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योगी का प्रदेश, पंकज की परीक्षा, यूपी भाजपा के नए चौधरी के सामने चुनौतियों के पहाड़, पढ़ें क्या-क्या हैं मुश्किलें?

नीरज सिसौदिया, बरेली
भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक अहम और सोच-समझकर लिया गया फैसला करते हुए केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी को प्रदेश भाजपा की कमान सौंपी है। महीनों से प्रदेश अध्यक्ष को लेकर चल रही अटकलों पर इस नियुक्ति के साथ विराम लग गया है, लेकिन इसके साथ ही पार्टी के सामने कई नए राजनीतिक सवाल और चुनौतियां भी खड़ी हो गई हैं। यह फैसला सिर्फ संगठनात्मक बदलाव नहीं है, बल्कि 2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजों, 2026 के पंचायत चुनाव और 2027 के विधानसभा चुनाव की बड़ी रणनीति से जुड़ा हुआ है।
पंकज चौधरी भाजपा के 15वें प्रदेश अध्यक्ष होंगे और उत्तर प्रदेश में पार्टी की कमान संभालने वाले चौथे कुर्मी नेता हैं। वह वर्तमान में नरेंद्र मोदी सरकार में केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री हैं और 2021 से केंद्र सरकार में मंत्री के तौर पर काम कर रहे हैं। संगठन और सरकार—दोनों स्तरों पर उनका अनुभव भाजपा के लिए एक मजबूत पक्ष माना जा रहा है। नामांकन के बाद पंकज चौधरी ने कहा कि पार्टी जो दायित्व देती है, उसे निष्ठा से निभाना उनका कर्तव्य है और वे हमेशा कार्यकर्ताओं के साथ खड़े रहेंगे तथा उनकी बात सुनेंगे।

योगी के साथ तालमेल सबसे बड़ी परीक्षा

पंकज चौधरी के सामने पहली और सबसे अहम चुनौती मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ संतुलन और तालमेल बनाए रखने की है। योगी आदित्यनाथ गोरखपुर से सांसद रह चुके हैं और फिलहाल गोरखपुर शहरी सीट से विधायक हैं, जबकि पंकज चौधरी गोरखपुर से सटे महाराजगंज जिले से सांसद हैं। दोनों का सियासी प्रभाव एक ही इलाके में माना जाता है। राजनीतिक हलकों में पंकज चौधरी को योगी के विरोधी खेमे से जोड़कर भी देखा जाता रहा है, हालांकि योगी के बड़े राजनीतिक कद के सामने उनकी तुलना नहीं की जा सकती। ऐसे में संगठन और सरकार के बीच समन्वय बनाना नए प्रदेश अध्यक्ष के लिए आसान नहीं होगा।

2024 के नतीजों से उपजी बेचैनी

भाजपा इस समय 2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजों से पूरी तरह संतुष्ट नहीं है। उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में समाजवादी पार्टी ने सबसे ज्यादा 37 सीटें जीतीं, जबकि भाजपा 33 सीटों पर सिमट गई। भाजपा के सहयोगियों में अपना दल (एस) को एक, रालोद को दो और आज़ाद समाज पार्टी (कांशीराम) को एक सीट मिली। कांग्रेस के खाते में छह सांसद आए। इन नतीजों ने साफ संकेत दिया कि भाजपा की सामाजिक पकड़, खासकर ओबीसी और ग्रामीण इलाकों में, पहले जैसी मजबूत नहीं रही।

यही वजह है कि पार्टी अब नए सामाजिक और जातीय समीकरण गढ़ने में जुटी है। पंकज चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष बनाना इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।

कुर्मी कार्ड और उसकी सीमाएं

पंकज चौधरी कुर्मी समुदाय से आते हैं, जिसकी गैर-आधिकारिक आबादी उत्तर प्रदेश में करीब सात फीसदी मानी जाती है। यह यादवों के बाद राज्य की दूसरी सबसे प्रभावशाली ओबीसी जाति है। मौजूदा विधानसभा में कुर्मी समुदाय के 41 विधायक हैं—इनमें से 27 भाजपा गठबंधन (जिसमें अपना दल भी शामिल है) से, 13 सपा गठबंधन से और एक कांग्रेस से जीतकर आए हैं। वहीं यादव विधायकों की संख्या 27 है।

