नीरज सिसौदिया, बरेली
बरेली जिले की फरीदपुर विधानसभा सीट पर भाजपा विधायक श्याम बिहारी लाल के निधन के बाद राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। भले ही निर्वाचन आयोग की ओर से अभी उपचुनाव की कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई हो, लेकिन राजनीतिक दलों और संभावित दावेदारों के बीच चर्चाओं का दौर शुरू हो चुका है। यह सीट न सिर्फ स्थानीय सियासत के लिहाज से अहम है, बल्कि वर्ष 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव की दिशा और दशा तय करने में भी इसकी भूमिका निर्णायक मानी जा रही है।
भाजपा खेमे में यह चर्चा जोरों पर है कि पार्टी दिवंगत विधायक श्याम बिहारी लाल के सुपुत्र को उपचुनाव में मैदान में उतार सकती है। सहानुभूति फैक्टर और संगठन की मजबूती के कारण भाजपा इस विकल्प को सुरक्षित मान रही है। हालांकि पार्टी की ओर से भी अभी तक कोई आधिकारिक संकेत नहीं दिया गया है। दूसरी ओर समाजवादी पार्टी की स्थिति कहीं अधिक जटिल नजर आ रही है। यहां कोई भी बड़ा दावेदार खुलकर उपचुनाव लड़ने में दिलचस्पी नहीं दिखा रहा।

इसका सबसे बड़ा कारण यह माना जा रहा है कि उपचुनाव में हार का सीधा असर 2027 के विधानसभा चुनाव पर पड़ेगा। पार्टी के भीतर यह संदेश साफ है कि जो नेता उपचुनाव लड़ेगा और हारेगा, उसके लिए अगले विधानसभा चुनाव में टिकट की राह मुश्किल हो जाएगी। इसी डर के चलते दावेदार फिलहाल खुलकर सामने आने से बच रहे हैं। चर्चा यह भी है कि अगर परिस्थितियां अनुकूल नहीं रहीं तो यह सीट कोटा में भी डाली जा सकती है, यानी बिना चुनाव के ही मामला निपट सकता है।
समाजवादी पार्टी में फरीदपुर सीट के प्रमुख दावेदारों में विजयपाल सिंह, पूर्व ब्लॉक प्रमुख चंद्रसेन सागर और पूर्व विधायक सियाराम सागर की पुत्रवधू कल्पना सागर के नाम शामिल हैं। इन तीनों के अपने-अपने दावे और सीमाएं हैं। पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं का साफ कहना है कि अगर ये नेता खुद को जीतने में सक्षम मानते हैं, तो उपचुनाव में अपनी ताकत दिखानी चाहिए। खासकर विजयपाल सिंह, जो लंबे समय से इस सीट से टिकट की दावेदारी करते आ रहे हैं।
लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि विजयपाल सिंह के सामने सबसे बड़ी चुनौती यादव समाज का विरोध है। बताया जाता है कि जब वह बहुजन समाज पार्टी से विधायक थे, तब उनके कार्यकाल में यादव समाज के लोगों पर बड़ी संख्या में मुकदमे दर्ज हुए। इनमें से कई मुकदमों को राजनीतिक प्रतिशोध का नतीजा और फर्जी बताया जाता है। इसी वजह से फरीदपुर के यादव आज भी उनसे नाराज बताए जाते हैं। फरीदपुर की राजनीति में यादव समाज की भूमिका निर्णायक रही है, ऐसे में यह नाराजगी विजयपाल सिंह के लिए बड़ा नुकसान साबित हो सकती है।

