पटना। बिहार की सियासत इन दिनों हाशिए पर खड़ी नजर आ रही है। सामाजिक बदलाव और के मुद्दे पर भी सियासत चरम पर है। विपक्षी दलों ने सियासत का सिर्फ 1 सूत्री कार्यक्रम विरोध बना लिया है। बात अच्छी हो या बुरी, योजनाएं अच्छी हो या बुरी, अभियान अच्छे हों या बुरे मगर विपक्षी दलों को सिर्फ विरोध की ही राजनीति करनी है। इस का जीता जागता उदाहरण रविवार को बाल विवाह और दहेज प्रथा जैसी सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ सरकार की ओर से आयोजित मानव श्रंखला के दौरान देखने को मिला।
दरअसल, यह पहली बार नहीं है जब बिहार में किसी मुद्दे पर मानव श्रृंखला बनाई गई है। करीब 1 साल पहले जब राजद कांग्रेस और नीतीश कुमार की जदयू कि महागठबंधन की सरकार प्रदेश में थी तब भी यहां मानव श्रृंखला बनाई गई थी। उस वक्त दोनों दलों ने पूरे तन मन के साथ इसमें भाग लिया था। बिहार में जब शराबबंदी की गई थी तब भी कांग्रेस राजद और जदयू के महा गठबंधन की सरकार बिहार में थी। उस वक्त भाजपा विपक्ष में थी लेकिन शराबबंदी जैसे जनहित के नीतीश कुमार सरकार के फैसले का भाजपा ने न सिर्फ समर्थन किया बल्कि उसकी सराहना भी की थी। इससे पहले भी नीतीश सरकार के अच्छे कार्यों को भाजपा ने न सिर्फ सराहा बल्कि उस में कंधे से कंधा मिलाकर सरकार का साथ भी दिया। यही वजह थी कि एक बार भाजपा से नाता तोड़कर महागठबंधन का हिस्सा बनने वाले नीतीश कुमार मैं फिर से भगवा दल से नाता जोड़ लिया।
अब सवाल यह उठता है कि क्या हमेशा विपक्ष का फर्ज सिर्फ विरोध करना है या फिर जनहित के कार्यों में सरकार का साथ देना। निश्चित तौर पर एक अच्छा विपक्ष का फर्ज़ गलत दिशा में जा रही सरकार को रुक कर उसे सही राह दिखाना होता है ना की सरकार के अच्छे कार्यों का भी विरोध कर उसे गलत साबित करना। यह कड़वा सच है कि सिर्फ कानून बनाने से ही कुरीतियां खत्म नहीं होती बल्कि उन्हें खत्म करने के लिए एकजुट प्रयास और जनचेतना की सबसे अहम भूमिका होती है। यह प्रयास किसी एक व्यक्ति या पार्टी के करने से सफल नहीं होता बल्कि पूरे देश को हर वर्ग के लोगों को और हर पार्टी के नेताओं को एकजुट होना पड़ता है।
याद कीजिए राजा राममोहन राय को जो सती प्रथा जैसी कुरीति के खिलाफ न सिर्फ लड़े, न सिर्फ कानून बनवाए बल्कि सामाजिक चेतना और जन जागरूकता के लिए अभियान चलाते गए। यह राजा राममोहन राय की ही देन थी कि आज भारतवर्ष में सती प्रथा जैसी कुरीति का अंत हो चुका है। जब राममोहन राय ने यह बीड़ा उठाया था तो छिटपुट विरोध के साथ ही उन्हें भारी जनसमर्थन भी मिला था तभी वह अपने लक्ष्य को हासिल कर सके। यह बात अगर राजद और कांग्रेस की समझ में आ जाती तो शायद इस मानव श्रृंखला का नजारा ही कुछ और होता। उक्त दोनों दलों के समझ में यह बात नहीं आई कि भले ही यह मानव श्रृंखला नीतीश सरकार और केंद्र सरकार की ओर से बनाई जा रही है लेकिन अंततः इसका लाभ पिछड़े हुए समाज और वर्ग को मिलना है न कि नीतीश कुमार या किसी पार्टी विशेष को।
जब तक सामाजिक मुद्दों पर सियासी स्वार्थ हावी रहेगा तब तक सामाजिक कुरीतियां यूं ही लोगों को निगलती रहेंगी। मानव श्रृंखला ने कांग्रेस और राजद का असली चेहरा बेनकाब कर दिया है। मानव श्रृंखला को अपराध श्रृंखला कहने वाले राजद के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष शिवानंद तिवारी शायद यह नहीं देख सके कि मानव श्रृंखला के का हिस्सा बने जिन लोगों को वह अपराधी बता रहे हैं उनमें छोटे-छोटे मासूम स्कूली बच्चे और मेहनत मजदूरी कर गुजारा करने वाले आम आदमी भी शामिल थे। क्या यह मासूम अबोध बच्चे सच में अपराधी हैं? अगर नहीं तो फिर शिवानंद तिवारी को अपनी बेलगाम जुबान से इन्हें अपराधी कहने का क्या अधिकार है? सियासत में अंधे हो चुके तिवारी को अबोध बच्चों और अपराधियों में फर्क को समझना होगा। अगर वह ऐसा नहीं कर सकते तो उन्हें राजनीति में रहने का कोई हक नहीं। नियति कहती है कि शिवानंद तिवारी उन मासूम बच्चों के अपराधी हैं जिन्हें उन्होंने अपराधी करार दे दिया। एंटी करप्शन फोरम के अध्यक्ष ने यह मांग की है कि शिवानंद तिवारी अपने शब्दों को वापस लेते हुए मानव श्रृंखला का हिस्सा बने आम आदमियों और मासूम बच्चों से माफी मांगें।

कुरीतियों पर सियासत से बेनकाब हुई राजद और कांग्रेस




