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कांग्रेस हाईकमान के पास पहुंचा बरेली कैंट सीट का मामला, नवाब मुजाहिद हसन खां ने आला नेताओं के समक्ष रखी बात, सपा से गठबंधन हुआ तो कैंट का दावा कर सकती है कांग्रेस, पढ़ें पिछले दिनों दिल्ली आए नवाब कैसे सेट कर रहे गोटियां?

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नीरज सिसौदिया, बरेली
उत्तर प्रदेश की सियासत में वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर हलचल तेज होती जा रही है। बरेली कैंट विधानसभा सीट पर भी राजनीतिक तापमान बढ़ गया है। अब तक इस सीट पर मुख्य रूप से भाजपा और समाजवादी पार्टी के बीच सीधी टक्कर मानी जा रही थी, लेकिन गठबंधन के गणित ने कांग्रेस की एंट्री को मजबूत कर दिया है। हाल के घटनाक्रमों ने इस धारणा को चुनौती दे दी है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता नवाब मुजाहिद हसन खां की सक्रियता ने इस सीट को संभावित गठबंधन की राजनीति का केंद्र बना दिया है। सूत्र बताते हैं कि पिछले दिनों नवाब मुजाहिद हसन खां दिल्ली गए थे। दिल्ली में उन्होंने पार्टी के कई आला नेताओं और पुराने दिग्गजों से मुलाकात की और उन्हें यह भरोसा दिलाया कि अगर कांग्रेस बरेली कैंट सीट से गठबंधन के तहत चुनाव लड़ती है तो जीतना तय है।
दरअसल, नवाब मुजाहिद हसन खां ने जिस रणनीतिक अंदाज में दिल्ली जाकर कांग्रेस के आला नेताओं के सामने अपनी दावेदारी पेश की है, वह यह संकेत देता है कि आने वाले समय में बरेली कैंट सीट केवल स्थानीय नहीं, बल्कि प्रदेश स्तर की गठबंधन राजनीति का अहम हिस्सा बन सकती है। सूत्रों के मुताबिक, उन्होंने पार्टी के शीर्ष नेताओं से मुलाकात कर यह भरोसा दिलाया कि यदि समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन होता है, तो सीट बंटवारे में बरेली कैंट सीट कांग्रेस के हिस्से में आनी चाहिए।
यह मांग केवल व्यक्तिगत दावेदारी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे ठोस राजनीतिक गणित भी है। सबसे बड़ा फैक्टर है एसआईआर (मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण) के बाद बदला हुआ मतदाता समीकरण। हालांकि अंतिम मतदाता सूची आने में दो दिन शेष हैं। मुस्लिम और विभिन्न जातीय समूहों के वोट में आए बदलाव ने पारंपरिक वोट बैंक की राजनीति को झकझोर दिया है। ऐसे में वह उम्मीदवार, जिसकी व्यक्तिगत पकड़ और सामाजिक नेटवर्क मजबूत हो, वही इस बदले हुए समीकरण को अपने पक्ष में मोड़ सकता है। नवाब मुजाहिद इसी आधार पर खुद को सबसे मजबूत दावेदार के रूप में पेश कर रहे हैं।
दूसरा महत्वपूर्ण पहलू भाजपा के भीतर की स्थिति है। बरेली में भाजपा के मेयर उमेश गौतम और मौजूदा कैंट विधायक संजीव अग्रवाल के बीच की खींचतान किसी से छुपी नहीं है। यह अंदरूनी असंतोष चुनाव के समय पार्टी के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है। इसके साथ ही, प्रदेश की भाजपा सरकार और मौजूदा विधायक संजीव अग्रवाल के खिलाफ एंटी इनकंबेंसी भी भाजपा के लिए चुनौती बन रही है। स्थानीय स्तर पर उनके विरोधियों की संख्या कम नहीं है, जो चुनाव के समय विपक्ष के लिए अवसर पैदा कर सकती है।
तीसरा बड़ा कारण है नेतृत्व का अनुभव और साख। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में नवाब मुजाहिद हसन खां ने सपा-कांग्रेस गठबंधन के प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ा था। उस समय उन्हें 75 हजार से अधिक वोट मिले थे और वे भाजपा के दिग्गज नेता राजेश अग्रवाल से मामूली अंतर से हार गए थे। यह वही राजेश अग्रवाल थे, जिनकी छवि एक अजेय नेता की रही है और जो अपने लगभग तीन दशक से भी अधिक की चुनावी सियासत में कभी भी कोई भी विधानसभा चुनाव नहीं हारे, फिर चाहे वो शहर विधानसभा सीट से लड़े हों या फिर कैंट विधानसभा सीट से। ऐसे में नवाब मुजाहिद का प्रदर्शन अपने आप में उनकी राजनीतिक पकड़ को साबित करता है। कहा यह भी जाता है कि वर्ष 2017 में नवाब मुजाहिद हसन खां चुनाव जीत रहे थे लेकिन प्रदेश में भाजपा को बहुमत मिल चुका था जिसके बाद कुछ देर के लिए मतगणना रोक दी गई और उसके बाद राजेश अग्रवाल को विजेता घोषित कर दिया गया था। हालांकि, मतगणना में किसी भी प्रकार की गड़बड़ी का आधिकारिक तौर पर कोई खुलासा नहीं किया गया था।
