नीरज सिसौदिया, बरेली
उत्तर प्रदेश की राजनीति में वर्ष 2027 के विधानसभा चुनावों की आहट अब साफ सुनाई देने लगी है। लोकसभा चुनाव 2024 में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस गठबंधन के बेहतर प्रदर्शन से उत्साहित कांग्रेस अब प्रदेश में अपनी खोई जमीन वापस पाने की रणनीति पर तेजी से काम कर रही है। यही वजह है कि पार्टी ने उन सीटों पर विशेष फोकस शुरू कर दिया है, जहां पिछली बार मामूली अंतर से हार मिली थी। इस रणनीति के बीच सहारनपुर लोकसभा सीट से कांग्रेस सांसद इमरान मसूद का 13 मई को बरेली दौरा राजनीतिक हलकों में चर्चा का बड़ा विषय बन गया है।
बताया जा रहा है कि इमरान मसूद बरेली कैंट विधानसभा क्षेत्र के दिग्गज कांग्रेस नेता और पूर्व प्रत्याशी नवाब मुजाहिद हसन खां के आवास पर पहुंचेंगे। आधिकारिक तौर पर इस दौरे को निजी मुलाकात बताया जा रहा है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसे कांग्रेस की 2027 की रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। खासकर इसलिए क्योंकि पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव संपन्न होने के बाद कांग्रेस का पूरा फोकस अब उन राज्यों पर है, जहां अगले दो वर्षों में चुनाव होने हैं।
हाल ही में हुए विधानसभा चुनावों ने कांग्रेस को नई ऊर्जा दी है। केरल में कांग्रेस नीत यूडीएफ गठबंधन की शानदार वापसी ने पार्टी कार्यकर्ताओं में नया उत्साह भर दिया है। वहीं तमिलनाडु में अभिनेता से नेता बने विजय के नेतृत्व वाली पार्टी को समर्थन देकर कांग्रेस ने सत्ता में अपनी भागीदारी बनाए रखी है। इन नतीजों के बाद कांग्रेस नेतृत्व अब उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गुजरात, मणिपुर और गोवा जैसे राज्यों पर नजरें टिकाए हुए है, जहां अगले वर्ष विधानसभा चुनाव होने हैं।
इन सभी राज्यों में उत्तर प्रदेश सबसे बड़ा और राजनीतिक रूप से सबसे अहम राज्य माना जाता है। 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा-कांग्रेस गठबंधन ने भाजपा को कड़ी चुनौती देकर राज्य की राजनीति में बड़ा संदेश दिया था। इसी सफलता ने कांग्रेस को यह भरोसा दिलाया है कि अगर सही सामाजिक और राजनीतिक समीकरण साधे जाएं तो पार्टी विधानसभा चुनाव में भी मजबूत वापसी कर सकती है।
यही वजह है कि अब कांग्रेस के बड़े नेता प्रदेश की राजनीतिक नब्ज टटोलने में जुट गए हैं। सहारनपुर से सांसद इमरान मसूद का बरेली दौरा भी इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुस्लिम राजनीति और जमीनी पकड़ रखने वाले नेताओं में इमरान मसूद का नाम काफी प्रभावशाली माना जाता है। सहारनपुर से सांसद बनने के बाद उनका राजनीतिक कद और बढ़ा है। ऐसे में उनका बरेली पहुंचना केवल एक औपचारिक मुलाकात नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे कांग्रेस के संगठनात्मक और चुनावी सर्वे से जोड़कर देखा जा रहा है।
