नीरज सिसौदिया, नई दिल्ली
उत्तर प्रदेश में वर्ष 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर भारतीय जनता पार्टी ने अभी से कमर कस ली है। सत्ता में रहते हुए तीसरी बार सरकार बनाने की चुनौती को देखते हुए भाजपा इस बार कोई भी ढिलाई नहीं बरतना चाहती। इसी रणनीति के तहत पार्टी अब अपने मौजूदा विधायकों और संभावित प्रत्याशियों की जमीनी परफॉर्मेंस को परखने के लिए दूसरे चरण का व्यापक सर्वे कराने जा रही है। इस सर्वे को लेकर खास तौर पर बरेली जिले के विधायकों में बेचैनी और चिंता साफ देखी जा रही है।
भाजपा का साफ संदेश है कि इस बार टिकट चेहरा देखकर नहीं, बल्कि काम देखकर मिलेगा। यानी जिसने क्षेत्र में काम किया होगा, जनता से जुड़ाव रखा होगा और संगठन को मजबूत किया होगा, वही 2027 में दोबारा मैदान में उतरेगा। जिन विधायकों की परफॉर्मेंस कमजोर पाई जाएगी, उन्हें कुर्सी से हटाया जा सकता है।
दरअसल, भाजपा ने पहले चरण का सर्वे पहले ही पूरा करा लिया है और उसकी रिपोर्ट पार्टी नेतृत्व के पास मौजूद है। अब दूसरे चरण का सर्वे इसलिए कराया जा रहा है ताकि जमीनी हालात की दोबारा पुष्टि हो सके और किसी तरह के पक्षपात या अधूरी जानकारी की गुंजाइश न रहे। इसीलिए पार्टी ने इस बार ‘दोहरा सर्वे मॉडल’ अपनाने का फैसला किया है।
दूसरे चरण का सर्वे फरवरी के दूसरे या तीसरे सप्ताह से शुरू होने की संभावना है। खास बात यह है कि इस बार सर्वे **पहले से अलग एक स्वतंत्र एजेंसी से कराया जाएगा। दोनों एजेंसियों की रिपोर्ट को मिलाकर अंतिम निष्कर्ष निकाला जाएगा। पार्टी नेतृत्व चाहता है कि उम्मीदवारों के चयन में पूरी पारदर्शिता रहे और जनता की नाराजगी को समय रहते समझा जा सके।
बरेली जिला राजनीतिक दृष्टि से बेहद अहम माना जाता है। यहां कुल 9 विधानसभा सीटें हैं- बरेली शहर, बरेली कैंट, बिथरी चैनपुर, भोजीपुरा, नवाबगंज, मीरगंज, फरीदपुर, आंवला और बहेड़ी। इन नौ सीटों में से भोजीपुरा और बहेड़ी पर समाजवादी पार्टी के विधायक हैं, जबकि बाकी सीटों पर भाजपा का कब्जा रहा है।
पार्टी सूत्रों की मानें तो बरेली जिले में कई भाजपा विधायकों की परफॉर्मेंस को लेकर संगठन के भीतर ही सवाल उठ रहे हैं। माना जा रहा है कि अगर सर्वे निष्पक्ष तरीके से हुआ तो कई मौजूदा विधायकों का टिकट कट सकता है।
सूत्रों के अनुसार, बरेली जिले में जिन विधायकों की परफॉर्मेंस पर सवाल उठ रहे हैं, उनमें बिथरी चैनपुर के विधायक राघवेंद्र शर्मा, नवाबगंज के विधायक डॉ. एमपी आर्या, मीरगंज के विधायक डीसी वर्मा और बरेली शहर के विधायक डॉ. अरुण कुमार सक्सेना शामिल हैं।
इन विधायकों को लेकर पार्टी के अंदर यह चर्चा है कि क्षेत्र में बड़े और ठोस विकास कार्य नजर नहीं आते। जनता से संवाद सीमित रहा है और कई इलाकों में संगठन भी कमजोर पड़ा है। ऐसे में सर्वे रिपोर्ट इनके लिए मुश्किलें बढ़ा सकती है।
बरेली शहर विधानसभा सीट से विधायक डॉ. अरुण कुमार सक्सेना की स्थिति थोड़ी अलग मानी जा रही है। वह अब तक अपने व्यक्तिगत व्यवहार, सरल स्वभाव और लोगों के सुख-दुख में शामिल होने के कारण चुनाव जीतते आए हैं। हालांकि इस बार वह वन राज्य मंत्री भी हैं, इसके बावजूद शहर विधानसभा क्षेत्र को कोई बड़ा या ऐतिहासिक प्रोजेक्ट नहीं दिला पाए।
