नीरज सिसौदिया, बरेली
बरेली जिले की फरीदपुर विधानसभा सीट पर समाजवादी पार्टी के लिए खतरे की घंटी बजनी शुरू हो गई है। जिन सामाजिक समीकरणों के भरोसे सपा अब तक इस सीट पर संघर्ष करती रही, वही समीकरण अब पार्टी के हाथ से फिसलते नजर आ रहे हैं। जाटव समाज की नाराजगी तो पहले से जगजाहिर थी, लेकिन अब यादव समाज के भीतर भी असंतोष खुलकर सामने आने लगा है। हालात ऐसे बनते जा रहे हैं कि यदि वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने एक बार फिर पूर्व विधायक विजयपाल सिंह पर ही दांव लगाया, तो यह फैसला पार्टी के लिए आत्मघाती साबित हो सकता है।
फरीदपुर विधानसभा सीट पर पिछले दो विधानसभा चुनावों की तरह ही अगर समाजवादी पार्टी का तथाकथित ‘विजय प्रेम’ बरकरार रहा, तो न केवल विजयपाल सिंह की हार का चौका लगेगा, बल्कि समाजवादी पार्टी की हार की हैट्रिक भी लगभग तय मानी जा रही है। पार्टी के भीतर और बाहर दोनों जगह यह सवाल अब जोर पकड़ रहा है कि आखिर एक ऐसे चेहरे पर बार-बार भरोसा क्यों जताया जा रहा है, जो न सिर्फ चुनाव हारता रहा है, बल्कि पार्टी के परंपरागत वोट बैंक को भी लगातार कमजोर करता जा रहा है।

सूत्रों के मुताबिक, फरीदपुर विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले करीब 25 गांवों के यादव नेताओं, ग्राम प्रधानों और प्रधान पतियों ने हाल ही में फरीदपुर स्थित वृंदावन होटल में एक अहम बैठक की। यह बैठक सपा के लिए इसलिए भी ज्यादा चिंताजनक मानी जा रही है, क्योंकि इसमें साफ तौर पर विजयपाल सिंह के खिलाफ नाराजगी सामने आई। बैठक में समाजवादी पार्टी के नेता रविंदर यादव प्रमुख रूप से मौजूद रहे, जबकि दिवंगत भाजपा विधायक श्याम बिहारी लाल के प्रतिनिधि और उनके करीबी माने जाने वाले भाजपा नेता पुष्पेंद्र यादव भी उपस्थित थे।
बैठक में शामिल कुछ लोगों का कहना है कि यह कोई सामान्य राजनीतिक चर्चा नहीं थी, बल्कि इसमें भविष्य की रणनीति पर गंभीरता से विचार किया गया। सूत्र बताते हैं कि बैठक में यह निर्णय लिया गया कि यदि समाजवादी पार्टी आगामी विधानसभा चुनाव में फरीदपुर से एक बार फिर विजयपाल सिंह को उम्मीदवार बनाती है, तो ये सभी यादव प्रधान और नेता भाजपा का दामन थाम सकते हैं। बताया जा रहा है कि भाजपा में जाने की पूरी प्रक्रिया पुष्पेंद्र यादव के माध्यम से तय की जाएगी।
सूत्रों के अनुसार, इस बैठक में ग्राम अठायन के तेजस यादव, नवदिया कल्यानपुर के शेर सिंह यादव, इमलिया के गोविंद यादव, भोजपुर के प्रधान, बहादुरपुर करोड़ के हरदीप सिंह यादव, नगरिया कलां के रविंदर यादव, कीरतपुर धीरी के रिंकू यादव सहित कई प्रभावशाली चेहरे मौजूद थे। इनमें कुछ नेता ऐसे हैं जो पहले से भाजपा से जुड़े हुए हैं, जबकि कुछ समाजवादी पार्टी में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। यही वजह है कि इस बैठक को हल्के में नहीं लिया जा सकता।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि 25 गांवों का यह यादव समूह वास्तव में भाजपा के साथ चला गया, तो इसका असर सिर्फ यादव वोटों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका संदेश पूरे विधानसभा क्षेत्र में जाएगा। इससे समाजवादी पार्टी का संगठनात्मक ढांचा भी कमजोर पड़ सकता है।
फरीदपुर विधानसभा सीट की राजनीति को समझने के लिए जातीय समीकरण बेहद अहम हैं। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव के आंकड़ों पर नजर डालें तो इस सीट पर यादव मतदाताओं की संख्या लगभग 35 से 40 हजार के बीच मानी जाती है। लगभग इतनी ही संख्या जाटव समाज के मतदाताओं की भी है। यानी सिर्फ यादव और जाटव वोट मिल जाएं तो जीत की नींव मजबूत हो सकती है।
लेकिन समस्या यही है कि फरीदपुर में जाटव वोट बैंक लंबे समय से बिखरा हुआ है। हर चुनाव में करीब 10 से 15 हजार जाटव वोट बहुजन समाज पार्टी के खाते में जाते रहे हैं। इसके अलावा जाटव समाज के भीतर कई ऐसे प्रभावशाली नेता हैं, जो व्यक्तिगत तौर पर विजयपाल सिंह के कट्टर विरोधी माने जाते हैं।
