नीरज सिसौदिया, बरेली
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली उत्तर प्रदेश सरकार के खिलाफ सरकारी अधिकारियों में आक्रोश बढ़ता ही जा रहा है। कुछ अधिकारी खुलेआम सरकार से दो-दो हाथ कर रहे हैं तो कुछ अधिकारी अंदरखाने योगी सरकार के ताबूत में आखिरी कील ठोकने की तैयारी कर रहे हैं। इनमें दो अधिकारी किसी न किसी रूप में बरेली जिले से ताल्लुक रखते हैं। पहले बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती से जुड़े विवाद और संशोधित यूजीसी नियमों के विरोध में इस्तीफा देकर योगी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया तो अब हरदोई जिले के जिला आबकारी अधिकारी केपी सिंह के अखिलेश दरबार में मौजूदगी और उनसे मुलाकात के वीडियो एवं तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हो रही हैं। ये तस्वीरें और वीडियो इसी साल 25 जनवरी की बताई जा रही हैं।
दरअसल, केपी सिंह दलित समाज से ताल्लुक रखते हैं। उनकी पत्नी शालिनी सिंह वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में बरेली जिले की फरीदपुर (सुरक्षित) विधानसभा सीट से बसपा के टिकट पर चुनाव लड़ी थी। कुछ समय पहले ही वह समाजवादी पार्टी में शामिल हो गई।
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मौजूदा समय में उन्हें फरीदपुर विधानसभा सीट से टिकट का दावेदार बताया जा रहा है। बताया जाता है कि अपनी पत्नी को विधानसभा का टिकट दिलाने के लिए ही केपी सिंह 25 जनवरी को सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव के दरबार में हाजिरी लगाने गए थे। इस दौरान की एक वीडियो और तस्वीर वायरल हो रही है जिसमें केपी सिंह नीले रंग के कोट और सफेद रंग की पैंट पहने नजर आ रहे हैं। वीडियो में अखिलेश यादव अपनी कार के बाहर समर्थकों से घिरे नजर आ रहे हैं और कार के दूसरी तरफ केपी सिंह दिखाई दे रहे हैं। वायरल एक तस्वीर में केपी सिंह अपनी पत्नी शालिनी सिंह के साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं। हालांकि इस तस्वीर को केपी सिंह एआई जेनरेटेड और मॉर्फ तस्वीर करार दे रहे हैं लेकिन वीडियो के बारे में पूछने पर वह भड़क जाते हैं। इस बारे में कोई भी बयान देने से इनकार कर देते हैं। केपी सिंह की छटपटाहट और बौखलाहट यह दर्शाती है कि वह नौकरी तो भाजपा सरकार में कर रहे हैं लेकिन उनकी दिलचस्पी योगी सरकार में बिल्कुल नहीं है। केपी सिंह जाटव बिरादरी से आते हैं और अखिलेश यादव पीडीए अभियान के तहत दलितों पर पूरा फोकस बनाए हुए हैं।
बहरहाल, योगी सरकार के अपने ही अधिकारियों ने उनकी नैया डुबोने की तैयारी शुरू कर दी है और उन्होंने अखिलेश यादव के दरबार में हाजिरी लगानी शुरू कर दी है। अखिलेश यादव को अगर इन अधिकारियों का साथ मिल जाएगा तो उनके लिए सत्ता की राह आसान हो सकती है। क्योंकि अखिलेश यादव ही नहीं बल्कि समूचा विपक्ष हमेशा से ही यह आरोप लगाता आ रहा है कि भाजपा प्रशासनिक अधिकारियों के जरिये सत्ता पर काबिज हो रही है। ऐसे में अगर केपी सिंह जैसे अधिकारियों का अप्रत्यक्ष तौर पर समर्थन भी अखिलेश यादव को मिल जाएगा तो योगी सरकार की नैया डूबना तय है। बताया जाता है कि अभी तो शुरुआत है। जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आएंगे, वैसे-वैसे अंदरखाने सरकार का विरोध कर रहे अधिकारी खुलकर योगी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलते नजर आएंगे।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सामने चुनौती दोहरी है। एक ओर उन्हें राजनीतिक विपक्ष से मुकाबला करना है, दूसरी ओर प्रशासनिक तंत्र में विश्वास और अनुशासन बनाए रखना है। यदि अफसरशाही का एक हिस्सा भी असंतुष्ट दिखता है तो विपक्ष इसे बड़े मुद्दे में बदलने की कोशिश करेगा। वहीं सत्ता पक्ष इसे सामान्य और निजी मुलाकात बताकर विवाद को शांत करने की रणनीति अपनाएगा।
फिलहाल वायरल वीडियो और तस्वीरों ने सियासी तापमान बढ़ा दिया है। बरेली से शुरू हुई चर्चा हरदोई तक पहुंच चुकी है और अब यह प्रदेशव्यापी बहस का रूप लेती दिखाई दे रही है। क्या यह वास्तव में सरकार के ताबूत में आखिरी कील ठोकने की तैयारी है या फिर चुनावी मौसम की सामान्य हलचल? इसका जवाब आने वाला समय देगा। लेकिन इतना साफ है कि प्रशासन और राजनीति के बीच की रेखा जितनी धुंधली होगी, उतनी ही तेज होगी सियासत की आंधी आएगी। उत्तर प्रदेश की राजनीति अब एक नए मोड़ पर खड़ी है, जहां हर तस्वीर, हर वीडियो और हर मुलाकात भविष्य के समीकरण लिख सकती है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ केपी सिंह जैसे अधिकारियों से कैसे निपटते हैं।





