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बरेली की सियासत के सबसे बड़े ‘पठान’ हैं शराफतयार खान, रामपुर में भी रखते हैं दबदबा, कहीं एक तीर से दो निशाने साधने की तैयारी तो नहीं कर रही समाजवादी पार्टी?

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नीरज सिसौदिया, बरेली
बरेली जिले की मीरगंज विधानसभा सीट को लेकर समाजवादी राजनीति एक बार फिर गरमाने लगी है। आगामी 2027 विधानसभा चुनाव से पहले इलाके में सबसे ज्यादा चर्चा जिस नाम की हो रही है, वह है शराफतयार खां। स्थानीय सियासी हलकों में उन्हें बरेली का सबसे बड़ा पठान चेहरा माना जाता है और उनकी पकड़ सिर्फ बरेली तक सीमित नहीं बल्कि रामपुर तक बताई जाती है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या समाजवादी पार्टी इस बार शराफतयार खां पर दांव लगाकर एक साथ दो जिलों में समीकरण मजबूत करने की तैयारी कर रही है?
अगर मीरगंज सीट के पुराने चुनावी आंकड़ों पर नजर डालें तो यहां की राजनीति हमेशा उतार-चढ़ाव भरी रही है। वर्ष 2012 के चुनाव में सपा के जाहिद हुसैन तीसरे स्थान पर रहे थे। उस चुनाव में बहुजन समाज पार्टी के सुल्तान बेग ने जीत हासिल की थी जबकि भारतीय जनता पार्टी के डॉ. डीसी वर्मा दूसरे नंबर पर रहे। इससे पहले 2002 और 2007 में, जब यह सीट कावर विधानसभा के नाम से जानी जाती थी, तब सुल्तान बेग सपा से विधायक बने थे। यानी यह सीट लंबे समय से अलग-अलग दलों के बीच घूमती रही है।
इससे भी पहले का इतिहास देखें तो 1974 से 1991 तक यहां भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का दबदबा रहा। 1991 की राम लहर में भाजपा के सुरेंद्र प्रताप सिंह ने जीत दर्ज की। लेकिन 1993 में बदले राजनीतिक माहौल में सपा के शराफतयार खां विधायक बने और उन्होंने अपनी मजबूत पहचान बनाई। 1996 में पार्टी ने फिर उन पर भरोसा जताया, हालांकि उस बार भाजपा उम्मीदवार ने सीट जीत ली। इसके बाद से सपा ने उन्हें दोबारा मैदान में नहीं उतारा, लेकिन क्षेत्र की राजनीति में उनकी सक्रियता कभी कम नहीं हुई।
पिछले करीब दो दशकों में शराफतयार खां लगातार जनता के बीच सक्रिय रहे। क्षेत्र में होने वाले छोटे-बड़े कार्यक्रमों में उनकी मौजूदगी आम बात रही। लोगों के व्यक्तिगत मामलों से लेकर किसानों की समस्याओं तक, वे प्रशासन के सामने आवाज उठाते रहे। यही वजह है कि चुनाव न लड़ने के बावजूद उनकी जनस्वीकृति बनी रही। स्थानीय लोग बताते हैं कि उनके दरवाजे से कोई खाली नहीं लौटता, और यही उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी है।
एक समय ऐसा भी आया जब पार्टी उन्हें टिकट देने की तैयारी कर रही थी, लेकिन रामपुर की राजनीति में मजबूत पकड़ रखने वाले आज़म खां के प्रभाव के चलते सुल्तान बेग टिकट लेने में सफल हो गए। बाद में 2017 और 2022 के चुनावों में सुल्तान बेग हार गए। इसके बाद उन्होंने भी समझ लिया कि मीरगंज से जीत दोहराना आसान नहीं है और उन्होंने भोजीपुरा सीट से दावेदारी शुरू कर दी। दूसरी ओर शराफतयार खां आज भी मीरगंज से चुनाव लड़ने के इच्छुक बताए जाते हैं। वह पूरी दमदारी से न सिर्फ दावेदारी जता रहे हैं बल्कि अपनी जीत को लेकर आश्वस्त भी नजर आ रहे हैं।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि पिछले बीस वर्षों में समाज में किए गए काम और लगातार सक्रिय रहने की वजह से शराफतयार खां की स्वीकार्यता और मजबूत हुई है। उनकी सरल छवि और सहज उपलब्धता उन्हें जनता से जोड़े रखती है। यही कारण है कि दो दशक बाद भी वे मीरगंज की राजनीति में उतने ही प्रासंगिक माने जाते हैं जितने पहले थे।
