसको था निगला। क्यों न तुम ही इस विषाणु का अन्त करो, विष को ही महाविष से अब हन्त करो। हर लो जगत की तुम सभी आपदाएं, रात दिन […]

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प्रमोद पारवाला की कविताएं : ‘बदलते परिवेश’

भोर के उजाले में, पंछियों का कलरव है, आज पता चला है।। निर्मल लहरों के संग , नदियाँ भी गाती हैं, आज पता चला है। उजला-उजला सा गगन, लगे नील वितान है, आज पता चला है। श्रंग से पर्वत लगे, ज्यूं चूमने व्योम हैं, आज पता चला है। वृक्षों से श्वासों का , नाता अब […]

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न मानी कभी बात माँ- बाप की

कहानी बनी आज संताप की, कड़ी अब जुड़ी वार्तालाप की न मानी कभी बात माँ-बाप की, चलें आज गठरी लिए पाप की। भरी ऐंठ इतनी न कुछ भी सुना, कहा कुछ किसी ने उसी को धुना लड़ी आँख जिससे उसे ही चुना, मगर प्यार का जाल ऐसा बुना बने फिर कहीं वह कभी आपकी, रखी […]