नई दिल्ली। जिमनास्टिक के क्षेत्र में फिलहाल भारत के नाम बस गिनी-चुनी उपलब्धियां ही दर्ज हैं। लेकिन पिछले कुछ समय में जिस तरह से भारतीय जिमनास्ट अपने प्रदर्शन में सुधार कर रहे हैं वह भविष्य के लिए एक शुभ संकेत कहा जा सकता है। आशीष कुमार और दीपा करमाकर के बाद हैदराबाद की अरुणा बुद्धा रेडी भारत की नई उम्मीद बनकर उभरी हैं। विश्व कप में कांस्य पदक जीतकर अरुणा ने यह साबित कर दिया है कि जिमनास्टिक के क्षेत्र में भी भारत नए आयाम गढ़ सकता है।
22 साल की अरुणा ने महिला बोर्ड स्पर्धा के फाइनल में 13.6449 अंक का स्कोर बनाकर पदक हासिल किया। फाइनल में अरुणा ने काफी अच्छी शुरुआत की उन्होंने 4.600 लेवल की मुश्किल ऊंचाई पर शानदार प्रदर्शन करते हुए 9.066 अंक हासिल किए। अरुणा ने शुक्रवार को 2 दिन तक चले क्वालीफाइंग मुकाबलों के बाद फाइनल में जगह बनाई थी वह क्वालीफाइंग में दूसरे स्थान पर रही थीं। दरअसल भारत में जिमनास्टिक पर और जिमनास्टिक से जुड़े खिलाड़ियों पर इतना ध्यान नहीं दिया जाता कि वह अन्य देशों का मुकाबला कर सकें। उचित प्रशिक्षण के अभाव में हमारे खिलाड़ी पदकों से महरूम रह जाते हैं। दरअसल भारत में क्रिकेट को छोड़ दें तो अन्य खेलों के लिए पर्याप्त इंफ्रास्ट्रक्चर उपलब्ध नहीं है। साथ ही उचित प्रशिक्षण के लिए भी कोई व्यवस्था नहीं की गई है। कुछ सालों में बॉक्सिंग और रेसलिंग के मामले में भारत ने अपने नाम उपलब्धियां दर्ज कराई तो भारतीय रहनुमाओं का ध्यान इस ओर गया। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या उपलब्धियां दर्ज कराने के बाद ही हमारे खिलाड़ियों को पर्याप्त संसाधन दिलाने की ओर ध्यान दिया जाएगा। प्रतिभाओं को निखारने के लिए हम कोई प्रयास क्यों नहीं करते। अरुणा ने कांस्य पदक ही क्यों जीता वह गोल्ड भी जीत सकती थी। लेकिन शायद उसे उस स्तर का प्रशिक्षण नहीं मिला जिसके चलते वह नाकामयाब हो गई। अरुणा ने जो कुछ भी हासिल किया वह अपने दम पर हासिल किया। अगर उसे थोड़ा सा साथ मिला होता तो वह और बेहतर कर सकती थी। भारतीय खेलों के स्तर में दिन-ब-दिन सुधार हो रहा है। फिलहाल इसमें अभी और सुधार की जरूरत है।

अरुणा की जीत से बदलेगा जिमनास्टिक का भविष्य




