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भाजपा में विधानसभा के टिकट के लिए तेज हुआ सियासी घमासान, पूर्व विधायक से मेयर तक कई चेहरे हैं मैदान में, जानिये शहर, कैंट और बिथरी विधानसभा सीटों से कौन-कौन से दावेदार किस्मत आजमाने को हैं तैयार

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नीरज सिसौदिया, बरेली
उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनावों की सरगर्मी जैसे-जैसे बढ़ रही है, वैसे-वैसे बरेली जिले की सियासत भी दिलचस्प मोड़ लेती जा रही है। खासतौर पर बरेली की शहरी और अर्ध-शहरी सीटों पर भारतीय जनता पार्टी के टिकट को लेकर अंदरूनी हलचल तेज हो गई है। बरेली शहर, बरेली कैंट और बिथरी चैनपुर सीटों पर दावेदारों की लंबी कतार है, जिसमें जातीय समीकरण, संगठन में पकड़, व्यक्तिगत प्रभाव और पुराने-नए चेहरों के बीच प्रतिस्पर्धा साफ दिखाई दे रही है।
यह चुनावी तस्वीर केवल दावेदारों की सूची भर नहीं है, बल्कि यह उस बड़े राजनैतिक समीकरण को भी दर्शाती है जिसमें भाजपा अपने पारंपरिक वोट बैंक को साधने के साथ-साथ नए समीकरणों को भी संतुलित करने की कोशिश कर रही है।
बरेली शहर विधानसभा सीट भाजपा के लिए हमेशा से अहम रही है। इस बार यहां सबसे ज्यादा दावेदार सामने आ रहे हैं, खासकर कायस्थ और पंजाबी समाज से।
इस सीट पर कायस्थ समाज के दावेदारों में सबसे प्रमुख नाम लगातार तीसरी बार विधायक बनने का सपना देख रहे मौजूदा विधायक और वन राज्य मंत्री अरुण कुमार सक्सेना का है।

शहर विधायक अरुण कुमार

एक सिटिंग विधायक होने के नाते उनकी दावेदारी स्वाभाविक रूप से मजबूत मानी जाती लेकिन उम्र संबंधी दायरा पार करने की वजह से उनका टिकट कटने की संभावना प्रबल मानी जा रही है। ठीक उसी तरह जिस तरह पूर्व मंत्री राजेश अग्रवाल का विधानसभा का और संतोष गंगवार का लोकसभा का टिकट काट दिया गया था।

राहुल जौहरी

उनके अलावा राहुल जौहरी, जो भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष रह चुके हैं, भी टिकट की दौड़ में हैं। उनकी पहचान एक बड़े प्रशासनिक और कॉर्पोरेट चेहरे के रूप में है, जो पार्टी को एक नया चेहरा देने का विकल्प बन सकते हैं।

पवन सक्सेना

वरिष्ठ पत्रकार पवन सक्सेना भी इस दौड़ में शामिल बताए जा रहे हैं। मीडिया और समाज में उनकी पकड़ उन्हें एक अलग तरह का उम्मीदवार बनाती है। हालांकि पिछले विधानसभा चुनाव में वह समाजवादी पार्टी से टिकट की दावेदारी जता रहे थे।
इसके अलावा सतीश चंद्र सक्सेना ‘मम्मा’, जो नगर निगम में वरिष्ठ पार्षद और कार्यकारिणी सदस्य हैं, स्थानीय स्तर पर मजबूत पकड़ रखते हैं। मम्मा भी इस सीट पर पूरा जोर लगा रहे हैं। वहीं, राजन विद्यार्थी एक समाजसेवी और पेशेवर चेहरे के तौर पर अपनी दावेदारी पेश कर रहे हैं।

सतीश चंद्र सक्सेना कातिब उर्फ मम्मा

इसके अलावा कई जातियों के दावेदारों की भी कतार लगी हुई है। पंजाबी समाज से भी कई मजबूत नाम सामने हैं। इनमें वरिष्ठ भाजपा नेता गुलशन आनंद, पूर्व महानगर अध्यक्ष डॉ. केएम अरोड़ा, वरिष्ठ भाजपा नेता पवन अरोड़ा और नगर निगम के पूर्व उपसभापति अतुल कपूर शामिल हैं। ये सभी लंबे समय से पार्टी से जुड़े हुए हैं और संगठन में अपनी-अपनी पकड़ रखते हैं।

पूर्व उपसभापति अतुल कपूर

इस बीच बरेली के महापौर डॉ. उमेश गौतम का नाम भी चर्चा में है। वह ब्राह्मण समाज से आते हैं और शहर विधानसभा सीट पर बदलाव की संभावनाओं के बीच शहर सीट पर भी नजरें गड़ाए हुए हैं।
इस तरह बरेली शहर सीट पर जातीय संतुलन, संगठनात्मक अनुभव और जीतने की क्षमता—इन तीनों के बीच पार्टी को संतुलन बनाना होगा, जो आसान नहीं दिखता।
वहीं, बरेली कैंट विधानसभा सीट भाजपा के लिए अपेक्षाकृत स्थिर मानी जाती है, लेकिन यहां भी टिकट को लेकर हलचल है। इस सीट पर वैश्य समाज का प्रभाव माना जाता है। यहां से वैश्य समाज के संजीव अग्रवाल मौजूदा विधायक हैं। संजीव अग्रवाल को एक निष्ठावान और समर्पित नेता के रूप में देखा जाता है। उनकी संघ और संगठन में गहरी पकड़ है। भाजपा की परंपरा भी रही है कि वह सिटिंग विधायक का टिकट नहीं काटती, खासकर तब जब वह क्षेत्र में सक्रिय और लोकप्रिय हो।

