नीरज सिसौदिया, बरेली
बरेली जिले की बहेड़ी विधानसभा सीट पर जिस नसीम अहमद की राजनीति कभी तेजी से चमकी थी, आज वही राजनीति धीरे-धीरे बुझती हुई नजर आ रही है। कभी सत्ता, प्रभाव और संगठन में मजबूत पकड़ रखने वाले नसीम अहमद अब हाशिये पर खड़े दिखाई दे रहे हैं। वन विभाग की सुरक्षित नौकरी छोड़कर राजनीति में किस्मत आजमाने वाले नसीम अहमद के लिए अब हालात ऐसे बन गए हैं कि उनका सियासी सफर मानो ढलान पर आ गया है। मौजूदा हालात में उनकी मुश्किलें सिर्फ राजनीतिक नहीं रहीं, बल्कि कानूनी संकट ने भी उनकी राह और कठिन कर दी है।
नसीम अहमद की सियासत के उत्थान और पतन की कहानी बहेड़ी की राजनीति से गहराई से जुड़ी हुई है। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अहम भूमिका बहेड़ी के मौजूदा विधायक और पूर्व मंत्री अता उर रहमान की रही है। कहा जा सकता है कि बहुजन समाज पार्टी (बसपा) छोड़कर समाजवादी पार्टी (सपा) में जाना नसीम अहमद को भारी पड़ गया। इस फैसले के बाद न सिर्फ उनका विधानसभा टिकट हाथ से निकल गया, बल्कि बहेड़ी नगरपालिका की चेयरमैनी भी उनके परिवार के हाथ से फिसल गई। इसके बाद नसीम अहमद की राजनीतिक स्थिति लगातार कमजोर होती चली गई।
नसीम अहमद का राजनीतिक सफर अपने आप में काफी दिलचस्प रहा है। वह वन विभाग में एक पढ़े-लिखे और प्रतिष्ठित अधिकारी थे। आर्थिक रूप से वे पहले से ही मजबूत थे, लेकिन राजनीति में आने की वजह पैसे की कमी नहीं, बल्कि सत्ता और प्रभाव की चाहत थी। यही चाहत उन्हें सरकारी नौकरी छोड़कर राजनीति की ओर ले आई। नौकरी से इस्तीफा देने के बाद उन्होंने बहुजन समाज पार्टी का दामन थामा। उस समय बसपा की मुखिया मायावती थीं और वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने नसीम अहमद को बहेड़ी सीट से पार्टी का उम्मीदवार घोषित कर दिया।
यह वही बहेड़ी सीट थी, जहां से कभी अता उर रहमान बसपा के विधायक रह चुके थे। हालांकि, बाद में उन्होंने बसपा छोड़कर समाजवादी पार्टी का रुख कर लिया था। वर्ष 2017 के चुनाव में बहेड़ी से भाजपा के छत्रपाल गंगवार, सपा के अता उर रहमान और बसपा के नसीम अहमद के बीच त्रिकोणीय मुकाबला हुआ। चुनावी माहौल में नसीम अहमद को लेकर बहेड़ी की जनता में खासा उत्साह देखने को मिला। नतीजा यह रहा कि पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ रहे नसीम अहमद ने शानदार प्रदर्शन करते हुए दूसरा स्थान हासिल किया। भाजपा के छत्रपाल गंगवार को 1,08,846 वोट (43.9 प्रतिशत) मिले और वे विधायक बने। नसीम अहमद को 66,009 वोट (26.6 प्रतिशत) मिले, जबकि अता उर रहमान 63,841 वोट (25.8 प्रतिशत) के साथ तीसरे स्थान पर खिसक गए।
इस चुनाव के बाद नसीम अहमद बहेड़ी की राजनीति में नंबर दो के नेता के रूप में उभरकर सामने आए। इसके बाद बहेड़ी नगरपालिका के चेयरमैन पद के चुनाव हुए। नसीम अहमद ने अपनी पत्नी को उम्मीदवार बनाया और चुनाव में उनकी पत्नी ने जीत दर्ज की। इस जीत के बाद नसीम अहमद का राजनीतिक कद और बढ़ गया। बहेड़ी की राजनीति में उनकी पकड़ मजबूत मानी जाने लगी और वे एक प्रभावशाली नेता के रूप में पहचाने जाने लगे।
लेकिन वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले सियासी हालात बदलने लगे। नसीम अहमद को यह एहसास हो गया था कि बसपा से चुनाव जीतना इस बार आसान नहीं होगा। वहीं, भाजपा से टिकट मिलने की संभावना भी लगभग शून्य थी। ऐसे में उन्हें समाजवादी पार्टी ही एकमात्र मजबूत विकल्प नजर आई। यही वह फैसला था, जिसने आगे चलकर उनकी राजनीति की दिशा बदल दी। नसीम अहमद शायद यह अंदाजा नहीं लगा पाए कि अता उर रहमान जैसे अनुभवी और जमीनी नेता उन्हें इतनी आसानी से बहेड़ी की राजनीति से बाहर नहीं होने देंगे।