अब स्थिति यह है कि राजेश अग्रवाल चुनावी राजनीति से बाहर हो चुके हैं और उनकी जगह संजीव अग्रवाल ने ले ली है, जिनका अनुभव अपेक्षाकृत कम है। दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी और कांग्रेस दोनों के पास ऐसा कोई चेहरा नहीं है जो इस सीट पर नवाब मुजाहिद के कद और राजनैतिक अनुभव की बराबरी कर सके। यही कारण है कि नवाब मुजाहिद इस मौके को अपने लिए “गोल्डन चांस” के रूप में देख रहे हैं।
दिल्ली में उनकी सक्रियता भी इसी रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है। कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं से उनकी पुरानी नजदीकियां रही हैं। पार्टी के पुराने दिग्गजों और राष्ट्रीय स्तर के नेताओं का उनकी कोठी पर भी खूब आना-जाना रहा है। सूत्र बताते हैं कि नवाब मुजाहिद इन्हीं नेताओं से मुलाकात करके आए हैं और उन्होंने इन्हीं रिश्तों का उपयोग करते हुए अपनी बात को मजबूती से रखा है। यह केवल औपचारिक मुलाकात नहीं, बल्कि एक सुनियोजित राजनीतिक प्रयास है, जिसके जरिए वे हाईकमान को यह संदेश देना चाहते हैं कि बरेली कैंट सीट पर कांग्रेस के लिए जीत की संभावनाएं वास्तविक और मजबूत हैं।
हालांकि, इस पूरी कवायद का सीधा असर समाजवादी पार्टी के भीतर भी देखा जा रहा है। सपा के कई स्थानीय दावेदार इस सीट पर टिकट की उम्मीद लगाए बैठे हैं, लेकिन नवाब मुजाहिद की बढ़ती सक्रियता उनके लिए चुनौती बनती जा रही है। यदि गठबंधन होता है और सीट कांग्रेस के खाते में जाती है, तो सपा के दावेदारों की उम्मीदें स्वतः खत्म हो जाएंगी।
वहीं, जमीनी स्तर पर भी नवाब मुजाहिद ने अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। उनके समर्थक सक्रिय हो चुके हैं और डोर-टु-डोर जनसंपर्क एवं बैठकों के साथ ही सोशल मीडिया पर भी उनके पक्ष में माहौल बनाने की कोशिशें तेज कर दी गई हैं। यह स्पष्ट संकेत है कि वे केवल हाईकमान पर निर्भर नहीं रहना चाहते, बल्कि जमीन पर अपनी ताकत दिखाकर भी पार्टी नेतृत्व को प्रभावित करना चाहते हैं।
यही वजह है कि बरेली कैंट सीट पर इस बार मुकाबला केवल पार्टियों के बीच नहीं, बल्कि रणनीतियों के बीच होगा। एक ओर भाजपा अपने संगठन और सत्ता के बल पर चुनावी मैदान में उतरेगी, वहीं सपा और कांग्रेस के संभावित गठबंधन की स्थिति में समीकरण पूरी तरह बदल सकते हैं।
सबसे अहम सवाल यही है कि क्या कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच गठबंधन होता है और अगर होता है, तो सीट बंटवारे में बरेली कैंट किसके हिस्से में जाती है। अगर यह सीट कांग्रेस को मिलती है और नवाब मुजाहिद को उम्मीदवार बनाया जाता है, तो मुकाबला बेहद दिलचस्प और कड़ा हो सकता है।
कुल मिलाकर, बरेली कैंट विधानसभा सीट अब एक सामान्य चुनावी सीट नहीं रह गई है, बल्कि यह प्रदेश की बड़ी सियासी रणनीति का केंद्र बनती जा रही है। नवाब मुजाहिद हसन खां की सक्रियता, भाजपा की आंतरिक स्थिति और बदले हुए वोटर समीकरण इन सभी फैक्टर्स ने इस सीट को 2027 चुनाव का सबसे चर्चित रणक्षेत्र बना दिया है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह सियासी बिसात किसके पक्ष में जाती है और कौन इस हाई-प्रोफाइल मुकाबले में बाजी मारता है।

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