इसके उलट पूर्व विधायक सियाराम सागर के साथ हर वर्ग का समर्थन रहा। यही वजह थी कि वह फरीदपुर सीट से सबसे लंबे समय तक विधायक रहे। उनकी राजनीतिक ताकत के पीछे उनके छोटे भाई चंद्रसेन सागर की अहम भूमिका मानी जाती रही है, जिन्हें क्षेत्र में सियाराम सागर का ‘हनुमान’ कहा जाता था। सियाराम सागर के निधन के बाद यह माना जा रहा था कि उनकी राजनीतिक विरासत चंद्रसेन सागर संभालेंगे, लेकिन परिवार के भीतर राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के चलते हालात बदल गए।
सियाराम सागर के पुत्र डीके सागर की पत्नी कल्पना सागर और चंद्रसेन सागर के बीच मतभेद सामने आए, जिससे सागर परिवार बिखर गया। हाल ही में इस परिवार का पुनर्मिलन जरूर देखने को मिला, लेकिन मौजूदा हालात में भी चंद्रसेन सागर और कल्पना सागर दोनों समाजवादी पार्टी से टिकट की चाहत रखते हैं। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह पुनर्मिलन राजनीतिक तौर पर कितना कारगर साबित होता है।

अगर विजयपाल सिंह और सागर परिवार की तुलना की जाए तो आज भी फरीदपुर की सियासत में सागर परिवार का असर ज्यादा नजर आता है। चंद्रसेन सागर को एक अनुभवी और जमीनी नेता माना जाता है, जिनकी पकड़ गांव-गांव तक है। विजयपाल सिंह के यादव विरोध के मुकाबले चंद्रसेन सागर की स्वीकार्यता अधिक व्यापक मानी जाती है। यही कारण है कि कई राजनीतिक जानकार उन्हें ज्यादा मजबूत दावेदार मानते हैं।

हाल ही में विजयपाल सिंह ने अपने कार्यालय में एक समारोह आयोजित किया, जिसमें बीएलए को सम्मानित किया गया और वीरपाल सिंह यादव मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। इसके बावजूद यादव समाज विजयपाल सिंह के समर्थन में उतरता नहीं दिखा। यहां तक कहा जा रहा है कि वीरपाल सिंह यादव खुद भी नहीं चाहते कि विजयपाल सिंह को फरीदपुर सीट से हार की डबल हैट्रिक लगाने का मौका मिले।
विजयपाल सिंह की मुश्किलें यहीं खत्म नहीं होतीं। फरीदपुर विधानसभा क्षेत्र में धोबी समाज के उभरते नेता जयप्रकाश भास्कर की सक्रियता ने भी समीकरण बदल दिए हैं। जयप्रकाश भास्कर की पार्टी सर्वजन आम पार्टी ने क्षेत्र में तेजी से अपनी पहचान बनाई है। एक समय समाजवादी पार्टी के जिला सचिव रह चुके जयप्रकाश भास्कर आज उस वोट बैंक पर प्रभाव रखते हैं, जो विजयपाल सिंह का विरोधी माना जाता है। यही वजह है कि जनता उन्हें एक तीसरे विकल्प के तौर पर देखने लगी है।

बताया जाता है कि समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय सचिव वीरपाल सिंह यादव और प्रदेश महासचिव अता उर रहमान भी इस बार विजयपाल सिंह को फरीदपुर सीट से उम्मीदवार बनाने के पक्ष में नहीं हैं। पार्टी नेतृत्व के इस रुख से भी विजयपाल सिंह की राह और कठिन होती नजर आ रही है।
कुल मिलाकर फरीदपुर का संभावित उपचुनाव सिर्फ एक सीट का चुनाव नहीं होगा, बल्कि यह सभी दलों और खासकर समाजवादी पार्टी के लिए अग्निपरीक्षा साबित हो सकता है। यह उपचुनाव तय करेगा कि 2027 के विधानसभा चुनाव में कौन मजबूत होगा और किसकी सियासत कमजोर पड़ेगी। विरासत, विरोध और तीसरे विकल्प की इस लड़ाई में फरीदपुर एक बार फिर प्रदेश की राजनीति का केंद्र बनता नजर आ रहा है।





