यूपी

बरेली कैंट में ‘समीकरणों के इंजीनियर’, 2012 के गेम चेंजर, 2027 का गेम पलटने की कर रहे तैयारी, सवर्ण से दलित तक, जानिये अनीस अहमद खां की रणनीति में क्या है खास?

Share now

नीरज सिसौदिया, बरेली
बरेली कैंट विधानसभा सीट सिर्फ एक शहरी सीट नहीं है, बल्कि यह सामाजिक विविधता का प्रतिनिधित्व करती है। यहां हर वर्ग का मतदाता मौजूद है जिनमें व्यापारी, मध्यम वर्ग, दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक शामिल हैं। यही वजह है कि यहां जीतने के लिए केवल एक वर्ग का समर्थन पर्याप्त नहीं होता। एक व्यापक सामाजिक गठजोड़ जरूरी होता है और यही वह क्षेत्र है जहां समाजवादी पार्टी अल्पसंख्यक सभा के प्रदेश उपाध्यक्ष और बरेली कैंट विधानसभा सीट से पार्टी के टिकट के प्रबल दावेदार इंजीनियर अनीस अहमद खां की ताकत नजर आती है।
अनीस अहमद खां की राजनीति को अगर एक लाइन में समझा जाए, तो वह है, समीकरणों को तोड़कर नया समीकरण बनाना। वर्ष
2012 में उन्होंने अपनी इसी राजनीति की बदौलत बिना संसाधनों के चुनावी गणित बदल दिया था। 2022 में उनके टिकट कटने से एक पूरा सामाजिक आधार बिखर गया था और अब 2027 में वह उसी आधार को फिर से जोड़ने की कोशिश में हैं।
अनीस अहमद समाज से गहराई से जुड़े हुए हैं। इनमें दलितों और पिछड़ों के साथ ही वह सवर्ण बिरादरी भी शामिल है जिसे भाजपा का पारंपरिक वोट बैंक माना जाता है। इनमें विशेष तौर पर वैश्य और क्षत्रिय बिरादरियों के लोग शामिल हैं। इंजीनियर अनीस अहमद खां, जो इस बार सिर्फ एक दावेदार नहीं, बल्कि एक व्यापक सामाजिक समीकरण के प्रतिनिधि के तौर पर उभरते नजर आ रहे हैं। यह चुनाव उनके लिए केवल टिकट पाने या जीत हासिल करने का सवाल नहीं है, बल्कि एक ऐसी राजनीतिक पहचान को स्थापित करने का मौका है, जो पारंपरिक जातीय और धार्मिक सीमाओं को तोड़ती है।
इंजीनियर अनीस अहमद खां की सबसे बड़ी ताकत यही मानी जाती है कि उनकी पहुंच सिर्फ मुस्लिम समाज तक सीमित नहीं है। बरेली कैंट जैसे शहरी और मिश्रित सामाजिक संरचना वाले क्षेत्र में उन्होंने दलित, पिछड़े और सवर्ण समाज के बीच भी अपनी मजबूत पकड़ बनाई है। यही वजह है कि उन्हें पारंपरिक “मुस्लिम चेहरा” नहीं, बल्कि “क्रॉस-कम्युनिटी कैंडिडेट” के रूप में देखा जा रहा है। ऐसा क्यों है, इसके लिए अतीत पर एक नजर डालनी होगी।
दरअसल, वर्ष 2012 का विधानसभा चुनाव इंजीनियर अनीस अहमद खां के राजनीतिक करियर का टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ। वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव की यह कहानी बेहद दिलचस्प है। उस समय वे एक सरकारी इंजीनियर थे और बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती ने उन्हें बसपा का टिकट देने का वादा किया था। इस भरोसे पर उन्होंने अपनी स्थायी नौकरी से वीआरएस ले लिया और पूरी तैयारी के साथ चुनावी मैदान में उतरने का मन बना लिया। 2007 से 2012 तक यूपी में बहुजन समाज पार्टी की सरकार थी। इंजीनियर अनीस अहमद पूरे जी-जान से चुनाव लड़ने की तैयारी करने लगे। लेकिन चुनाव से ठीक पहले मायावती अपने वादे से मुकर गईं और इंजीनियर अनीस अहमद को टिकट नहीं दिया। इससे नाराज बसपा के 54 पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया था। इनमें पिछड़े और दलितों के साथ ही क्षत्रिय समाज के नेता भी थे।
