नीरज सिसौदिया, बरेली
उत्तर प्रदेश की राजनीति में कुछ विधानसभा सीटें ऐसी होती हैं, जिनका असर केवल एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उनके परिणाम पूरे इलाके की राजनीतिक दिशा तय करते हैं। बरेली जिले की बिथरी चैनपुर विधानसभा सीट भी ऐसी ही सीट मानी जाती है। रोहिलखंड की राजनीति में इस सीट का महत्व हमेशा खास रहा है। अब जैसे-जैसे वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव नजदीक आते जा रहे हैं, वैसे-वैसे इस सीट को लेकर राजनीतिक हलचल तेज होती दिखाई दे रही है। सबसे ज्यादा चर्चा जिस नाम की हो रही है, वह हैं डॉ. देवेंद्र यादव। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अगर समाजवादी पार्टी ने उन्हें मैदान में उतार दिया, तो बिथरी चैनपुर सीट पर सपा की जीत केवल संभावना नहीं बल्कि लगभग तय मानी जा सकती है।
इस पूरे सियासी गणित को समझने के लिए वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव की तरफ लौटना जरूरी है। वह दौर भाजपा के सबसे मजबूत राजनीतिक दौरों में से एक माना जाता है। पूरे देश में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता चरम पर थी और उत्तर प्रदेश में भी भाजपा जबरदस्त लहर पर सवार थी। दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी सत्ता विरोधी माहौल से जूझ रही थी। ऐसे कठिन समय में समाजवादी पार्टी ने बिथरी चैनपुर सीट से पूर्व सांसद वीरपाल सिंह यादव को मैदान में उतारा था। भाजपा ने अपने मजबूत और दबंग छवि वाले नेता राजेश कुमार मिश्रा उर्फ पप्पू भरतौल पर दांव लगाया था, जबकि बसपा की ओर से तत्कालीन विधायक वीरेंद्र सिंह चुनाव मैदान में थे।
उस चुनाव में भाजपा उम्मीदवार पप्पू भरतौल को 96 हजार से ज्यादा वोट मिले और उन्होंने जीत दर्ज की, लेकिन असली कहानी उस चुनाव के आंकड़ों के भीतर छिपी हुई थी। समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार वीरपाल सिंह यादव ने बेहद प्रतिकूल माहौल में भी करीब 77 हजार वोट हासिल किए थे। वहीं तत्कालीन विधायक और बसपा उम्मीदवार वीरेंद्र सिंह ने 53 हजार से ज्यादा वोट लेकर मुकाबले को पूरी तरह त्रिकोणीय बना दिया था। यही वह बिंदु था जिसने सपा की जीत का रास्ता रोक दिया। अगर उस चुनाव में बसपा का वोट बैंक सपा की ओर शिफ्ट हो जाता, तो परिणाम पूरी तरह अलग हो सकते थे। यानी भाजपा की जीत जितनी उसकी ताकत की कहानी थी, उतनी ही बसपा उम्मीदवार वीरेंद्र सिंह की निर्णायक भूमिका की भी कहानी थी।
2017 के चुनाव परिणाम-
| पार्टी | उम्मीदवार | प्राप्त वोट | वोट प्रतिशत |
|---|---|---|---|
| भाजपा | राजेश कुमार मिश्रा (पप्पू भरतौल) | 96,397 | 41.03% |
| सपा | वीरपाल सिंह यादव | 76,886 | 32.72% |
| बसपा | वीरेंद्र सिंह | 53,286 | 22.68% |
वीरेंद्र सिंह केवल बसपा के उम्मीदवार नहीं थे, बल्कि बिथरी की राजनीति में उनका अपना अलग सामाजिक प्रभाव था। दलित समाज में उनकी मजबूत पकड़ थी और कुछ अन्य वर्गों में भी उनकी स्वीकार्यता थी। यही वजह थी कि भाजपा लहर के बावजूद वे 22 प्रतिशत से ज्यादा वोट हासिल करने में सफल रहे। लेकिन समय के साथ राजनीति बदलती चली गई। वर्ष 2022 आते-आते तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी थी। तब तक वीरेंद्र सिंह का स्वास्थ्य कारणों के चलते निधन हो चुका था। उनकी जगह उनके पुत्र आशीष पटेल मैदान में उतरे। लेकिन वे अपने पिता की राजनीतिक विरासत को वोटों में बदल नहीं सके। जहां वर्ष 2017 में बसपा को 53 हजार वोट मिले थे, वहीं 2022 में यह आंकड़ा घटकर महज 22 हजार तक सिमट गया।
2022 के चुनाव परिणाम-
| पार्टी | उम्मीदवार | प्राप्त वोट | वोट प्रतिशत |
|---|---|---|---|
| भाजपा | डॉ. राघवेंद्र शर्मा | 115,417 | 46.53% |
| सपा | अगम कुमार मौर्य | 99,576 | 40.15% |
| बसपा | आशीष पटेल | 22,727 | 9.16% |
दिलचस्प बात यह रही कि उस समय माहौल 2017 जैसा नहीं था। समाजवादी पार्टी का ग्राफ ऊपर जा रहा था। भाजपा के खिलाफ कई इलाकों में नाराजगी भी दिखाई दे रही थी। भाजपा की ओर से इस बार पप्पू भरतौल जैसा आक्रामक और जमीनी पकड़ वाला चेहरा भी मैदान में नहीं था। इसके बावजूद समाजवादी पार्टी जीत हासिल नहीं कर सकी। सपा उम्मीदवार अगम कुमार मौर्य लगभग 16 हजार वोटों से चुनाव हार गए। यही वह चुनाव था जिसने समाजवादी पार्टी को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि केवल माहौल के भरोसे चुनाव नहीं जीते जा सकते, बल्कि सही उम्मीदवार का चयन सबसे बड़ा फैक्टर होता है।
वर्ष 2022 में कई ऐसे बूथ थे, जहां 2017 में बेहद विपरीत परिस्थितियों के बावजूद वीरपाल सिंह यादव ने बढ़त बनाई थी, लेकिन अगम मौर्य वहां पिछड़ गए। इससे साफ संकेत मिला कि संगठनात्मक पकड़ और उम्मीदवार की स्वीकार्यता दोनों में फर्क था। यही वजह है कि अब 2027 के चुनाव को लेकर पार्टी के भीतर नए चेहरे की चर्चा शुरू हुई और धीरे-धीरे डॉ. देवेंद्र यादव का नाम सबसे मजबूत दावेदार के रूप में सामने आने लगा।
डॉ. देवेंद्र यादव की सबसे बड़ी ताकत केवल उनका राजनीतिक परिवार नहीं है, बल्कि उनकी साफ-सुथरी छवि और युवाओं के बीच बढ़ती स्वीकार्यता भी है। वर्तमान दौर की राजनीति में युवा नेतृत्व तेजी से महत्वपूर्ण होता जा रहा है। समाजवादी पार्टी भी अब ऐसे चेहरों को आगे बढ़ाना चाहती है जो परंपरागत वोट बैंक के साथ नए मतदाताओं को भी आकर्षित कर सकें। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी तेजी से फैल रही है कि भाजपा के कई स्थानीय नेता भी नहीं चाहते कि मुकाबला सीधे डॉ. देवेंद्र यादव से हो। इसकी वजह उनका तेजी से बढ़ता जनसंपर्क और क्षेत्र में बन रहा सकारात्मक माहौल और उनके पिता वीरपाल सिंह का प्रभाव एवं राजनैतिक कौशल माना जा रहा है।
इस पूरे समीकरण में सबसे बड़ा बदलाव बसपा की कमजोर होती स्थिति है। बिथरी चैनपुर सीट पर बसपा अब उस स्थिति में नहीं दिखती, जैसी वह 2017 में थी। वीरेंद्र सिंह के निधन के बाद पार्टी के पास ऐसा कोई बड़ा चेहरा नहीं बचा जो 50 हजार वोटों का मजबूत आधार तैयार कर सके। पिछली बार सहानुभूति के बावजूद उनके पुत्र आशीष पटेल महज 9 प्रतिशत वोटों पर सिमट गए थे। यानी बसपा का बड़ा वोट बैंक अब बिखर चुका है। यही वजह है कि समाजवादी पार्टी की ओर से अगर सही उम्मीदवार उतारा गया तो बसपा का बड़ा हिस्सा सपा की तरफ आ सकता है।
बिथरी चैनपुर सीट का जातीय गणित भी सपा के पक्ष में जाता दिखाई दे रहा है। यादव, मुस्लिम और बसपा के परंपरागत वोटों का एक बड़ा हिस्सा अगर एकजुट होता है तो भाजपा के लिए मुकाबला कठिन हो सकता है। दूसरी तरफ भाजपा के सामने भी उम्मीदवार चयन की चुनौती होगी। वर्ष 2017 में पप्पू भरतौल जैसा प्रभावशाली चेहरा भाजपा के पास था, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में वैसी आक्रामक चुनावी शैली वाला नेता नजर नहीं आता। ऐसे में अगर भाजपा के खिलाफ स्थानीय स्तर पर थोड़ी भी नाराजगी बढ़ी और समाजवादी पार्टी ने मजबूत उम्मीदवार उतार दिया, तो बिथरी चैनपुर सीट रोहिलखंड की सबसे बड़ी राजनीतिक कहानी बन सकती है।
पूर्व सांसद वीरपाल सिंह यादव का अनुभव भी इस पूरे समीकरण में बड़ा फैक्टर माना जा रहा है। लगभग ढाई दशक तक सपा के बरेली जिला अध्यक्ष रहे वीरपाल सिंह यादव लंबे समय से रोहिलखंड की राजनीति के केंद्र में रहे हैं और बूथ स्तर की राजनीति से लेकर जातीय संतुलन तक की गहरी समझ रखते हैं। अगर उनका अनुभव और डॉ. देवेंद्र यादव की युवा छवि साथ आती है, तो यह समीकरण भाजपा के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।
अब जबकि 2027 के चुनाव की तैयारियां धीरे-धीरे तेज हो रही हैं, बिथरी चैनपुर सीट पर नजरें टिकना स्वाभाविक है। यह केवल एक विधानसभा सीट का चुनाव नहीं होगा, बल्कि यह उस बदलती राजनीति की भी परीक्षा होगी जिसमें युवा नेतृत्व, सामाजिक समीकरण और सही उम्मीदवार की स्वीकार्यता सबसे बड़ा हथियार बनती जा रही है। मौजूदा परिस्थितियां साफ संकेत दे रही हैं कि अगर समाजवादी पार्टी ने समय रहते सही रणनीति बनाई और डॉ. देवेंद्र यादव को मैदान में उतारा, तो बिथरी चैनपुर सीट पर मुकाबला एकतरफा भी हो सकता है।