बरेली कैंट विधानसभा सीट की बात करें तो यहां नवाब मुजाहिद हसन खां का प्रभाव लंबे समय से बना हुआ है। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने सपा-कांग्रेस गठबंधन के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा था और भाजपा के वरिष्ठ नेता राजेश अग्रवाल को बेहद कड़ी टक्कर दी थी। उस चुनाव में नवाब मुजाहिद भले जीत हासिल नहीं कर पाए, लेकिन उन्होंने यह साबित कर दिया था कि बरेली कैंट जैसी परंपरागत भाजपा सीट पर भी कांग्रेस मजबूत लड़ाई लड़ सकती है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नवाब मुजाहिद हसन खां की सबसे बड़ी ताकत केवल मुस्लिम वोट बैंक नहीं है, बल्कि हिंदू समाज में भी उनकी अच्छी पकड़ मानी जाती है। वर्ष 2017 के चुनावों में उन्हें हिन्दू बाहुल्य उन इलाकों से भी वोट मिले थे जो भाजपा का कोर वोट बैंक वाला क्षेत्र माना जाता है। यही कारण है कि अगर 2027 में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन होता है, तब भी कैंट विधानसभा सीट पर उनकी दावेदारी काफी मजबूत मानी जा रही है। दोनों दलों में फिलहाल ऐसा कोई मुस्लिम चेहरा नहीं दिखता, जिसकी सामाजिक स्वीकार्यता और जमीनी प्रभाव नवाब मुजाहिद के बराबर हो।
सूत्रों के अनुसार, कांग्रेस इस समय उन विधानसभा सीटों का विशेष अध्ययन कर रही है, जहां वर्ष 2017 के चुनाव में पार्टी उम्मीदवार 10 से 15 हजार वोटों के अंतर से हारे थे। बरेली कैंट विधानसभा सीट भी इसमें शामिल है। पार्टी का मानना है कि यदि इन सीटों पर मजबूत स्थानीय चेहरों को आगे किया जाए और गठबंधन की स्थिति में सही सीट बंटवारा हो, तो कांग्रेस अपने प्रदर्शन में बड़ा सुधार कर सकती है। इसी वजह से पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को विभिन्न जिलों में भेजा जा रहा है, ताकि जमीनी फीडबैक लिया जा सके।
बरेली का राजनीतिक महत्व भी कांग्रेस के लिए कम नहीं है। रोहिलखंड क्षेत्र की राजनीति में बरेली हमेशा से प्रभावशाली केंद्र रहा है। यहां का राजनीतिक संदेश आसपास के जिलों तक असर डालता है। कांग्रेस जानती है कि अगर उसे उत्तर प्रदेश में दोबारा मजबूत होना है तो उसे केवल बड़े शहरों में ही नहीं, बल्कि उन सीटों पर भी मजबूती दिखानी होगी जहां वह पहले मजबूत चुनौती देती रही है।
इमरान मसूद का यह दौरा ऐसे समय हो रहा है जब उत्तर प्रदेश में विपक्षी राजनीति नए समीकरणों की तलाश में है। समाजवादी पार्टी जहां अपने संगठन को और मजबूत करने में जुटी है, वहीं कांग्रेस भी अब “सहयोगी दल” की भूमिका से आगे निकलकर अपनी स्वतंत्र राजनीतिक ताकत दिखाने की तैयारी कर रही है। हालांकि पार्टी नेतृत्व गठबंधन की संभावनाओं को पूरी तरह खारिज नहीं कर रहा, लेकिन वह उन सीटों पर अपनी दावेदारी मजबूत करना चाहता है जहां स्थानीय स्तर पर कांग्रेस का प्रभाव अब भी कायम है।
दिलचस्प बात यह भी है कि कांग्रेस अब केवल चुनावी भाषणों तक सीमित नहीं रहना चाहती। पार्टी जमीनी स्तर पर सामाजिक समीकरण, जातीय संतुलन और स्थानीय नेताओं की स्वीकार्यता का गंभीर अध्ययन कर रही है। ऐसे में इमरान मसूद जैसे नेताओं के दौरे भविष्य की रणनीति का हिस्सा माने जा रहे हैं।
भले ही नवाब मुजाहिद हसन खां इस मुलाकात को निजी दौरा बता रहे हों, लेकिन राजनीतिक हलकों में इसे 2027 की तैयारी का शुरुआती संकेत माना जा रहा है। आने वाले महीनों में कांग्रेस के कई बड़े नेताओं के प्रदेश के अलग-अलग जिलों में दौरे होने की संभावना है। ऐसे में बरेली की यह मुलाकात केवल एक शिष्टाचार भेंट नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश की बदलती राजनीति का संकेत भी मानी जा रही है।