हालांकि, कुर्मी वोट कभी भी पूरी तरह एकजुट होकर किसी एक पार्टी के साथ नहीं रहा है। 2024 के लोकसभा चुनाव में इस समुदाय का बड़ा हिस्सा सपा–कांग्रेस गठबंधन की ओर गया। ऐसे में सिर्फ कुर्मी नेता को प्रदेश अध्यक्ष बनाने से पूरा वोट बैंक भाजपा के पक्ष में लौट आएगा, यह मानना जोखिम भरा है। राजनीतिक जानकारों का यह भी कहना है कि पंकज चौधरी कुर्मी समाज के सर्वमान्य नेता नहीं माने जाते।

इसी समुदाय से आने वाले वरिष्ठ नेता और बरेली के पूर्व सांसद संतोष गंगवार का कद पंकज चौधरी से कहीं बड़ा माना जाता था। भाजपा ने संतोष गंगवार को झारखंड का राज्यपाल बनाकर सक्रिय राजनीति से अलग कर दिया है। इसके बाद कुर्मी नेतृत्व का खालीपन भरने की कोशिश के तौर पर पंकज चौधरी को आगे किया गया है।

क्षेत्रीय गणित और पूर्वांचल की अहमियत

पूर्वांचल में कुर्मी आबादी कई मंडलों में प्रभावी मानी जाती है—अयोध्या, देवीपाटन, बस्ती मंडल, लखीमपुर खीरी और पश्चिम के बरेली जैसे इलाकों में यह वोट निर्णायक भूमिका निभाता है। बरेली जिले में तो पिछले करीब 40 वर्षों से अधिकतर कुर्मी नेता ही सांसद बनते आए हैं, सिर्फ एक बार वैश्य समुदाय से आने वाले प्रवीण सिंह ऐरन सांसद बने थे। भाजपा को उम्मीद है कि पंकज चौधरी के जरिए कुर्मी समाज का संपन्न तबका पार्टी के साथ मजबूती से जुड़ा रहेगा और इसका असर खेती-किसानी से जुड़े मतदाताओं पर भी पड़ेगा।

पंचायत चुनाव और टिकट बंटवारे की चुनौती

2026 में प्रस्तावित त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव पंकज चौधरी के लिए पहली बड़ी संगठनात्मक परीक्षा होंगे। पंचायत चुनावों में टिकट वितरण को लेकर असंतोष, गुटबाजी और बगावत की आशंका हमेशा बनी रहती है। बड़ी संख्या में दावेदारों को संतुष्ट करना और पार्टी के भीतर एकजुटता बनाए रखना उनके लिए कठिन चुनौती होगी।

2027 विधानसभा चुनाव: असली अग्निपरीक्षा

2027 का विधानसभा चुनाव पंकज चौधरी के नेतृत्व की असली कसौटी माना जा रहा है। इसके साथ ही योगी सरकार के खिलाफ अगर कोई एंटी-इनकम्बेंसी उभरती है, तो उसे संभालने की जिम्मेदारी भी संगठन के मुखिया के तौर पर उन्हीं पर आएगी।

भाजपा पहले ही पिछड़े वर्गों में संतुलन साधने के लिए कई कदम उठा चुकी है। केशव प्रसाद मौर्य उपमुख्यमंत्री हैं। लोध समुदाय से चौधरी धर्मपाल और संदीप सिंह मंत्री हैं, जिनमें संदीप सिंह पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के पौत्र हैं। ओमप्रकाश राजभर की सुभासपा, संजय निषाद की पार्टी और अपना दल भाजपा के सहयोगी हैं। यहां तक कि 2024 में साथ छोड़ने के बावजूद दारा सिंह चौहान को भाजपा ने मंत्री बनाए रखा है।

पीडीए राजनीति को चुनौती, लेकिन राह आसान नहीं

भाजपा ने पंकज चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर समाजवादी पार्टी की पीडीए (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) राजनीति को सीधी चुनौती देने का संदेश दिया है। लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि ओबीसी वोट बैंक को फिर से पूरी तरह भाजपा के पाले में लाना आसान नहीं होगा।

कुल मिलाकर, पंकज चौधरी की ताजपोशी भाजपा के लिए एक बड़ा राजनीतिक दांव है। संगठन को मजबूत करना, जातीय और क्षेत्रीय संतुलन साधना, सहयोगियों को साथ रखना, योगी सरकार के साथ तालमेल बनाए रखना और चुनावी मोर्चे पर पार्टी को फिर से धार देना—इन सबके बीच नए प्रदेश अध्यक्ष के सामने चुनौतियों का पहाड़ खड़ा है। आने वाले दो-तीन साल यह तय करेंगे कि यह फैसला भाजपा के लिए मास्टरस्ट्रोक साबित होता है या जोखिम भरा प्रयोग।

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