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56 बीघा जमीन पर अवैध कब्जे का आरोप: पार्षद नवल किशोर मौर्या पर ग्राम सभा भूमि हड़पने, फर्जीवाड़े और करोड़ों के राजस्व नुकसान का दावा, मुख्य सचिव से शिकायत, पार्षद ने बताया साजिश

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नीरज सिसौदिया, बरेली
बरेली के सैदपुर हाकिन्स वार्ड संख्या 55 में जमीन और अवैध निर्माण को लेकर उठा विवाद अब कई स्तरों पर गंभीर रूप ले चुका है। स्थानीय निवासी अमर राठौर द्वारा प्रमुख सचिव (आवास), उत्तर प्रदेश शासन और अन्य अधिकारियों को भेजी गई एक नहीं बल्कि कई शिकायतों में भाजपा पार्षद नवल किशोर मौर्या और उनके परिजनों पर ग्राम सभा तथा ग्रामवासियों की खाली पड़ी भूमि पर बड़े पैमाने पर अवैध कब्जा और निर्माण कराने के आरोप लगाए गए हैं। शिकायतों में राजस्व संहिता की धारा 80 की प्रक्रिया पूरी किए बिना निर्माण, भारी राजस्व चोरी, फर्जी दस्तावेजों के सहारे न्यायालय को गुमराह करने, आपराधिक षड्यंत्र रचने और संगठित तरीके से जमीन पर कब्जा करने जैसे गंभीर आरोप शामिल हैं।
पहली शिकायत में अमर राठौर ने आरोप लगाया था कि गाटा संख्या 511, 512, 513 समेत अन्य भूखंडों पर बिना विधिक प्रक्रिया पूरी किए निर्माण कराया गया। आरोप है कि न तो विकास प्राधिकरण से विधिवत मानचित्र स्वीकृत कराया गया और न ही राजस्व संहिता की अनिवार्य प्रक्रिया पूरी की गई। शिकायत में कहा गया कि इन भूखंडों पर एक बारातघर, एसआर मेमोरियल पब्लिक स्कूल का भवन और अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठानों का निर्माण कराया गया है।
रास्ते को लेकर भी विवाद सामने आया। शिकायतकर्ता का कहना है कि संबंधित गाटों का रास्ता मिनी बाईपास से दर्शाया गया, जबकि राजस्व अभिलेखों में ऐसा कोई रास्ता दर्ज नहीं है। आरोप है कि डॉ. अनुपमा सिंह राघव की खाली पड़ी भूमि, जो गाटा संख्या 509, 510, 567, 569, 570 और 571 में दर्ज है, से रास्ता दिखाकर सिविल न्यायालय में आपसी बंटवारे का मुकदमा दाखिल किया गया और कथित रूप से फर्जी अभिलेख व शपथपत्र प्रस्तुत कर आदेश अपने पक्ष में पारित करा लिया गया। शिकायतकर्ता ने इसे न्यायालय को गुमराह करने और कूट-कपट का मामला बताया है।
अमर राठौर ने एक और विस्तृत शिकायत भेजकर आरोपों का दायरा और बड़ा कर दिया है। नई शिकायत में दावा किया गया है कि सभासद और उनके परिजनों ने लगभग 56 बीघा ग्राम समाज और ग्रामवासियों की भूमि पर अवैध कब्जा किया है। आरोप है कि यह कब्जा तहसील सदर के कर्मचारियों और अधिकारियों की मिलीभगत से किया गया और बिना विधिक प्रक्रिया अपनाए आपराधिक षड्यंत्र के तहत बारातघर समेत विभिन्न व्यावसायिक प्रतिष्ठानों का निर्माण कराया गया।
