नीरज सिसौदिया, बरेली
बरेली शहर विधानसभा सीट पर इस बार चुनावी माहौल जितना शांत दिखाई दे रहा है, उतना शायद पहले कभी नहीं रहा। आमतौर पर चुनाव से काफी पहले से दावेदारों की सक्रियता, कार्यक्रमों की भरमार, जनता के बीच संपर्क अभियान और राजनीतिक बयानबाजी तेज हो जाती है, लेकिन इस बार तस्वीर कुछ अलग है। समाजवादी खेमे में शहर विधानसभा अध्यक्ष हसीव खान को छोड़ दिया जाए तो बाकी दावेदार लगभग निष्क्रिय नजर आ रहे हैं। दूसरी ओर भाजपा में पूर्व उपसभापति अतुल कपूर और वरिष्ठ पार्षद सतीश चंद्र सक्सेना कातिब उर्फ मम्मा समेत कई नेता पूरे दमखम के साथ मैदान में उतरने की तैयारी कर चुके हैं। इसी वजह से सियासी गलियारों में यह चर्चा भी तेज हो गई है कि कहीं विपक्ष की सुस्ती भाजपा को आसान जीत यानी “वॉकओवर” तो नहीं दिला देगी।

अगर समाजवादी पार्टी की स्थिति देखें तो बरेली शहर सीट पर जनवरी के बाद से कोई बड़ा कार्यक्रम या जनसंपर्क अभियान नजर नहीं आया। चुनावी राजनीति में यह समय बेहद अहम माना जाता है, क्योंकि इसी दौरान नेता जनता के बीच अपनी पकड़ मजबूत करते हैं। लेकिन अधिकांश दावेदारों की तरफ से न तो गरीबों की मदद के कार्यक्रम दिखे और न ही संगठनात्मक बैठकों की खास हलचल। इस सुस्ती के बीच सिर्फ हसीव खान लगातार सक्रिय दिखाई दे रहे हैं। उन्होंने जनवरी में बीएलए सम्मेलन आयोजित कराया और उसके बाद से संगठनात्मक काम तथा मतदाता सूची से जुड़े कार्यों में भी लगातार लगे हुए हैं। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि वे व्यक्तिगत लाभ-हानि से ऊपर उठकर अपनी मौजूदगी बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं।
दरअसल, इस निष्क्रियता के पीछे एक बड़ी राजनीतिक वजह भी बताई जा रही है। माना जा रहा है कि आगामी विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के बीच गठबंधन लगभग तय है। अगर ऐसा होता है तो बरेली जिले की कुछ सीटें कांग्रेस के खाते में जा सकती हैं। शहर विधानसभा सीट को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा इसी बात की है कि यह सीट कांग्रेस को मिल सकती है। इसके अलावा बिथरी चैनपुर और आंवला सीट को लेकर भी ऐसी चर्चाएं चल रही हैं। ऐसे में समाजवादी पार्टी के कई नेताओं को लग रहा है कि जब टिकट मिलना ही नहीं है तो प्रचार-प्रसार में पैसा और मेहनत लगाने का फायदा क्या होगा। यही सोच उन्हें पीछे खींच रही है।
इस स्थिति का असर पार्टी के बड़े लक्ष्य पर भी पड़ता दिख रहा है। पार्टी नेतृत्व भले ही प्रदेश में सत्ता परिवर्तन की बात करता हो और अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बनाने का नारा दिया जाता हो, लेकिन स्थानीय स्तर पर कई नेता अपने व्यक्तिगत राजनीतिक भविष्य को लेकर ज्यादा चिंतित दिख रहे हैं। उन्हें डर है कि गठबंधन की स्थिति में उनका टिकट कट सकता है और पूरी मेहनत बेकार चली जाएगी। यही वजह है कि संगठनात्मक उत्साह भी कमजोर पड़ता नजर आ रहा है।
कांग्रेस की स्थिति भी शहर सीट पर बहुत मजबूत नहीं दिख रही। फिलहाल पार्टी के पास ऐसा कोई चेहरा नजर नहीं आता जो पूरे जोर-शोर से चुनावी तैयारी कर रहा हो। वर्ष 2017 में सपा-कांग्रेस गठबंधन प्रत्याशी रहे वरिष्ठ कांग्रेस नेता प्रेमप्रकाश अग्रवाल का नाम जरूर लिया जाता है, लेकिन उनकी सक्रियता भी उस स्तर की नहीं दिख रही जैसी टिकट के गंभीर दावेदार की होनी चाहिए। पिछली बार चुनाव लड़ने वाले केके शर्मा भी चुनावी तस्वीर से लगभग गायब बताए जा रहे हैं। इससे यह संदेश जा रहा है कि कांग्रेस भी अभी पूरी तरह तैयार नहीं है।