समाजवादी पार्टी लंबे समय तक मुस्लिम सामाजिक समीकरण को ध्यान में रखकर टिकट वितरण करती रही है। बरेली जिले की नौ विधानसभा सीटों में से आमतौर पर तीन सीटों पर मुस्लिम उम्मीदवार उतारे जाते रहे हैं। इनमें एक उम्मीदवार बंजारा समाज से, दूसरा अंसारी बिरादरी से और तीसरा पठान या अन्य उच्च वर्ग से होता है। अगर पार्टी इस फार्मूले को फिर अपनाती है तो पठान चेहरे के रूप में शराफतयार खां सबसे मजबूत दावेदार माने जा रहे हैं।
उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि भी राजनीतिक रूप से मजबूत रही है। उनके पिता मिसिरयार खां बरेली के पहले मुस्लिम लोकसभा सदस्य बने थे और परिवार लंबे समय से राजनीति में सक्रिय रहा है। उनके चाचा हामिद रजा खां ने वर्ष 1977 के विधानसभा चुनाव में भोजीपुरा सीट से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव जीतकर इतिहास बनाया था और उस सीट के पहले मुस्लिम विधायक बने थे। इस राजनीतिक विरासत ने भी शराफतयार खां की पहचान को मजबूत किया है।
बरेली और रामपुर दोनों जिलों में पठान मतदाता अच्छी संख्या में हैं और कई सीटों पर उनका वोट निर्णायक माना जाता है। राजनीतिक जानकार कहते हैं कि इन दोनों जिलों में शराफतयार खां की पकड़ बनी हुई है। रामपुर में आज़म खां की राजनीतिक ताकत कमजोर होने के बाद भी शराफतयार खां का प्रभाव कम नहीं हुआ उल्टे उसमें इजाफा ही हुआ है। अपने समाज में उनकी स्वीकार्यता बड़े स्तर पर बताई जाती है। यही कारण है कि अगर उन्हें मीरगंज से टिकट मिलता है तो इसका असर सिर्फ बरेली ही नहीं बल्कि रामपुर की राजनीति पर भी पड़ सकता है।
स्थानीय स्तर पर आर्थिक हालात भी चुनावी मुद्दा बन सकते हैं। मीरगंज क्षेत्र की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से खेती पर निर्भर है। यहां गेहूं, धान और खास तौर पर गन्ने की पैदावार बड़े पैमाने पर होती है। कभी इसी इलाके में एशिया की प्रसिद्ध रबर फैक्ट्री हुआ करती थी, जिससे हजारों लोगों को रोजगार मिलता था, लेकिन लगभग दो दशक पहले उसके बंद हो जाने से इलाके की अर्थव्यवस्था को झटका लगा। आज भी लोग रोजगार और उद्योग की वापसी को बड़ा चुनावी मुद्दा मानते हैं।
ऐसे में राजनीतिक चर्चा यह भी है कि अगर समाजवादी पार्टी शराफतयार खां को मैदान में उतारती है तो वह सिर्फ एक सीट जीतने की रणनीति नहीं होगी, बल्कि बरेली और रामपुर दोनों जिलों में पठान वोट और मुस्लिम समीकरण मजबूत करने की कोशिश होगी। यानी एक तीर से दो निशाने साधने की रणनीति।
फिलहाल पार्टी ने आधिकारिक घोषणा नहीं की है, लेकिन इलाके में सियासी हलचल तेज है। आने वाले महीनों में टिकट को लेकर स्थिति साफ होगी। तब तक मीरगंज की राजनीति में शराफतयार खां का नाम सबसे ज्यादा चर्चा में बना हुआ है और समर्थक मानते हैं कि अगर उन्हें मौका मिला तो यह मुकाबला बेहद दिलचस्प हो सकता है।

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