नीरज सिसौदिया, बरेली
बरेली की राजनीति के लिए वर्ष 2026 बेहद निर्णायक साबित होने जा रहा है। वर्ष 2027 की शुरुआत में प्रस्तावित विधानसभा चुनाव अभी भले ही एक साल दूर हों, लेकिन उसकी आहट 2026 में ही साफ़ सुनाई देने लगेगी। यही वह साल होगा जब राजनीतिक दल अपने-अपने पत्ते खोलेंगे, दावेदार खुलकर मैदान में उतरेंगे और टिकट की जंग अपने चरम पर पहुंचेगी। जो नेता पिछले दो-तीन साल से चुपचाप या खुलकर अपने-अपने विधानसभा क्षेत्रों में सक्रिय हैं, उनके लिए 2026 असली इम्तिहान का साल होगा।
अब तक कई नेता संगठन, जनसेवा, आंदोलनों और सामाजिक कार्यक्रमों के जरिए अपनी मौजूदगी दर्ज कराते रहे हैं। लेकिन आने वाले महीनों में यह तय होगा कि कौन सिर्फ दावेदार बनकर रह जाएगा और कौन पार्टी नेतृत्व का भरोसा जीतकर टिकट की रेस में सबसे आगे निकल पाएगा। बरेली की कैंट और शहर विधानसभा सीटों पर यह सियासी मुकाबला सबसे ज्यादा दिलचस्प होने वाला है।
कैंट विधानसभा सीट: सपा के भीतर सबसे बड़ी जंग
कैंट विधानसभा सीट पर समाजवादी पार्टी के भीतर टिकट को लेकर सबसे ज्यादा हलचल है। यहां कई मजबूत चेहरे मैदान में हैं और हर कोई खुद को सबसे बड़ा दावेदार साबित करने में जुटा हुआ है।

डॉक्टर अनीस बेग: लगातार मेहनत, लेकिन असली परीक्षा बाकी
समाजवादी पार्टी के चिकित्सा प्रकोष्ठ के अध्यक्ष डॉक्टर अनीस बेग इस समय कैंट विधानसभा सीट से टिकट के सबसे मजबूत दावेदारों में गिने जा रहे हैं। पिछली बार उन्हें इस सीट से सपा का टिकट मिल चुका था, लेकिन उन्होंने अपने बड़े भाई के लिए वह टिकट त्याग दिया था। उस फैसले के बाद से ही उनकी राजनीतिक भूमिका और भी ज्यादा सक्रिय हो गई।
पिछले दो वर्षों से डॉक्टर अनीस बेग लगातार कैंट विधानसभा क्षेत्र में जनसेवा के कामों में जुटे हुए हैं। स्वास्थ्य शिविर, जरूरतमंदों की मदद और सामाजिक कार्यक्रमों के जरिए उन्होंने अपनी मजबूत पकड़ बनाई है। उनका प्रचार अभियान भी अन्य दावेदारों से काफी आगे निकल चुका है। यही वजह है कि पार्टी के अंदर और बाहर उन्हें टिकट का प्रबल दावेदार माना जा रहा है।
हालांकि, 2026 उनके लिए आसान नहीं होगा। अब तक जिस रफ्तार से उन्होंने काम किया है, उसे न केवल बनाए रखना होगा बल्कि और तेज करना होगा। पार्टी नेतृत्व यह भी देखेगा कि वह अंतिम समय तक कितने सक्रिय और प्रभावी रहते हैं।

राजेश अग्रवाल: जमीनी राजनीति और आंदोलनों की ताकत
समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ पार्षद और शहर विधानसभा सीट से पूर्व प्रत्याशी राजेश अग्रवाल भी इस बार कैंट विधानसभा सीट से टिकट के दावेदार हैं। उन्होंने वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव के तुरंत बाद से ही अपनी तैयारी शुरू कर दी थी। पिछले लगभग तीन दशक से कैंट विधानसभा क्षेत्र ही राजेश अग्रवाल की कर्मभूमि रही है। उन्होंने बीते वर्षों में भाजपा में बड़ी सेंध लगाई है। कई आंदोलनों में उनकी सक्रिय भूमिका रही है। नगर निगम और बरेली विकास प्राधिकरण से जुड़े जन मुद्दों पर उन्होंने लगातार आवाज उठाई है। जमीनी स्तर पर उनकी पकड़ मजबूत मानी जाती है और जनता के बीच उनकी पहचान भी बनी है। राजेश अग्रवाल जमीनी स्तर पर अपनी पकड़ मजबूत बना चुके हैं। अब उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती प्रचार अभियान में भी खुद को नंबर-वन साबित करने की होगी।

