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प्रमोद पारवाला की कविताएं : “हिंदी दिवस’

एक ही अर्थ है दोनों के ही , बिंदी , हिंदी भाषा के, एक सजती माथे जन-जन के, दूजी भारत-माता के। मन की अभिव्यक्ति की भी तो , यह ही माध्यम बनती है, प्रेम,स्नेह,श्रद्धा शब्दों में, यह ही व्यंजित करती है। कितनी समृद्ध,स्नेहमयी सी, यही पुरातन भाषा है, भावों की कर सरल व्यंजना, जन-मन भरती […]

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फादर्स डे’ पर विशेष : ‘जनक’

बरगद जैसी छाया में, हम सब सुख से रहते हैं। और जटा सी बाँहों में, सदा झूलते रहते हैं। अंधेरी रात में भी वह, सुधाकर से चमकते हैं। भविष्य की राह में भी वह, दिवाकर से विलसते हैं। जलधि जैसे गम्भीर हैं, अम्बर जैसी विशालता पाहन ह्र्दय में है निहित, भरी ममता सी कोमलता कभी […]

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प्रमोद पारवाला की कविताएं : “सागर’

हे।जलधि तुम मौन क्यों हो कुछ तो बोलो ज्वार बनकर विष धरणी का खींच लो। कालकूट भी तो तुम्ही ने था उगला, नीलकण्ठ ने ही तो जिसको था निगला। क्यों न तुम ही इस विषाणु का अन्त करो, विष को ही महाविष से अब हन्त करो। हर लो जगत की तुम सभी आपदाएं, रात दिन […]

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प्रमोद पारवाला की कविताएं : ‘बदलते परिवेश’

भोर के उजाले में, पंछियों का कलरव है, आज पता चला है।। निर्मल लहरों के संग , नदियाँ भी गाती हैं, आज पता चला है। उजला-उजला सा गगन, लगे नील वितान है, आज पता चला है। श्रंग से पर्वत लगे, ज्यूं चूमने व्योम हैं, आज पता चला है। वृक्षों से श्वासों का , नाता अब […]

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प्रमोद पारवाला की कविताएं : कलमवीर

जान हथेली पर रखकर भी, जो तिनका- तिनका बीनते हैं। सत्य के उजाले मे ही वे, झूठ का मुखौटा छीनते है। अपनी खबर नहीं है उनको, दुनिया की खबरें बुनते हैं। पाताल लोक मे भी जाकर, खबरों के मोती चुनते हैं। हम एक धुरी पर बैठे ही, दुनिया की सब खबरें पाते। अगर न होते […]

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प्रमोद पारवाला की कविताएं- ‘अनुभूति’

कब दिन निकला कब रात हुई, हम समझ भी नहीं पाते हैं। बच्चों का कलरव सुनने को, यह कान तरस से जाते हैं। हर ओर कराहट जीवन की, एक स्वर हमारा शामिल है। मृत्यु से जंग भी जारी है, फिर भी न हमें कुछ हासिल है। कोरोना तू तो अकेला है पर उनके तो घरवाले […]

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9 मई मदर्स डे पर विशेष “मां”

मां के आंचल की छाया में, चैन की नींद सो जाते थे। मां कब जागी मां कब सोई, हम यह भी जान न पाते थे। दूध लिये बस आगे पीछे, सौ नखरे भी उठाती थी। “चूहा खाना खा जायेगा,’ यह कहकर रोज खिलाती थी। किसी बात से डर लगता था, झट माँ की गोद में […]

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मजदूर दिवस पर विशेष : सिसकती जिंदगी…

नैनों में अविरल धारा है , मुख पर करुणा सी सिसक रही। है धंसी हुई आंखें जिनमें, गाथा अतीत की थिरक रही। पलकों में कुछ भारीपन सा, दारिद्रय दिखाते मलिन वसन । माथे पर झुर्री पड़ी हुई, है यौवन में भी जर्जर तन। मलिन वसन के अवगु्ठनमें, छिपा हुआ शशि सा मुखड़ा। दिल में है […]

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बदल गए हैं होली के रंग, इस बार मनाएं परंपराओं के संग, होली के विभिन्न रंगों की गहराई बता रही हैं साहित्यकार प्रमोद पारवाला

मन झूम रहा बिन बादल के, होली के रंग कुछ यूं बरसे। नैनों से मदिरा यूं छलकी , ज्यों मद के प्याले हों छलके । होली का नाम लेते ही रंग में सराबोर, भंग की मस्ती में झूमते, नाचते लोग स्मृति पटल पर उभर आते हैं और गुझिया का स्वाद भी अनायास ही मुंह में […]

इंटरव्यू

महिला दिवस पर विशेष : गुमनामी के अंधेरे में साहित्य का सितारा ‘प्रमोद पारवाला’

नीरज सिसौदिया, बरेली  स्याही की एक बूंद भी लाखों लोगों को विचारमग्न कर देती है. यही वजह है कि समाज के सृजन में साहित्य की अहम भूमिका रहती है. साहित्य जहां समाज का दर्पण होता है वहीं, समाज को एक दिशा भी देता है. फिर चाहे क्रांति हो या प्यार एक कलमकार हर किरदार बाखूबी […]