जाटव समाज में चंद्रसेन सागर, शालिनी सिंह, पूनम सेन, ब्रह्मस्वरूप सागर, कल्पना सागर, विशाल सागर और हरीश लाखा जैसे नेता खुलकर विजयपाल सिंह का विरोध करते रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि ये सभी नेता समाजवादी पार्टी से वैचारिक रूप से जुड़े हुए हैं, लेकिन विजयपाल सिंह को उम्मीदवार बनाए जाने के खिलाफ हैं।
इस नाराजगी का असर 2022 के विधानसभा चुनाव में साफ तौर पर देखने को मिला। उस चुनाव में समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार विजयपाल सिंह को महज 2921 वोटों से हार का सामना करना पड़ा। वहीं बहुजन समाज पार्टी की प्रत्याशी शालिनी सिंह को 14 हजार 478 वोट मिले थे। इसके अलावा कुछ अन्य जाटव नेताओं ने भी चुनाव लड़ा था, जिससे सपा के वोट और ज्यादा कट गए।
राजनीतिक विश्लेषण के मुताबिक, फरीदपुर में मौजूद 35 से 40 हजार जाटव वोटों में से विजयपाल सिंह के हिस्से में महज 5 से 6 हजार जाटव वोट ही आए। बाकी वोट या तो बसपा के खाते में चले गए या फिर भाजपा को ट्रांसफर हो गए या अन्य जाटव उम्मीदवारों के हिस्से में चले गए। यही वोटों का बंटवारा अंततः सपा की हार की सबसे बड़ी वजह बना।
हालांकि यह भी सच है कि जाटव समाज की यह नाराजगी समाजवादी पार्टी से नहीं, बल्कि विजयपाल सिंह से है। जब पार्टी किसी अन्य चेहरे को उम्मीदवार बनाती है, तो यही जाटव नेता एकजुट होकर सपा का समर्थन करते हैं।
इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण 2024 का लोकसभा चुनाव है। फरीदपुर विधानसभा सीट आंवला लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आती है। 2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने यहां से नीरज मौर्य को उम्मीदवार बनाया। नतीजा यह हुआ कि विजयपाल विरोधी सभी जाटव नेता खुलकर नीरज मौर्य के समर्थन में उतर आए।
जाटवों के साथ-साथ यादव समाज ने भी इस चुनाव में पूरी एकजुटता दिखाई। परिणामस्वरूप सपा उम्मीदवार को फरीदपुर विधानसभा क्षेत्र से बढ़त मिली और वह लोकसभा चुनाव जीतने में सफल रहे। इस चुनाव ने साफ कर दिया कि समस्या पार्टी नहीं, बल्कि उम्मीदवार का चेहरा है।
फरीदपुर की राजनीति का यह सबसे दिलचस्प और अहम पहलू है कि जैसे ही विजयपाल सिंह का नाम उम्मीदवार के तौर पर सामने आता है, वैसे ही यादव और जाटव दोनों समाजों के भीतर असंतोष पनपने लगता है। यही दोनों समाज, जो सपा की रीढ़ माने जाते हैं, उसी पार्टी को हराने में जुट जाते हैं।
शालिनी सिंह का मामला भी इसका उदाहरण है। वे समाजवादी पार्टी छोड़कर बसपा से चुनाव लड़ीं, बाद में फिर सपा में लौट आईं। यानी विरोध पार्टी से नहीं, बल्कि विजयपाल सिंह की राजनीतिक शैली और उनके व्यवहार से जुड़ा हुआ है।
फिलहाल विजयपाल सिंह के खिलाफ विरोध खुलकर सामने नहीं आया है, लेकिन अंदरखाने असंतोष लगातार बढ़ रहा है। यादव नेताओं की बैठक ने यह साफ संकेत दे दिया है कि अब यह विरोध ज्यादा दिनों तक दबा नहीं रहेगा। आने वाले समय में यह विरोध सार्वजनिक रूप ले सकता है, जिससे समाजवादी पार्टी की मुश्किलें और बढ़ेंगी।

राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा आम है कि अगर सपा नेतृत्व ने समय रहते फरीदपुर सीट पर उम्मीदवार बदलने का फैसला नहीं लिया, तो 2027 का चुनाव पार्टी के लिए बेहद नुकसानदेह साबित हो सकता है। एक ओर भाजपा लगातार अपनी पकड़ मजबूत कर रही है, वहीं दूसरी ओर सपा अपने ही अंदरूनी विरोध से जूझती नजर आ रही है।
कुल मिलाकर फरीदपुर विधानसभा सीट पर समाजवादी पार्टी की सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष नहीं, बल्कि उसका अपना फैसला है। विजयपाल सिंह को लेकर बढ़ती नाराजगी अब केवल जाटव समाज तक सीमित नहीं रही, बल्कि यादव समाज में भी दरार साफ दिखने लगी है। यदि पार्टी नेतृत्व ने इसे गंभीरता से नहीं लिया, तो ‘विजय प्रेम’ समाजवादी पार्टी के लिए पराजय की सबसे बड़ी वजह बन सकता है।
2027 के चुनाव से पहले सपा के पास अभी समय है कि वह जमीनी हकीकत को समझे और ऐसा चेहरा सामने लाए, जो यादव और जाटव दोनों समाजों को एक साथ जोड़ सके। वरना फरीदपुर में हार की कहानी एक बार फिर दोहराई जा सकती है और शायद पहले से भी बड़े अंतर के साथ।





