नीरज सिसौदिया, बरेली
रंगों के त्योहार होली पर जब शहर के संपन्न इलाकों में लोग निजी पार्टियों और क्लबों में व्यस्त थे, उसी समय अरुणा फाउंडेशन की ओर से शहर के उन बच्चों के बीच होली मनाई जा रही थी, जिनके लिए त्योहार अक्सर कैलेंडर तक सीमित रह जाते हैं। इस आयोजन का नेतृत्व कर रहे थे फाउंडेशन के अध्यक्ष अतुल कपूर (पूर्व उपसभापति, नगर निगम बरेली) — लेकिन यह नेतृत्व मंच से नहीं, बच्चों के बीच जमीन पर बैठकर किया गया।

अतुल कपूर जब बच्चों के बीच पहुंचे तो न कोई भाषण था, न औपचारिकता। एक हाथ में गुलाल और दूसरे में गुजिया थी। वे एक-एक बच्चे के पास गए, उसके गाल पर रंग लगाया और कहा —
“आज होली है, आज सब बराबर हैं।”
यही वाक्य इस पूरे आयोजन की आत्मा बन गया।
कार्यक्रम के अंतर्गत सैकड़ों जरूरतमंद बच्चों और उनके परिवारों को रंग, गुलाल, गुजिया और मिष्ठान वितरित किए गए। लेकिन यह वितरण किसी सरकारी योजना की तरह नहीं था, बल्कि परिवार जैसा माहौल था। बच्चे झिझकते हुए आगे बढ़ते, फिर मुस्कराते हुए रंग उठाते और एक-दूसरे को लगाते। कई बच्चों के लिए यह पहली होली थी जिसमें उनके हाथों में खुद के रंग थे, उधार की खुशी नहीं।

अतुल कपूर ने कहा,
“हम त्योहार अपने घरों में तो मना लेते हैं, लेकिन अगर समाज का एक वर्ग त्योहार से बाहर रह जाए तो वह उत्सव अधूरा है। होली का असली अर्थ रंग उड़ाना नहीं, बल्कि भेद मिटाना है।”
उनकी यह बात केवल भाषण नहीं थी, बल्कि उनके व्यवहार में दिख रही थी। वे बच्चों के बीच बैठे, उनके नाम पूछे, उनके परिवार के बारे में जाना। किसी के सिर पर हाथ रखा, किसी को मिठाई खिलाई। एक क्षण को वहां कोई ‘नेता’ नहीं था — केवल एक अभिभावक था।

कार्यक्रम में उपस्थित लोगों ने भी महसूस किया कि यह सामान्य सामाजिक आयोजन नहीं, बल्कि एक भावनात्मक जुड़ाव का क्षण है। पार्षद सोनिया अतुल कपूर ने कहा कि
“बच्चों की मुस्कान ही इस आयोजन की सबसे बड़ी सफलता है। जब बच्चा हंसता है, तब समाज जिंदा लगता है।”

रीना कपूर गर्ग, डिंपल, डॉ. अजय कक्कड़, हरीश सेठी, धरमपाल अरोड़ा, धीरज सेठी, स्तुति कपूर, शिवाशी, नरेंद्र कुमार, अमित कपूर, संजीव गर्ग, अंशिका गर्ग, ओम कपूर और अंश कपूर सहित अन्य लोगों ने बच्चों के साथ रंग खेलकर यह जताया कि सेवा केवल सहायता नहीं होती, वह अपनापन होती है।
अतुल कपूर ने अपने संबोधन में यह भी कहा कि वे राजनीति को सत्ता का माध्यम नहीं, बल्कि सेवा का औजार मानते हैं।
“जनप्रतिनिधि वही है जो जरूरतमंद के पास पहुंचे, न कि जरूरतमंद को लाइन में खड़ा करे।”

उन्होंने बताया कि अरुणा फाउंडेशन पिछले कई वर्षों से शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सहायता के क्षेत्र में काम कर रही है और त्योहारों को गरीब वर्ग के साथ मनाना उनकी स्थायी परंपरा है।
इस आयोजन में सबसे अहम बात यह रही कि बच्चों को यह एहसास दिलाया गया कि वे समाज के हाशिये पर नहीं हैं। उनके साथ बैठकर रंग खेलना, मिठाई खाना और हंसना — यही वह मनोवैज्ञानिक सहारा है जो किसी योजना या अनुदान से नहीं मिलता।
होली के रंग धीरे-धीरे सूख जाएंगे, लेकिन बच्चों के मन पर जो रंग चढ़ा, वह लंबे समय तक रहेगा — यह भरोसे का रंग है।

कुल मिलाकर, अरुणा फाउंडेशन का यह आयोजन केवल एक सामाजिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि यह संदेश था कि त्योहारों की सार्थकता तभी है जब वे सबसे कमजोर चेहरे तक पहुंचें। और इस संदेश का चेहरा बने अतुल कपूर — जो उस दिन नेता नहीं, बच्चों के बीच बैठा एक इंसान था।