इंजीनियर अनीस अहमद: संगठन और पीडीए की रणनीति
इंजीनियर अनीस अहमद खां भी कैंट विधानसभा सीट से टिकट की दौड़ में हैं। रामपुर लोकसभा सीट पर समाजवादी पार्टी की जीत के बाद वह पार्टी नेतृत्व, खासकर अखिलेश यादव की नजरों में आए। इसके बाद से उनकी राजनीतिक सक्रियता और बढ़ गई।
इंजीनियर अनीस अहमद को कैंट विधानसभा सीट के 100 बूथों का एसआईआर प्रभारी बनाया गया है। जब अखिलेश यादव ने पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) का नारा दिया, तब से उन्होंने व्यक्तिगत स्तर पर कैंट विधानसभा क्षेत्र में पीडीए की गणना और रणनीति पर काम शुरू कर दिया था। यही उनकी सबसे बड़ी ताकत मानी जा रही है। हालांकि, उनके सामने भी चुनौतियां कम नहीं हैं। स्थानीय नेताओं को साधना, संगठन के भीतर संतुलन बनाना और प्रचार अभियान को तेज रफ्तार देना उनके लिए जरूरी होगा।
कैंट विधानसभा सीट पर इन तीनों प्रमुख दावेदारों के अलावा कुछ नए चेहरे भी सामने आने की तैयारी में हैं। पार्टी संगठन के कुछ पदाधिकारी अपने निजी हितों के चलते नए दावेदार तैयार करने में लगे हुए हैं। माना जा रहा है कि पंचायत चुनाव के बाद या होली के आसपास इन नए चेहरों को सार्वजनिक रूप से लॉन्च किया जा सकता है। इससे टिकट की जंग और ज्यादा तीखी होने की संभावना है।

कांग्रेस में नवाब मुजाहिद हसन खां की दावेदारी
कैंट विधानसभा सीट पर कांग्रेस का सबसे बड़ा और लगभग एकमात्र चेहरा नवाब मुजाहिद हसन खां हैं। वह अपने आवास पर कई सम्मेलन और बैठकें कर चुके हैं। हालांकि वह खुलकर अपनी दावेदारी की बात नहीं करते, लेकिन इतना जरूर कहते हैं कि अगर पार्टी टिकट देगी तो वह चुनाव लड़ेंगे।
कैंट विधानसभा क्षेत्र में शायद ही कोई ऐसा सामाजिक या राजनीतिक कार्यक्रम होता हो जिसमें नवाब मुजाहिद हसन खां की मौजूदगी न हो। उनकी लगातार सक्रियता यह साफ संकेत देती है कि वह पूरी तरह चुनावी मोड में हैं। उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती समाजवादी पार्टी के वे नेता हैं, जो सपा-कांग्रेस गठबंधन होने की स्थिति में कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ने के इच्छुक हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में कांग्रेस के भीतर भी टिकट को लेकर खींचतान बढ़ सकती है।
शहर विधानसभा सीट: 2026 में बढ़ेगी हलचल
कैंट सीट के मुकाबले शहर विधानसभा सीट पर 2025 तक टिकट को लेकर ज्यादा मारामारी नहीं दिखी। लेकिन 2026 में यहां भी राजनीतिक गतिविधियां तेज होने की पूरी संभावना है।

हसीव खान: संगठन की ताकत, लेकिन बड़ी चुनौती
शहर विधानसभा सीट पर समाजवादी पार्टी का सबसे चर्चित नाम विधानसभा क्षेत्र अध्यक्ष हसीव खान का है। संगठन के पदाधिकारी होने के चलते वह पिछले कई वर्षों से इस क्षेत्र में सक्रिय हैं। एसआईआर प्रक्रिया में उनकी भूमिका की काफी सराहना हुई है। इसके अलावा गरीब बच्चों की मदद और सामाजिक कार्यों के कारण भी उनकी पहचान बनी है।
हालांकि, उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि समाजवादी पार्टी ने परंपरागत रूप से इस सीट से हिंदू उम्मीदवार ही उतारे हैं। इसके अलावा ऐरन परिवार की भी इस सीट पर नजर बताई जाती है। ऐसे में हसीव खान को यह साबित करना होगा कि इस सीट पर मुस्लिम उम्मीदवार भी जीत सकता है।

अब्दुल कय्यूम खां उर्फ मुन्ना और अन्य दावेदार
वरिष्ठ सपा नेता अब्दुल कय्यूम खां उर्फ मुन्ना भी शहर विधानसभा सीट में दिलचस्पी दिखा रहे हैं। महाराष्ट्र प्रदेश सपा अध्यक्ष अबू आसिम आजमी से उनकी नजदीकियां किसी से छिपी नहीं हैं, जो उनकी दावेदारी को मजबूती देती हैं।
इसके अलावा मोहम्मद कलीमुद्दीन का नाम भी चर्चा में है। हालांकि फिलहाल वह उतने सक्रिय नहीं दिख रहे, लेकिन नए साल में उनकी गतिविधियां तेज हो सकती हैं।

हिंदू दावेदारों में गौरव सक्सेना का नाम भी सामने आ रहा है। पार्टी के कुछ पदाधिकारी बताते हैं कि गौरव सक्सेना कैंट विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने की इच्छा रखते हैं। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि पार्टी दो नावों पर सवार रहने वाले नेताओं को कितनी गंभीरता से लेती है।
2026: दावेदारों के लिए निर्णायक साल
कुल मिलाकर, 2026 बरेली की राजनीति में टिकट की असली परीक्षा का साल होगा। यह साल तय करेगा कि कौन नेता सिर्फ दावेदारी तक सीमित रहेगा और कौन जमीन पर अपनी ताकत साबित कर पार्टी नेतृत्व का भरोसा जीतेगा। कैंट और शहर विधानसभा सीटों पर बढ़ती सियासी हलचल यह संकेत दे रही है कि आने वाले महीनों में बरेली की राजनीति और ज्यादा गर्म होने वाली है।