संजीव अग्रवाल

किसी विशेष परिस्थितियों में ही टिकट कटता है। संजीव अग्रवाल लगातार क्षेत्र में सक्रिय रहते हैं और जनता के सुख-दुख में शामिल होते हैं, जो उनकी छवि को मजबूत बनाता है। ऐसे में इस सीट से उनका टिकट कटने की कोई संभावना नजर नहीं आती। लेकिन राजनीति में महत्वाकांक्षाएं तो होती ही हैं। ऐसे में इस सीट से कुछ नेता गुपचुप तरीके से भी यहां अपनी संभावनाएं तलाश रहे हैं। इनमें घनश्याम खंडेलवाल और अनुपम कपूर जैसे उद्योगपति शामिल हैं। इनके अलावा बरेली के महापौर डॉ. उमेश गौतम इस सीट पर भी अपनी संभावनाएं तलाश रहे हैं, लेकिन चूंकि यह सीट वैश्य बहुल मानी जाती है, इसलिए प्राथमिकता वैश्य उम्मीदवार को मिलने की संभावना ज्यादा है।

उमेश गौतम, मेयर

इसके अलावा बिथरी चैनपुर विधानसभा सीट पर इस बार सबसे ज्यादा बदलाव की चर्चा है। यहां के मौजूदा विधायक डॉ. राघवेंद्र शर्मा ब्राह्मण समाज से आते हैं, लेकिन क्षेत्र में उनकी पकड़ कुछ कमजोर हुई बताई जा रही है। यह फैक्टर उनके लिए चुनौती बन सकता है।

डॉ. राघवेंद्र शर्मा

पूर्व विधायक राजेश कुमार मिश्रा उर्फ पप्पू भरतौल का नाम इस सीट पर सबसे मजबूत दावेदार के रूप में उभर रहा है। उनकी क्षेत्र में मजबूत पकड़ है और अगर पार्टी बदलाव का फैसला करती है, तो सबसे पहले उनका नाम सामने आ सकता है।
इसके अलावा नारद मुनि का नाम भी चर्चा में है, जो संगठन और व्यक्तिगत नेटवर्क के दम पर अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं। नारद मुनि भूतपूर्व संगठन मंत्री भवानी सिंह के निजी सचिव रह चुके हैं। उनके पिता एक बैंक के डायरेक्टर हैं और वह खुद बड़े पैमाने पर ठेकेदारी करते हैं।

राजेश मिश्रा उर्फ पप्पू भरतौल

चूंकि यह ब्राह्मण सीट है, इसलिए ब्राह्मण होने के नाते मेयर उमेश गौतम इस सीट पर भी अपनी संभावनाएं तलाश रहे हैं। इस प्रकार अपनी अति राजनीतिक महत्वाकांक्षा के चलते उमेश गौतम बरेली की उक्त तीनों विधानसभा सीटों पर नजरें गड़ाए हुए हैं।
बरेली की इन तीनों सीटों पर एक बात साफ नजर आती है कि भाजपा के लिए टिकट वितरण केवल “विजेता उम्मीदवार” चुनने का मामला नहीं है, बल्कि यह एक जटिल सामाजिक और संगठनात्मक संतुलन का सवाल है।
बरेली शहर में कायस्थ बनाम पंजाबी बनाम ब्राह्मण, कैंट में वैश्य वर्चस्व और बिथरी चैनपुर में ब्राह्मण समीकरण। इन सबके बीच पार्टी को यह भी देखना है कि कौन उम्मीदवार संगठन के प्रति कितना निष्ठावान है और किसकी जमीनी पकड़ ज्यादा मजबूत है।
बरेली की राजनीति इस समय एक दिलचस्प दौर से गुजर रही है, जहां भाजपा के अंदर ही टिकट को लेकर प्रतिस्पर्धा चरम पर है।
यह केवल चुनावी तैयारी नहीं, बल्कि यह भी तय करेगा कि पार्टी आने वाले चुनाव में किस रणनीति के साथ मैदान में उतरती है, क्या वह पुराने और अनुभवी चेहरों पर भरोसा करेगी, या नए चेहरों को मौका देगी।
अंततः टिकट किसे मिलता है, यह तो पार्टी नेतृत्व ही तय करेगा, लेकिन इतना तय है कि बरेली की इन सीटों पर मुकाबला केवल विपक्ष से नहीं, बल्कि पार्टी के अंदर भी पूरी तरह से गर्म हो चुका है।

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