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सपा की लापरवाही और भाजपा की चालाकी के कारण वर्ष 2017 की जीती हुई बाजी हार गए थे नवाब मुजाहिद हसन खां, गठबंधन ने नवाब को बनाया था उम्मीदवार, फिर भी डॉ. आईएस तोमर करते रहे प्रचार, पढ़ें कैसे शुभलेश यादव ने निभाई थी अहम भूमिका?

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नीरज सिसौदिया, बरेली

बरेली की सियासत में वर्ष 2017 का विधानसभा चुनाव एक ऐसा मोड़ साबित हुआ, जिसने न सिर्फ राजनीतिक समीकरण बदले, बल्कि यह भी दिखाया कि चुनाव में गठबंधन की समझ और रणनीति कितनी अहम होती है। बरेली कैंट सीट से कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के संयुक्त उम्मीदवार बने वरिष्ठ नेता नवाब मुजाहिद हसन खां उस चुनाव में जीत के बेहद करीब पहुंच गए थे। चुनावी माहौल और मतदाताओं की प्रतिक्रिया को देखते हुए यह माना जा रहा था कि नवाब साहब की जीत लगभग तय है, लेकिन अंत में नतीजा उलट गया। इस हार के पीछे दो बड़े कारण सामने आए— समाजवादी पार्टी की संगठनात्मक लापरवाही और भारतीय जनता पार्टी की सोची-समझी चुनावी चालाकी।
कहानी की शुरुआत उस समय से होती है जब कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच गठबंधन को लेकर लगातार बातचीत चल रही थी, लेकिन यह स्पष्ट नहीं था कि किस सीट पर किस पार्टी का उम्मीदवार उतरेगा। इसी असमंजस के बीच बरेली कैंट सीट से समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता डॉ. आईएस तोमर ने अपना नामांकन दाखिल कर दिया। उनका लंबे समय से इस क्षेत्र में राजनीतिक आधार था और वे स्वयं को मजबूत दावेदार मान रहे थे। दूसरी ओर, जैसे ही गठबंधन की घोषणा हुई, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और प्रभावशाली चेहरा नवाब मुजाहिद हसन खां को कैंट सीट से संयुक्त उम्मीदवार बना दिया गया। यह फैसला गठबंधन की राजनीतिक जरूरत थी, लेकिन स्थानीय स्तर पर इससे भ्रम की स्थिति पैदा हो गई।
नामांकन दाखिल हो जाने के बाद उम्मीद यह की जा रही थी कि डॉ. आईएस तोमर सम्मानजनक तरीके से चुनावी मैदान छोड़ देंगे और नवाब साहब के समर्थन में खुलकर प्रचार करेंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। डॉ. तोमर ने अपना नामांकन वापस नहीं लिया और वे लगातार प्रचार में सक्रिय बने रहे। उन्होंने सभाएं कीं, कार्यकर्ताओं से मुलाकात की, और यह संदेश गया कि कैंट सीट पर दो अलग-अलग दावेदार मैदान में हैं। इससे मतदाताओं में भ्रम गहरा गया। यह स्थिति भाजपा के लिए फायदेमंद साबित हो रही थी क्योंकि विपक्ष का वोट बिखरने लगा था।
बताया जाता है कि इस स्थिति पर नवाब मुजाहिद हसन खां ने नाराजगी जताते हुए इसकी शिकायत सीधे समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव से की। यह चुनाव के बीच का समय था और तुरंत निर्णय लेना जरूरी था, इसलिए पार्टी ने तत्काल हस्तक्षेप किया और आईएस तोमर को फटकार लगाते हुए नामांकन वापस लेने को कहा। इसी दौरान पार्टी ने शुभलेश यादव को बरेली का जिला अध्यक्ष बनाया था। चुनाव के दौरान किसी भी नए ज़िलाध्यक्ष पर बड़ी परीक्षा होती है, और इस परिस्थिति में शुभलेश यादव की भूमिका निर्णायक हो गई।