यहीं से अनीस अहमद खां की राजनीतिक यात्रा ने एक नया मोड़ लिया। टिकट न मिलने के बावजूद अनीस अहमद खां पीछे नहीं हटे। उन्होंने आईएमसी के समर्थन से निर्दलीय चुनाव लड़ने का फैसला किया। यहां दिलचस्प पहलू यह था कि जिस पार्टी को कट्टर मुस्लिम पार्टी माना जाता था, उसके समर्थन के बावजूद अनीस अहमद के प्रचार में बड़ी संख्या में सवर्ण, दलित और पिछड़े समाज के लोग खुलकर सामने आए। मौलाना तौकीर रजा की पार्टी आईएमसी को कट्टर मुस्लिम पार्टी माना जाता था। इसके बावजूद इंजीनियर अनीस अहमद खां के चुनाव प्रचार में नंद किशोर गुप्ता, रोहित अग्रवाल, ठेकेदार डीएल खट्टर और ठेकेदार भाटिया सहित बड़ी संख्या में सवर्ण, पिछड़े और अल्पसंख्यक चेहरे अपने परिवार के साथ नजर आए। इनमें रोहित अग्रवाल तो तत्कालीन भाजपा उम्मीदवार और यूपी के पूर्व मंत्री राजेश अग्रवाल के भतीजे हैं।
यह इंजीनियर अनीस अहमद खां की राजनैतिक ताकत ही थी जिसने वैश्य समाज से आने वाली पूर्व मेयर सुप्रिया ऐरन को चौथे पायदान पर धकेल दिया था और बसपा उम्मीदवार रामगोपाल मिश्रा पांचवें पायदान पर पहुंच गए थे। इंजीनियर अनीस अहमद खां तीसरे नंबर पर रहे थे। उन्हें 24,353 वोट मिले थे। इस चुनाव में भाजपा के राजेश अग्रवाल 51,893 वोटों के साथ विजयी रहे थे। दूसरे नंबर पर समाजवादी पार्टी के फहीम साबिर रहे जिन्हें 32,944 वोट मिले थे। इंजीनियर अनीस अहमद खां ने हार-जीत के अंतर से अधिक वोट हासिल किए थे। यानि कहा जा सकता है कि इस चुनाव में इंजीनियर अनीस अहमद खां गेम चेंजर साबित हुए थे। यह पहली बार था जब सुप्रिया ऐरन की जमानत तक जब्त हो गई थी। चौथे पायदान पर रहीं सुप्रिया ऐरन को महज 16,310 वोट मिले थे। बसपा उम्मीदवार रामगोपाल मिश्रा की भी जमानत जब्त हो गई थी।
वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में भी इंजीनियर अनीस अहमद खां ने पूरी ताकत से प्रचार किया था। उस वक्त विधानसभा चुनाव से पहले जब इंजीनियर अनीस अहमद खां समाजवादी पार्टी में शामिल हुए थे तो बड़ी तादाद में बसपा कार्यकर्ता भी उनके साथ सपा में शामिल हुए थे। इनमें दलित और पिछड़े समाज के पार्टी पदाधिकारी और कार्यकर्ता शामिल थे। लेकिन जब इंजीनियर अनीस अहमद का टिकट काट दिया गया तो वह निराश हो गए। मौजूदा समय में ये लोग सपा छोड़कर अन्य दलों में शामिल हो चुके हैं। वहीं, इंजीनियर अनीस अहमद के करीबी रहे कुछ पूर्व पार्षद भी सपा छोड़कर दूसरे दलों में चले गए। अब जबकि एक बार फिर से इंजीनियर अनीस अहमद खां बरेली कैंट विधानसभा सीट से सपा के टिकट की दावेदारी जता रहे हैं तो सपा छोड़कर जाने वाले ये सभी पिछड़े, दलित और सवर्ण समाज के नेता और कार्यकर्ता फिर से सपा का दामन थामने की तैयारी कर रहे हैं।
बहरहाल, विधानसभा चुनाव में अब महज 10 माह का समय शेष है लेकिन इंजीनियर अनीस अहमद खां ने एसआईआर के बाद अभी से अपनी तैयारी युद्ध स्तर पर शुरू कर दी है।
इसके तहत उन्होंने चाय पर पीडीए की चर्चा अभियान शुरू कर दिया है। साथ ही संविधान निर्माता बाबा साहेब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर को लेकर वह विशेष अभियान चलाने की तैयारी कर रहे हैं जिसका निर्देश उन्हें पार्टी हाईकमान से मिला है।

Facebook Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *