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नवाब मुजाहिद हसन खां ने करवाई थी राजनीतिक दलों की ओर से उर्स -ए- रजवी पर दरगाह आला हजरत में चादरपोशी की शुरुआत, सोनिया और राहुल गांधी खुद भिजवाते थे चादर, तब राष्ट्रीय स्तर के नेता आते थे दरगाह पर, अब स्थानीय स्तर पर ही कर दी जाती है खानापूर्ति, पढ़ें कैसे बदलती जा रही है परंपरा

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नीरज सिसौदिया, बरेली
बरेली की पहचान सिर्फ़ रूहेलखंड का ऐतिहासिक शहर होने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सूफी संतों और उलेमा-ए-कराम की सरज़मीं भी है। इन्हीं में से एक महान शख्सियत हैं इमाम अहमद रज़ा ख़ान फ़ाज़िले बरेलवी, जिन्हें दुनिया “आला हज़रत” के नाम से जानती है। हर साल बरेली शरीफ़ में उनकी दरगाह पर उर्स का आयोजन होता है, जो न केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया से आए जायरीन (श्रद्धालुओं) के मिलन का केंद्र बनता है। इस बार इसका आयोजन 18, 19 और 20 अगस्त को किया जा रहा है।

दिसंबर 2013 में दरगाह आला हजरत के लिए चादर भिजवाते राहुल गांधी।

पिछले कुछ वर्षों से कुछ राजनीतिक दलों की ओर से इस सालाना उर्स ए रजवी के मौके पर चादरपोशी की परंपरा निभाई जा रही है। इस परंपरा की शुरुआत वर्ष 2009 में दिग्गज कांग्रेस नेता और बरेली कैंट विधानसभा सीट से पूर्व प्रत्याशी नवाब मुजाहिद हसन खां ने करवाई थी। उससे पहले किसी भी राजनीतिक दल की ओर से चादरपोशी नहीं कराई जाती थी।
नवाब मुजाहिद हसन खां बताते हैं, ‘पहले कांग्रेस की ओर से दरगाह आला हजरत पर सालाना उर्स के मौके पर पार्टी मुख्यालय की ओर से चादर नहीं भेजी जाती थी। इंदिरा गांधी के कार्यकाल में सिर्फ एक पत्र भेजा जाता था। वर्ष 2009 में मैंने यूपीए की तत्कालीन चेयरपर्सन सोनिया गांधी को इस दरगाह के महत्व और इससे जुड़ी आस्था के बारे में बताया और दरगाह के लिए चादर भेजने का आग्रह किया। उस वक्त केंद्र में कांग्रेस नीत यूपीए गठबंधन की सरकार थी। इस पर सोनिया गांधी ने एक नई परंपरा की शुरुआत करते हुए राष्ट्रीय स्तर के नेताओं का एक प्रतिनिधिमंडल भेजा। इसका नेतृत्व मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने किया। उनके साथ दिल्ली की भूतपूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित, अखिल भारतीय महिला कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी, हफीजुर्रहमान सहित कई दिग्गज नेता बरेली आए। सबसे पहले यह प्रतिनिधिमंडल मेरे आवास पर आया। इसके बाद दरगाह पर चादरपोशी की गई।’

नवाब मुजाहिद हसन खां के आवास पर कांग्रेस की ओर से चादर लेकर आए प्रतिनिधिमंडल में शामिल एमपी के पूर्व सीएम दिग्विजय सिंह और अन्य नेता।


नवाब मुजाहिद बताते हैं, ‘तब सोनिया गांधी चादर पर हाथ लगाकर खुद दरगाह के लिए भिजवाती थीं। इसी तरह राहुल गांधी भी इस परंपरा को आगे बढ़ाते रहे। उसकी बाकायदा फोटोग्राफी की जाती थी और चादर के साथ ही एक पत्र भी भेजा जाता था। उनकी तस्वीरें अखबारों की सुर्खियां बनती थीं। सोनिया गांधी का यह व्यवहार दरगाह के प्रति उनकी और पार्टी की आस्था को दर्शाता था।’
आखिरी बार वर्ष 2019 -20 में चादर लेकर कांग्रेस का कोई राष्ट्रीय नेता दरगाह पर आया था। वह नेता अखिल भारतीय अल्पसंख्यक कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष नदीम जावेद थे।

