नीरज सिसौदिया, लखनऊ
उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 का विधानसभा चुनाव अभी दूर जरूर है, लेकिन उसकी बिसात अभी से बिछने लगी है। इस बार मुकाबला केवल भाजपा बनाम समाजवादी पार्टी या एनडीए बनाम इंडिया गठबंधन तक सीमित नहीं रहने वाला, बल्कि असली खेल उन छोटे और उभरते दलों के इर्द-गिर्द घूमेगा जिनका प्रभाव भले ही सीमित क्षेत्रों तक हो, लेकिन चुनावी नतीजों को पलटने की ताकत रखते हैं। यही वजह है कि दोनों बड़े गठबंधन—राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) और विपक्षी इंडिया गठबंधन—ऐसे दलों को साथ लाने की कोशिश में जुट गए हैं।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित नेतृत्व वाले छोटे दल अब सिर्फ प्रतीक नहीं, बल्कि निर्णायक शक्ति बनते जा रहे हैं। सर्वजन आम पार्टी जैसी नई ताकतें इस बात का संकेत हैं कि दलित समाज अब परंपरागत राजनीति से आगे बढ़कर अपने अलग राजनीतिक मंच बना रहा है। 2027 का चुनाव इस बदलाव की सबसे बड़ी परीक्षा होगा—जहां हर छोटा दल किसी बड़े की जीत या हार की पटकथा लिख सकता है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यूपी में करीब 21% दलित मतदाता हैं (जनगणना और सामाजिक अध्ययनों के आधार पर अनुमानित)। पिछले चुनावों में दलित वोट बसपा के इर्द-गिर्द केंद्रित रहता था, लेकिन अब यह वोट कई हिस्सों में बंट रहा है। बसपा की संगठनात्मक कमजोरी, नेतृत्व की निष्क्रियता और स्थानीय स्तर पर सक्रिय छोटे दलों की बढ़ती पकड़ ने इस वर्ग को नए विकल्पों की तलाश में लगा दिया है। यही बदलाव 2027 के चुनाव की दिशा तय करेगा।
बता दें कि यूपी में चुनावी गणित अब सीधा नहीं रहा। कई छोटे दल ऐसे हैं जो जातीय और क्षेत्रीय आधार पर मजबूत हैं। उदाहरण के तौर पर—
सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (SBSP): ओमप्रकाश राजभर की पार्टी, पूर्वांचल में राजभर वोटों पर पकड़।
निषाद पार्टी : मछुआरा/निषाद समुदाय के बीच प्रभाव।
सर्वजन आम पार्टी : जयप्रकाश भास्कर का पश्चिमी उत्तर प्रदेश में प्रभाव और प्रदेश के धोबी समाज(दलित)पर पकड़
महान दल: केशव देव मौर्य का दल, पश्चिम यूपी में पिछड़े वर्गों में सक्रिय।
जनवादी पार्टी (सोशलिस्ट): संजय चौहान का प्रभाव पूर्वांचल में।
आजाद समाज पार्टी (कांशीराम): चंद्रशेखर आजाद की दलित युवाओं में पहचान।
इन दलों की खासियत यह है कि ये सीमित सीटों पर लड़ते हैं, लेकिन वोट कटवा या निर्णायक बन जाते हैं।
इस बार दोनों गठबंधनों की सबसे बड़ी चिंता दलित वोटों का बिखराव है। भाजपा 2014 के बाद से दलितों में अपनी पैठ बढ़ाने की कोशिश करती रही है—भीमराव अंबेडकर के नाम पर योजनाएं, दलित आइकन की राजनीति और गैर-जाटव दलितों को साधने की रणनीति के जरिए। वहीं समाजवादी पार्टी भी 2022 के बाद से दलित-पिछड़ा गठजोड़ मजबूत करने में लगी है। ऐसे में छोटे दल, खासकर दलित नेतृत्व वाले, ‘किंगमेकर’ की भूमिका में आ सकते हैं।
इसी राजनीतिक उथल-पुथल के बीच उभरी है सर्वजन आम पार्टी (SAP), जिसके राष्ट्रीय अध्यक्ष जयप्रकाश भास्कर हैं। भास्कर पहले समाजवादी पार्टी में सक्रिय रहे। चुनाव के बाद उन्होंने अलग राह चुनी और अपनी पार्टी बनाई। उनका सामाजिक आधार धोबी समाज है—जो यूपी में अनुसूचित जाति की महत्वपूर्ण उपजाति मानी जाती है। सामाजिक संगठनों और राजनीतिक अध्ययनों के अनुसार धोबी समाज कई जिलों में निर्णायक संख्या में मौजूद है, खासकर पश्चिम और रुहेलखंड क्षेत्रों में।
भास्कर ने पिछले दो वर्षों में संगठन पर खास ध्यान दिया है। पार्टी ने दावा किया है कि वह 50 से अधिक जिलों में यूनिट खड़ी कर चुकी है। ज़मीनी स्तर पर धोबी समाज के सम्मेलन, सामाजिक सम्मान कार्यक्रम और मायावती से नाराज दलित मतदाताओं को जोड़ने की मुहिम ने SAP को तेजी से पहचान दिलाई है।
आजाद समाज पार्टी के नेता चंद्रशेखर आजाद के हालिया विवादों (मीडिया रिपोर्टों में चर्चित आरोपों) के बाद दलित युवाओं का एक वर्ग निराश हुआ है। इसी खाली जगह को SAP भरने की कोशिश कर रही है। भास्कर खुद को “शांत लेकिन संगठित” दलित नेतृत्व के रूप में पेश कर रहे हैं- जहां आक्रोश कम, सामाजिक एकजुटता ज्यादा दिखती है।
भास्कर के समाजवादी पृष्ठभूमि के कारण यह माना जा रहा है कि उनका झुकाव इंडिया गठबंधन की ओर हो सकता है। हालांकि भाजपा भी गैर-जाटव दलितों को साधने के लिए ऐसे चेहरों को साथ लेने में दिलचस्पी दिखा सकती है। अभी तक SAP ने किसी भी बड़े दल के साथ आधिकारिक गठबंधन की घोषणा नहीं की है और न ही इच्छा जताई है। भास्कर का साफ कहना है कि पार्टी उपचुनावों में हिस्सा नहीं लेगी, बल्कि सीधे 2027 के महासंग्राम में उतरेगी। राजनीतिक रणनीतिकारों का अनुमान है कि यदि SAP किसी गठबंधन में शामिल होती है तो उसका असर करीब 40-50 सीटों पर पड़ सकता है- विशेषकर बरेली मंडल, आगरा, अलीगढ़, मुरादाबाद, बदायूं, शाहजहांपुर और पश्चिम यूपी के कुछ इलाकों में।
एनडीए और इंडिया गठबंधन दोनों समझते हैं कि यूपी में चुनाव अब माइक्रो-सोशल इंजीनियरिंग से तय होंगे। जिस गठबंधन के साथ छोटे दल जुड़ेंगे, उसे जातीय संतुलन का सीधा फायदा मिलेगा। यही वजह है कि 2027 का चुनाव “छोटे दलों की बड़ी ताकत” के नाम भी दर्ज हो सकता है।