पार्टी के भीतर यह सवाल उठ रहा है कि मंत्री पद पर रहने के बावजूद अगर क्षेत्र को ठोस विकास कार्य नहीं मिल पाए, तो इसका सीधा असर चुनावी गणित पर पड़ सकता है। हालांकि यह भी माना जा रहा है कि उनकी व्यक्तिगत लोकप्रियता उन्हें कुछ हद तक राहत दिला सकती है, लेकिन अंतिम फैसला सर्वे रिपोर्ट पर ही निर्भर करेगा।
फरीदपुर विधानसभा सीट से भाजपा विधायक श्याम बिहारी लाल का हाल ही में निधन हो चुका है। ऐसे में इस सीट पर नया समीकरण बन रहा है। पार्टी के अंदर चर्चा है कि उनके पुत्र को उम्मीदवार बनाया जा सकता है, लेकिन यह भी सर्वे और स्थानीय फीडबैक पर निर्भर करेगा। भाजपा इस सीट पर सहानुभूति लहर के साथ-साथ संगठन की राय को भी महत्व देगी।
यह सर्वे केवल विधायकों की व्यक्तिगत परफॉर्मेंस तक सीमित नहीं रहेगा। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, इसमें हाल के विवादों और उनसे पैदा हुए जन असंतोष का भी आकलन किया जाएगा। खास तौर पर मणिकर्णिका घाट पर हुई कथित तोड़फोड़, प्रयागराज में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद द्वारा सरकार के विरोध और यूजीसी से जुड़े हालिया विवाद के बाद सामान्य वर्ग में जो नाराजगी देखी जा रही है, उसका असर कितना गहरा है, इसे भी परखा जाएगा।
भाजपा नेतृत्व चाहता है कि इन मुद्दों से पार्टी को कितना नुकसान हो सकता है, इसका अंदाजा समय रहते लगाया जाए और रणनीति में जरूरी बदलाव किए जाएं।
दूसरे चरण का यह सर्वे केवल बरेली या कुछ जिलों तक सीमित नहीं रहेगा। भाजपा प्रदेश की सभी 403 विधानसभा सीटों का आकलन कराएगी। इसके साथ ही सहयोगी दलों- रालोद, सुभासपा, अपना दल (एस) और निषाद पार्टी के प्रभाव वाली सीटों पर भी विशेष नजर रखी जाएगी।
सर्वे के दौरान केवल विधायकों से ही नहीं, बल्कि जिला और मंडल स्तर के पदाधिकारियों, बूथ कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं से भी फीडबैक लिया जाएगा। इसके अलावा आरएसएस के कार्यकर्ताओं, आम जनता और विभिन्न सामाजिक वर्गों से संवाद किया जाएगा, ताकि जमीनी हकीकत सामने आ सके।
इस बार सर्वे को पूरी तरह प्रोफेशनल तरीके से कराने की तैयारी है। सूत्रों के अनुसार, 400 से ज्यादा सर्वे एजेंट इस काम में लगाए जाएंगे। इनमें दिल्ली विश्वविद्यालय के पॉलिटिकल साइंस के छात्र, आईआईएम लखनऊ और आईआईटी कानपुर जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों के छात्र भी शामिल होंगे।
भाजपा के एक वरिष्ठ प्रदेश पदाधिकारी के मुताबिक, प्रोफेशनल सर्वे से उम्मीदवारों की छवि, सामाजिक समीकरण, अंदरूनी विरोध और जनता की वास्तविक राय को बेहतर ढंग से समझा जा सकता है। उन्होंने कहा कि इस सर्वे का मकसद किसी को हटाना नहीं, बल्कि पार्टी को मजबूत बनाना है।
कुल मिलाकर, भाजपा का यह दूसरा चरण का सर्वे साफ संकेत देता है कि पार्टी 2027 के चुनाव से पहले बड़े और कड़े फैसले लेने के मूड में है। बरेली जिले में जिन विधायकों की परफॉर्मेंस कमजोर मानी जा रही है, उनके लिए आने वाले महीने बेहद अहम होने वाले हैं। सर्वे रिपोर्ट तय करेगी कि कौन टिकट की दौड़ में बना रहेगा और किसे बाहर का रास्ता दिखाया जाएगा।
भाजपा नेतृत्व यह मानकर चल रहा है कि अगर समय रहते जमीनी असंतोष को पहचान लिया गया और कमजोर कड़ियों को बदला गया, तो 2027 में सत्ता बरकरार रखना आसान हो सकता है। अब सबकी निगाहें इसी बात पर टिकी हैं कि सर्वे का नतीजा क्या आता है और बरेली की राजनीति में इसका क्या असर पड़ता है।