नवाब मुजाहिद हसन खां के आवास पर नदीम जावेद।
नवाब मुडाहिद हसन खां के आवास पर भोजन करता कांग्रेस का प्रतिनिधिमंडल।

इसके बाद कांग्रेस की देखा-देखी समाजवादी पार्टी ने भी चादरपोशी की परंपरा शुरू कर दी लेकिन समाजवादी पार्टी की ओर से भी स्थानीय स्तर के नेताओं को भेजकर ही खानापूर्ति कर दी जाती रही। पहले तो सपा की ओर स्थानीय स्तर पर ही चादर खरीदकर पार्टी पदाधिकारी रस्म अदायगी कर देते थे। वर्ष 2024 में पहली बार खुद अखिलेश यादव ने पूर्व मंत्री अता उर रहमान के हाथों चादर भेजी तो पार्टी के नेताओं में आपस में ही क्लेश हो गया और इस विवाद ने अखबारों में तमाम सुर्खियां बटोरीं। असल मायने में इस बार अखिलेश यादव ने आधिकारिक तौर पर एक प्रतिनिधिमंडल की घोषणा करते हुए चादरपोशी को तवज्जो दी है। बाकायदा सपा के मुख्य प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी की ओर से इस संबंध में विगत 15 अगस्त को एक प्रेस विज्ञप्ति जारी की गई। इसमें कहा गया है, ‘आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा खां (अले रहमा) का तीन रोज़ा उर्स 18,19,20 अगस्त 2025 को 107वां उर्स होने जा रहा है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने दरगाह आला हज़रत पर चादर पेश करने की जिम्मेदारी प्रदेश महासचिव, पूर्व मंत्री एवं विधायक बहेड़ी (बरेली) अताउर्रहमान को सौंपी है और उर्स आला हजरत की मुबारकबाद दी है।’

अखिलेश यादव से चादर लाते हुए पूर्व मंत्री अता उर रहमान की तस्वीर के साथ सपा के आधिकारिक हैंडल पर की गई पोस्ट।

आज शाम अता उर रहमान दरगाह पर चादरपोशी करने जा रहे हैं। उनके साथ जिला अध्यक्ष शिवचरण कश्यप, महानगर अध्यक्ष शमीम खां सुल्तानी और पार्षद एवं दरगाह से जुड़ी कमेटी जमात ए रजा मुस्तफा कोर कमेटी सदस्य शमीम अहमद भी होंगे।

चादरपोशी के लिए बरेली आईं शीला दीक्षित के साथ नवाब मुजाहिद हसन खां।

बहरहाल, दरगाह आला हजरत को राजनीतिक दलों के बीच सम्मान दिलाने का श्रेय नवाब मुजाहिद हसन खां को जाता है। अगर वह यह शुरुआत न करते तो शायद मुस्लिम वोट बैंक की राजनीति करने वाले नेता कभी दरगाह के आगे नतमस्तक नहीं होते। वर्ष 2020 तक कांग्रेस की ओर से दरगाह पर चादरपोशी नवाब मुजाहिद हसन खां के माध्यम से ही की जाती रही है।

बता दें कि पिछले लगभग पांच वर्षों में किसी भी दल का कोई भी राष्ट्रीय स्तर का नेता चादर लेकर दरगाह नहीं गया। अब स्थानीय स्तर पर ही चादरपोशी की औपचारिकता पूरी कर दी जाती है।

अब देखना यह होगा कि क्या इस बार पार्टी किसी दिग्गज नेता को चादरपोशी के लिए भेजती है या एक बार फिर स्थानीय स्तर पर ही औपचारिकता पूरी कर दी जाएगी।

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