नीरज सिसौदिया, बरेली
बरेली कैंट विधानसभा सीट की सियासत इन दिनों एक बार फिर चर्चा में है, और इस चर्चा के केंद्र में सबसे प्रमुख नाम हैं नवाब मुजाहिद हसन खां। दिलचस्प बात यह है कि समाजवादी पार्टी के पास मुस्लिम नेताओं की कमी नहीं है, बल्कि कई चेहरे सक्रिय रूप से अपनी पहचान बनाने में जुटे हुए हैं। इसके बावजूद जब नवाब मुजाहिद हसन खां का नाम सामने आता है, तो बाकी सभी दावेदार उनके सियासी कद के आगे कहीं न कहीं बौने नजर आने लगते हैं।

बरेली की राजनीति को करीब से देखने वाले लोग मानते हैं कि समाजवादी पार्टी के मुस्लिम नेताओं में प्रतिस्पर्धा तो है, लेकिन प्रभाव के मामले में अभी भी एक खालीपन दिखाई देता है। डॉक्टर अनीस बेग ने जरूर पिछले कुछ समय में अपनी सक्रियता बढ़ाई है और खुद को एक मजबूत दावेदार के रूप में स्थापित करने की कोशिश की है। उनके कार्यक्रम, जनसंपर्क और चुनावी सक्रियता ने उन्हें पहचान दिलाई है। यही वजह है कि बरेली कैंट क्षेत्र में वह सपा के प्रमुख मुस्लिम चेहरे के तौर पर उभरते दिख रहे हैं।

वहीं, दूसरी ओर इंजीनियर अनीस अहमद खां का नाम भी कभी मजबूत दावेदारों में लिया जाता था, लेकिन हाल के समय में उनकी सक्रियता कम होती नजर आई है। लंबे समय से उन्होंने कोई बड़ा राजनीतिक कार्यक्रम नहीं किया है और न ही जनमुद्दों को लेकर सड़क पर संघर्ष करते हुए दिखाई दिए हैं। इससे उनकी राजनीतिक पकड़ कमजोर पड़ती हुई दिख रही है। ऐसे में सपा के भीतर मुस्लिम नेतृत्व की जो तस्वीर बनती है, उसमें एक स्थायी और प्रभावशाली चेहरा अब भी पूरी तरह स्थापित नहीं हो पाया है।

यहीं पर नवाब मुजाहिद हसन खां की भूमिका सबसे अहम हो जाती है। उनका नाम बरेली में किसी परिचय का मोहताज नहीं है। जिले के लगभग हर इलाके में लोग उन्हें जानते हैं और उनके राजनीतिक सफर से वाकिफ हैं। इसका कारण सिर्फ उनका लंबा राजनीतिक अनुभव नहीं, बल्कि उनकी सामाजिक पकड़ और व्यक्तिगत छवि भी है।

नवाब मुजाहिद हसन खां का संबंध एक प्रतिष्ठित नवाबी खानदान से है, जिसने उन्हें शुरू से ही एक अलग पहचान दी। लेकिन उन्होंने सिर्फ अपने परिवार की विरासत पर ही भरोसा नहीं किया, बल्कि लगभग पांच दशक की सक्रिय राजनीति के जरिए अपनी अलग पहचान बनाई। कांग्रेस के दौर में वह उन नेताओं में गिने जाते थे, जिनकी पहुंच सीधे राष्ट्रीय स्तर के बड़े नेताओं तक थी। दिग्विजय सिंह, अशोक गहलोत, गुलाम नबी आजाद और रीता बहुगुणा जोशी जैसे दिग्गज नेताओं के साथ उनके करीबी संबंध रहे हैं, ये नेता उनके बरेली स्थित आवास पर भी आ चुके हैं जिससे उनकी राजनीतिक साख और मजबूत हुई।
उनकी पहचान सिर्फ एक राजनेता के रूप में ही नहीं, बल्कि एक ऐसे जननेता के रूप में भी है जो हमेशा जनता के बीच मौजूद रहता है। सड़क पर उतरकर आंदोलनों में भाग लेना, लोगों की समस्याओं को उठाना और उनके समाधान के लिए संघर्ष करना उनकी राजनीति की खास पहचान रही है। यही वजह है कि लोगों के बीच उनकी पकड़ आज भी मजबूत बनी हुई है।

नवाब मुजाहिद हसन खां की सबसे बड़ी ताकत उनकी सर्व स्वीकार्यता है। आमतौर पर देखा जाता है कि मुस्लिम नेताओं को एक खास वर्ग तक सीमित मान लिया जाता है, लेकिन नवाब मुजाहिद का प्रभाव इससे कहीं आगे जाता है। हिंदू समाज के बीच भी उनकी अच्छी पकड़ है और वहां उन्हें स्वीकार्यता मिलती है। यह बात उन्हें बाकी मुस्लिम नेताओं से अलग बनाती है, क्योंकि कई बार अन्य नेताओं को इस तरह की व्यापक स्वीकृति नहीं मिल पाती।
वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों में जब सपा और कांग्रेस के संभावित गठबंधन की चर्चा हो रही है, तब कैंट सीट से उम्मीदवार को लेकर भी कयास लगाए जा रहे हैं। ऐसे में नवाब मुजाहिद हसन खां का नाम सबसे मजबूत दावेदार के रूप में उभरता दिख रहा है। हालांकि उन्होंने अभी तक खुलकर अपनी दावेदारी पेश नहीं की है, लेकिन उनकी सक्रियता इस बात का संकेत जरूर देती है कि वह पूरी तरह राजनीति से दूर नहीं हैं।
समय-समय पर उनके आवास पर होने वाली बैठकों, सामाजिक कार्यक्रमों में उनकी मौजूदगी और लोगों के बीच लगातार संपर्क बनाए रखना इस बात को साबित करता है कि उनकी राजनीतिक जमीन आज भी मजबूत है। हाल ही में रमजान के दौरान भी उन्होंने कई सार्वजनिक कार्यक्रमों में हिस्सा लिया, जिससे उनकी सक्रियता साफ तौर पर दिखाई दी।
कुल मिलाकर देखा जाए तो बरेली कैंट विधानसभा सीट पर मुस्लिम नेतृत्व की बात हो या चुनावी प्रभाव की, नवाब मुजाहिद हसन खां का कद बाकी सभी दावेदारों से बड़ा नजर आता है। समाजवादी पार्टी के अन्य मुस्लिम नेता अभी जहां अपनी पहचान बनाने की कोशिश में लगे हैं, वहीं नवाब मुजाहिद पहले से ही एक स्थापित और भरोसेमंद चेहरा हैं।
अगर आने वाले चुनाव में सपा-कांग्रेस गठबंधन इस सीट से किसी मुस्लिम उम्मीदवार को मैदान में उतारता है, तो नवाब मुजाहिद हसन खां सबसे मजबूत विकल्प साबित हो सकते हैं। उनकी लोकप्रियता, अनुभव और सभी वर्गों में स्वीकार्यता उन्हें इस दौड़ में बाकी नेताओं से आगे खड़ा करती है। यही कारण है कि बरेली की राजनीति में उनका नाम आते ही बाकी दावेदारों का कद छोटा नजर आने लगता है।