सूत्रों के अनुसार, हाईकमान ने शुभलेश यादव को यह जिम्मेदारी सौंपी कि वे डॉ. आईएस तोमर को चुनाव मैदान से हटाएं और यह सुनिश्चित करें कि यह फैसला सार्वजनिक रूप से घोषित हो। कई दौर की बातचीत और दबाव के बाद अंततः नामांकन के अगले ही दिन डॉ. आईएस तोमर ने अपना नामांकन वापस ले लिया। यहां से स्थिति साफ तो हुई, लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी। चुनाव मैदान में नवाब मुजाहिद के पास प्रभावी प्रचार अभियान चलाने के लिए बहुत कम समय बचा था। जबकि भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार राजेश अग्रवाल उस समय पूरे जोश और रणनीति के साथ चुनाव अभियान चला चुके थे।
इसके बावजूद, नवाब मुजाहिद हसन खां ने जबरदस्त संघर्ष किया। मोहल्लों, बाजारों, गांवों और गलियों में उन्होंने तेज़ी से प्रचार किया। कार्यकर्ताओं का जोश भी चुनाव के अंतिम चरण में बढ़ता गया। यही वजह थी कि मतदान और मतगणना के शुरुआती रुझानों में नवाब साहब आगे चल रहे थे। बताया जाता है कि मतगणना के दौरान एक समय ऐसा आया जब नवाब साहब की जीत लगभग तय मानी जा रही थी। लेकिन इसी बीच कुछ समय के लिए मतगणना रोक दी गई। दोबारा मतगणना शुरू हुई तो तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी थी। अंततः नवाब मुजाहिद हसन खां 12,664 वोटों के अंतर से चुनाव हार गए। यह हार उस समय कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के गठबंधन के लिए भावनात्मक झटका थी, क्योंकि कैंट सीट पर जीत की स्थिति साफ दिख रही थी।
इस चुनाव ने यह साफ कर दिया कि गठबंधन सिर्फ घोषणा से नहीं होता, बल्कि उसकी सफलता पूरी तरह संगठनात्मक अनुशासन, पारदर्शिता और समय पर लिए गए फैसलों पर निर्भर करती है। नवाब साहब का प्रदर्शन यह भी साबित करता है कि बरेली कैंट क्षेत्र में उनका राजनीतिक प्रभाव मजबूत है और जनता के बीच उनकी स्वीकृति अभी भी कायम है।
अब, जब एक बार फिर कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच नए गठबंधन की संभावना बातों से आगे बढ़ रही है, बरेली कैंट सीट की चर्चा फिर गर्म है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बार कैंट और बरेली शहर दोनों सीटें कांग्रेस के खाते में जा सकती हैं। ऐसी स्थिति में नवाब मुजाहिद हसन खां का फिर से उम्मीदवार बनना लगभग तय माना जा रहा है। उनकी राजनीतिक पकड़, जनसंपर्क और समुदायों में मजबूत संवाद क्षमता उन्हें इस सीट पर स्वाभाविक दावेदार बनाती है।
नवाब साहब भी इस बार कोई जोखिम न लेते हुए पहले से ही अपनी रणनीति पर काम कर रहे हैं। वह लगातार क्षेत्र में जनसंपर्क अभियान चला रहे हैं, समुदायों के बीच मौजूदगी बढ़ा रहे हैं, और कार्यकर्ताओं को सक्रिय कर रहे हैं। यह साफ दिख रहा है कि अगर गठबंधन की इस बार सीटों पर स्पष्टता समय रहते हो गई और समाजवादी पार्टी ने वर्ष 2017 की तरह आंतरिक विवाद या भ्रम की स्थिति नहीं बनने दी, तो बरेली कैंट सीट पर परिस्थिति गठबंधन के पक्ष में जा सकती है।
यह सीट आगामी चुनाव में सिर्फ एक विस्फोटक मुकाबला ही नहीं बल्कि राजनीतिक संदेश देने वाली सीट भी होगी। अगर इस बार गठबंधन एकजुट रहकर चुनाव लड़ता है तो संभावना है कि कैंट में इंडिया गठबंधन अपनी उपस्थिति को मजबूत करते हुए जीत का परचम लहरा सकता है।

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