नसीम अहमद का आत्मविश्वास इस कदर बढ़ चुका था कि वे चुनाव से ठीक पहले सपा में शामिल हो गए। जिले और प्रदेश के कुछ सपा नेताओं ने उन्हें बड़े-बड़े सपने भी दिखाए। वे सार्वजनिक मंचों से यह दावा करने लगे कि बहेड़ी से सपा का टिकट उन्हें ही मिलेगा और अता उर रहमान की राजनीति अब खत्म होने वाली है। मामला सपा प्रमुख अखिलेश यादव तक पहुंचा। अखिलेश यादव एक ओर अता उर रहमान जैसे पुराने और भरोसेमंद नेता को नाराज नहीं करना चाहते थे, तो दूसरी ओर नसीम अहमद को भी पूरी तरह नजरअंदाज करना उनके लिए जोखिम भरा था।
ऐसे में अखिलेश यादव ने एक राजनीतिक संतुलन साधने की कोशिश की। सपा ने बहेड़ी सीट से अता उर रहमान को ही उम्मीदवार बनाया, जबकि नसीम अहमद को करहल विधानसभा सीट की जिम्मेदारी सौंप दी गई, जहां से खुद अखिलेश यादव चुनाव लड़ रहे थे। साथ ही, यह भरोसा भी दिलाया गया कि अगर सरकार बनी तो नसीम अहमद को मंत्री बनाया जाएगा। लेकिन राजनीति में कहावत है—“जब नौ मन तेल होगा, तब राधा नाचेगी।” यही हाल नसीम अहमद के साथ हुआ। “न नौ मन तेल हुआ और न ही राधा नाची।” अता उर रहमान तो बहेड़ी से चुनाव जीतकर विधायक बन गए, लेकिन प्रदेश में सपा की सरकार नहीं बनी और नसीम अहमद का मंत्री बनने का सपना अधूरा रह गया।
इसके बाद भी नसीम अहमद पूरी तरह नहीं समझ पाए कि राजनीति में उनके साथ क्या हुआ है। कुछ समय बाद फिर बहेड़ी नगरपालिका चेयरमैन के चुनाव आए। इस बार सपा ने नसीम अहमद को उम्मीदवार घोषित किया। यह बात अता उर रहमान को रास नहीं आई। उन्हें यह डर था कि अगर नसीम अहमद या उनका परिवार दोबारा चेयरमैनी हासिल कर लेता है, तो 2027 के विधानसभा चुनाव में उनकी मुश्किलें बढ़ सकती हैं। नतीजतन, आखिरी समय में नसीम अहमद का टिकट काट दिया गया और चेयरमैनी भी उनके हाथ से निकल गई।
यहीं से नसीम अहमद की राजनीति पर मानो ग्रहण लग गया। उन्होंने दोबारा बसपा का रुख किया, लेकिन तब तक हालात काफी बदल चुके थे। बसपा खुद कमजोर दौर से गुजर रही थी। नसीम अहमद का वह रुतबा भी नहीं रहा, जो कभी नगरपालिका चेयरमैन के समय हुआ करता था। धीरे-धीरे वे विवादों में घिरते चले गए। उनके कई पुराने साथी उनका साथ छोड़ चुके हैं और बचे हुए लोग भी नए राजनीतिक ठिकाने तलाश रहे हैं।
अब हालात और गंभीर तब हो गए, जब नसीम अहमद के खिलाफ 25 लाख 50 हजार रुपये की ठगी के आरोप में एफआईआर दर्ज हो गई। इस मुकदमे ने उनकी रही-सही राजनीतिक साख को भी गहरा झटका दिया है। उन पर गिरफ्तारी की तलवार लटक रही है और जनता के बीच उनकी विश्वसनीयता कमजोर पड़ चुकी है।
कुल मिलाकर, नसीम अहमद की सियासत इस वक्त अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रही है। राजनीतिक प्रभाव, संगठन और जनसमर्थन- तीनों ही स्तर पर वे कमजोर नजर आ रहे हैं। इसका सीधा फायदा बहेड़ी की राजनीति में अता उर रहमान को मिलता दिख रहा है। आने वाले विधानसभा चुनाव में यह समीकरण क्या रंग दिखाएगा, यह तो वक्त बताएगा, लेकिन फिलहाल इतना तय है कि नसीम अहमद की राजनीति अब हाशिये पर जा चुकी है।

धीरे-धीरे बुझने लगा है नसीम अहमद की सियासत का चिराग, पहले अखिलेश ने उलझाया फिर अता उर रहमान ने फंसाया, अब ठगी में हो गई एफआईआर, अभी और बढ़ेंगी मुश्किलें, पढ़ें कैसे कमजोर होते जा रहे हैं नसीम अहमद?