ऐसे में संभावित सपा-कांग्रेस गठबंधन इस सीट पर उल्टा असर भी डाल सकता है। गठबंधन का मतलब सीट साझा करना होता है, लेकिन इससे स्थानीय कार्यकर्ताओं का मनोबल भी टूट सकता है। जब नेता ही असमंजस में हों कि टिकट किसे मिलेगा, तो जमीनी स्तर पर ऊर्जा कम होना स्वाभाविक है। यही स्थिति फिलहाल बरेली शहर विधानसभा सीट पर देखने को मिल रही है।
हालांकि इस बार एक नया समीकरण भी चर्चा में है। मतदाता सूची पुनरीक्षण और अन्य प्रक्रियाओं के बाद वोटों के सामाजिक संतुलन में बदलाव की बातें कही जा रही हैं। कुछ राजनीतिक कार्यकर्ताओं का अनुमान है कि अगर मुस्लिम मतदाताओं का अनुपात प्रभावी रहता है तो मुस्लिम उम्मीदवार की स्थिति मजबूत हो सकती है। ऐसे में हसीव खान जैसे नेताओं की सक्रियता भविष्य में उन्हें फायदा भी दे सकती है।

उधर, भाजपा की स्थिति बिल्कुल उलट दिखाई देती है। यहां टिकट के लिए दावेदारों की लंबी सूची है और ज्यादातर नेता अभी से पूरी ताकत के साथ चुनावी तैयारी में जुटे हुए हैं। पार्टी के मौजूदा विधायक अरुण कुमार के अलावा वरिष्ठ पार्षद सतीश चंद्र सक्सेना कातिब, पूर्व उपसभापति अतुल कपूर, सीए राजन विद्यार्थी, डॉक्टर विनोद पागरानी समेत कई नाम चर्चा में हैं। खास तौर पर अतुल कपूर और सतीश सक्सेना को लेकर कहा जा रहा है कि दोनों लगातार क्षेत्र में सक्रिय हैं, लोगों से मिल रहे हैं और संगठनात्मक पकड़ मजबूत कर रहे हैं। इससे पार्टी के भीतर प्रतिस्पर्धा तो बढ़ रही है, लेकिन चुनावी तैयारी भी मजबूत होती जा रही है।
राजनीतिक माहौल को देखते हुए कई स्थानीय जानकार मानते हैं कि अगर विपक्ष की यही स्थिति रही तो भारतीय जनता पार्टी को बड़ा फायदा मिल सकता है। चुनाव में जीत सिर्फ वोटों से नहीं, बल्कि संगठन, उत्साह और जमीन पर सक्रियता से भी तय होती है। जहां एक तरफ विपक्ष टिकट के इंतजार में शांत बैठा है, वहीं भाजपा के नेता लगातार जनता के बीच मौजूद हैं।
बरेली शहर सीट की राजनीति हमेशा से दिलचस्प रही है, क्योंकि यहां सामाजिक और राजनीतिक समीकरण तेजी से बदलते हैं। लेकिन इस बार की खास बात यह है कि मुकाबले से पहले ही एक पक्ष बेहद सक्रिय और दूसरा असमंजस में नजर आ रहा है। यही कारण है कि शहर की राजनीतिक चर्चा का केंद्र यह सवाल बन गया है कि क्या वास्तव में भाजपा को यहां आसान जीत मिल सकती है, या चुनाव नजदीक आते-आते विपक्ष अचानक सक्रिय होकर तस्वीर बदल देगा।

फिलहाल जमीन पर जो तस्वीर दिखाई दे रही है, उसमें समाजवादी खेमे में सिर्फ हसीव खान की सक्रियता चर्चा में है, जबकि भाजपा में अतुल कपूर जैसे नेता पूरी ताकत से तैयारी कर रहे हैं। आने वाले महीनों में गठबंधन की अंतिम तस्वीर, टिकट वितरण और उम्मीदवारों की घोषणा इस सीट की असली दिशा तय करेगी। लेकिन अभी के हालात यही संकेत दे रहे हैं कि बरेली शहर विधानसभा सीट पर चुनावी जंग से ज्यादा राजनीतिक इंतजार और रणनीतिक गणित का दौर चल रहा है।