शिकायत में कहा गया है कि इस पूरे प्रकरण में उत्तर प्रदेश अर्बन डेवलपमेंट एक्ट 1973 के प्रावधानों की धज्जियां उड़ाई गईं और राजस्व संहिता का खुला उल्लंघन किया गया। आरोप है कि तहसील सदर में तैनात राजस्व अधिकारी मूकदर्शक बने रहे और गलत काम करने वालों को संरक्षण दिया, जिसके चलते मिनी बाईपास क्षेत्र में अवैध निर्माण की बाढ़ आ गई। शिकायतकर्ता का दावा है कि पूरे क्षेत्र में बने अधिकांश व्यावसायिक प्रतिष्ठानों का मानचित्र विकास प्राधिकरण से स्वीकृत नहीं कराया गया, और यदि कहीं स्वीकृति ली भी गई तो निर्माण स्वीकृत मानचित्र के अनुरूप नहीं हुआ। इससे सरकारी खजाने को करोड़ों रुपये की राजस्व क्षति पहुंचने का आरोप लगाया गया है।
शिकायत में एक और गंभीर दावा किया गया है कि सभासद के पिता, दादा सेवाराम और परदादा चुन्नी लाल के नाम राजस्व अभिलेखों में वर्ष 1951 की खसरा और खतौनी के अनुसार मात्र 6 बीघा खाम भूमि दर्ज थी। शिकायतकर्ता का आरोप है कि बाद के वर्षों में दबंगई और अधिकारियों की मिलीभगत से ग्रामवासियों की जमीनों पर अवैध कब्जे किए गए, लेकिन डर के कारण लोग खुलकर सामने नहीं आ पाए।
अमर राठौर ने अपनी शिकायत में मांग की है कि सभासद नवल किशोर मौर्या और उनके परिजनों- राजेश बाबू मौर्या, अयोध्या प्रसाद मौर्या, धर्मवीर मौर्या, दीपक मौर्या समेत अन्य के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की सुसंगत धाराओं में आपराधिक षड्यंत्र, कूट-कपट और धोखाधड़ी का मुकदमा दर्ज किया जाए। साथ ही उत्तर प्रदेश अर्बन डेवलपमेंट एक्ट की धाराओं में कार्रवाई करते हुए उत्तर प्रदेश संगठित गिरोहबंदी निवारण अधिनियम 1986 की धारा 2/3 के तहत भी कार्रवाई सुनिश्चित करने की मांग की गई है। शिकायतकर्ता ने कब्जाई गई ग्राम सभा और ग्रामवासियों की भूमि को तत्काल कब्जा मुक्त कराने की भी मांग की है।
दूसरी ओर भाजपा पार्षद नवल किशोर मौर्या ने इन आरोपों को निराधार बताया है। उनका कहना है कि गाटा संख्या 511 का वर्ष 1966 का उनके दादा के नाम का बैनामा उनके पास मौजूद है। उन्होंने स्पष्ट किया कि गाटा संख्या 511 में से 30 वर्ग मीटर भूमि मिनी बाईपास निर्माण के लिए अधिकृत की गई थी, जिसका उल्लेख खतौनी में दर्ज है। उनके अनुसार उन्होंने उसी 30 वर्ग मीटर अधिकृत हिस्से में से अपनी निजी भूमि तक पहुंचने के लिए रास्ता निकाला है और किसी अन्य की भूमि पर अतिक्रमण नहीं किया गया। उनका कहना है कि आरोप राजनीतिक और व्यक्तिगत द्वेष से प्रेरित हैं।
यह मामला अब केवल एक रास्ते या एक निर्माण तक सीमित नहीं रहा, बल्कि ग्राम सभा की जमीन, राजस्व अभिलेखों की सत्यता, विकास प्राधिकरण की भूमिका और स्थानीय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर रहा है। यदि शिकायतों में लगाए गए आरोप सही साबित होते हैं तो यह मामला बड़े पैमाने पर अवैध कब्जे और प्रशासनिक मिलीभगत का उदाहरण बन सकता है। वहीं यदि जांच में सभासद के दस्तावेज और दावे सही पाए जाते हैं तो शिकायतकर्ता के आरोपों की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठेंगे।
फिलहाल क्षेत्र में इस प्रकरण को लेकर चर्चाएं तेज हैं। अब निगाहें शासन और प्रशासन की जांच पर टिकी हैं कि राजस्व अभिलेखों की पैमाइश और दस्तावेजों की जांच के बाद सच्चाई क्या सामने आती है और क्या अवैध निर्माण पर कोई ठोस कार्रवाई होती है या नहीं।

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