यूपी

बिथरी विधानसभा सीट पर नई रणनीति का असर, राजनीतिक समीकरणों, पारिवारिक प्रभाव और जमीनी पकड़ के चलते सबसे मजबूत मानी जा रही डॉक्टर देवेंद्र यादव की दावेदारी, जानिए कैसे?

Share now

नीरज सिसौदिया, बरेली
बरेली जिले की बिथरी चैनपुर विधानसभा सीट पर इस बार समाजवादी पार्टी के भीतर टिकट को लेकर हलचल तेज है, लेकिन तमाम दावेदारों के बीच एक नाम सबसे ज्यादा चर्चा में है- डॉक्टर देवेंद्र यादव। राजनीतिक समीकरणों, पारिवारिक प्रभाव और जमीनी पकड़ को देखते हुए उनकी दावेदारी इस समय सबसे मजबूत मानी जा रही है।
दरअसल, डॉक्टर देवेंद्र यादव को जो बढ़त मिलती दिख रही है, उसके पीछे सिर्फ उनकी व्यक्तिगत सक्रियता नहीं, बल्कि दो बड़े राजनीतिक स्तंभों का समर्थन भी है। एक तरफ पूर्व राज्यसभा सांसद और सपा के राष्ट्रीय सचिव वीरपाल सिंह यादव की रणनीति है, तो दूसरी तरफ पूर्व विधायक महिपाल सिंह यादव का स्थानीय प्रभाव। इन दोनों नेताओं का नेटवर्क और अनुभव मिलकर देवेंद्र यादव के लिए मजबूत आधार तैयार कर रहा है।
डॉक्टर देवेंद्र यादव का पारिवारिक और राजनीतिक रिश्ता भी उन्हें अलग पहचान देता है। वह वीरपाल सिंह यादव के पुत्र और महिपाल सिंह यादव के दामाद हैं। यही वजह है कि उन्हें एक साथ दो मजबूत राजनीतिक धाराओं का समर्थन मिल रहा है- एक संगठनात्मक और दूसरा जमीनी।
अगर बिथरी विधानसभा सीट की सामाजिक संरचना पर नजर डालें, तो यहां की राजनीति काफी जटिल है। कोई भी एक बिरादरी इतनी बड़ी नहीं है कि वह अकेले चुनाव जिता सके। अधिकांश बिरादरियों की संख्या 30-35 हजार के आसपास है। ऐसे में चुनाव जीतने के लिए बहुस्तरीय सामाजिक समीकरण बनाना जरूरी हो जाता है। यही वह जगह है जहां डॉक्टर देवेंद्र यादव की रणनीति फिट बैठती नजर आती है।
इस सीट पर लगभग 30 हजार के आसपास यादव मतदाता हैं, जो पारंपरिक रूप से समाजवादी पार्टी के साथ माने जाते हैं। हालांकि इनमें से 4-5 प्रतिशत वोट इधर-उधर हो जाते हैं, लेकिन फिर भी यह एक मजबूत आधार बनाते हैं। यदि इस आधार के साथ अन्य पिछड़ी और दलित बिरादरियों का समर्थन जुड़ जाए, तो जीत की राह आसान हो सकती है।
डॉक्टर देवेंद्र यादव का असर सिर्फ बिथरी तक सीमित नहीं है। उनका प्रभाव फरीदपुर और आंवला विधानसभा सीटों तक भी माना जाता है। खासकर फरीदपुर में यादव मतदाताओं की संख्या 60 से 70 हजार के बीच बताई जाती है, जो किसी भी चुनाव में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।
फरीदपुर सीट का इतिहास भी इस बात की पुष्टि करता है कि जब वीरपाल सिंह यादव संगठन की कमान संभालते थे, तब पार्टी का प्रदर्शन काफी मजबूत रहा। उनके लंबे कार्यकाल में सपा को सिर्फ एक बार 2007 में हार का सामना करना पड़ा, वह भी बहुजन समाज पार्टी की लहर के दौरान। लेकिन उनके पद से हटने के बाद पार्टी को इस सीट पर 2017 और 2022 में लगातार हार झेलनी पड़ी। इससे साफ है कि संगठनात्मक नेतृत्व और जमीनी पकड़ का चुनावी नतीजों पर सीधा असर पड़ता है।
आंवला विधानसभा सीट की बात करें तो वहां समाजवादी पार्टी लंबे समय से जीत के लिए संघर्ष कर रही है। 1993 में आखिरी बार महिपाल सिंह यादव यहां से जीत दर्ज कर पाए थे। उसके बाद कई चुनावों में अलग-अलग प्रत्याशी उतारे गए, लेकिन सफलता नहीं मिली। हालांकि इस बार मौजूदा विधायक के खिलाफ माहौल बताया जा रहा है, जिससे सपा को उम्मीद है कि वह वापसी कर सकती है।
बिथरी सीट का इतिहास भी दिलचस्प है। यह सीट 2012 में अस्तित्व में आई थी, उससे पहले यह क्षेत्र अलग विधानसभा का हिस्सा था। 2007 में सपा के धर्मेंद्र कश्यप यहां से जीत हासिल कर चुके हैं, लेकिन उसके बाद पार्टी को लगातार हार का सामना करना पड़ा है। 2017 में वीरपाल सिंह यादव खुद मैदान में उतरे, लेकिन जीत नहीं सके, वहीं 2022 में भी पार्टी को हार मिली।
ऐसे में इस बार सपा के लिए यह सीट प्रतिष्ठा का सवाल बन चुकी है। पार्टी को एक ऐसे चेहरे की तलाश है जो न सिर्फ संगठन को एकजुट कर सके, बल्कि विभिन्न बिरादरियों के बीच संतुलन भी बना सके। डॉक्टर देवेंद्र यादव इस कसौटी पर खरे उतरते नजर आ रहे हैं।
उनकी सबसे बड़ी ताकत उनका व्यापक पारिवारिक नेटवर्क है। फरीदपुर क्षेत्र में उनके ससुराल पक्ष का अच्छा खासा प्रभाव है। जगदीश यादव जैसे सक्रिय चेहरे, उनकी पत्नी सरोज यादव और परिवार की अन्य महिला सदस्य जो जिला पंचायत में हैं, यह सभी मिलकर जमीनी स्तर पर मजबूत पकड़ बनाते हैं। वहीं देवेंद्र यादव की पत्नी कंचन यादव जिला पंचायत सदस्य हैं जो वार्ड बिथरी चैनपुर विधानसभा सीट के अंतर्गत आता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर समाजवादी पार्टी बिथरी सीट पर सही सामाजिक समीकरण बैठाने में सफल होती है, तो यह सीट उसके खाते में जा सकती है। डॉक्टर देवेंद्र यादव की उम्मीदवारी इस दिशा में एक मजबूत कदम मानी जा रही है।
कुल मिलाकर, बिथरी चैनपुर सीट पर इस बार मुकाबला दिलचस्प होने जा रहा है। लेकिन जिस तरह से रणनीति, सामाजिक समीकरण और संगठनात्मक समर्थन डॉक्टर देवेंद्र यादव के पक्ष में दिख रहा है, उससे यह साफ है कि वह इस समय सबसे मजबूत दावेदार के रूप में उभर चुके हैं। अब अंतिम फैसला पार्टी नेतृत्व को करना है, लेकिन अगर टिकट उन्हें मिलता है, तो सपा इस सीट पर मजबूत स्थिति में नजर आ सकती है।

Facebook Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *