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पीएम मोदी दे रहे 10 हजार, मेयर-कमिश्नर ‘छीन’ रहे रोजगार, पहले 3 करोड़ से स्ट्रीट वेंडरों के लिए बनवाईं दुकानें, फिर तुड़वा दीं, अब प्राइवेट फर्म एडटेक को लीज पर सौंप दी अरबों की जमीन, पढ़ें डीडी पुरम की अरबों की जमीन पर करोड़ों के काले खेल की पूरी कहानी

नीरज सिसौदिया, बरेली
बरेली नगर निगम और स्मार्ट सिटी परियोजना एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में आ गई है। शहर के समाजसेवी राजकुमार मेहरोत्रा ने उत्तर प्रदेश शासन के नगर विकास विभाग में एक विस्तृत शिकायत भेजकर मेयर उमेश गौतम के कार्यकाल में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार, सरकारी धन के दुरुपयोग और गरीब स्ट्रीट वेंडरों के अधिकारों के हनन के आरोप लगाए हैं। शिकायत में दावा किया गया है कि डीडी पुरम स्थित कुष्ठ आश्रम की बहुमूल्य सरकारी भूमि पर स्मार्ट सिटी परियोजना की आड़ में करोड़ों रुपए की वित्तीय अनियमितता की गई और बाद में पूरी योजना को निजी हितों के लिए मोड़ दिया गया। इस पूरे मामले में स्मार्ट सिटी से जुड़े अधिकारियों, नगर निगम कमिश्नर और मेयर उमेश गौतम की भूमिका सवालों के घेरे में है।
समाजसेवी राजकुमार मेहरोत्रा की ओर से भेजी गई शिकायत में कहा गया है कि बरेली नगर निगम और स्मार्ट सिटी परियोजना से जुड़े अधिकारियों ने पहले स्ट्रीट वेंडरों के पुनर्वास के नाम पर डी.डी. पुरम स्थित कुष्ठ आश्रम की भूमि को खाली कराया। इसके बाद वर्ष 2023 में “मैसर्स कुमार ट्रेडिंग कम्पनी, रामपुर” नाम की कार्यदायी संस्था से लगभग 3 करोड़ 2 लाख 49 हजार 927 रुपए की लागत से 67 टीन शेड दुकानों यानी कियोस्क का निर्माण कराया गया।
शिकायत के अनुसार, निर्माण कार्य पूरा होने के बाद संबंधित फर्म को पूरा भुगतान भी कर दिया गया, लेकिन हैरानी की बात यह रही कि जिन स्ट्रीट वेंडरों के लिए यह दुकानें बनाई गई थीं, उन्हें कभी इनका आवंटन ही नहीं किया गया।
शिकायत में आरोप लगाया गया है कि कुछ समय बाद ही इन दुकानों को तुड़वा दिया गया और करोड़ों रुपए मूल्य की सरकारी भूमि को 12 नवंबर 2024 को “एडटेक प्रिंट एंड मीडिया” नाम की निजी फर्म को मात्र 1 करोड़ 93 लाख 45 हजार 941 रुपए में 15 साल की लीज पर दे दिया गया।
शिकायतकर्ता का दावा है कि जिस जमीन का बाजार मूल्य अरबों रुपए में है, उसे बेहद कम कीमत पर निजी कंपनी को सौंप दिया गया। इसी बिंदु को लेकर अब नगर निगम प्रशासन और मेयर उमेश गौतम की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
राजकुमार मेहरोत्रा ने अपनी शिकायत में आरोप लगाया है कि नगर निगम अधिनियम की धारा 129(4) का उल्लंघन करते हुए इतनी बड़ी सरकारी संपत्ति को बिना नगर निगम बोर्ड की विधिवत मंजूरी के निजी फर्म को लीज पर दे दिया गया। शिकायत में यह भी कहा गया है कि 14 अगस्त 2019 की बोर्ड बैठक में स्मार्ट सिटी परियोजनाओं से जुड़े प्रस्ताव पर नगर निगम की अनापत्ति का मामला लंबित था, इसके बावजूद अधिकारियों ने नियमों को दरकिनार कर पूरी प्रक्रिया आगे बढ़ाई।
शिकायत में सबसे बड़ा सवाल यह उठाया गया है कि जब 67 दुकानों के निर्माण पर तीन करोड़ रुपए से ज्यादा सरकारी धन खर्च किया जा चुका था, तो फिर इन दुकानों को स्ट्रीट वेंडरों को आवंटित क्यों नहीं किया गया? यदि यह परियोजना उपयोगी नहीं थी, तो इसका निर्माण किस अधिकारी ने स्वीकृत किया? और अगर निर्माण गलत था तो करोड़ों रुपए का ढांचा तोड़ने की अनुमति किसने दी?
समाजसेवी ने यह भी आरोप लगाया है कि दुकानों को ध्वस्त करने के बाद निकले लोहे, टीन, निर्माण सामग्री और मलबे का कोई सार्वजनिक हिसाब नहीं है। शिकायत में मांग की गई है कि यह स्पष्ट किया जाए कि करोड़ों रुपए की सामग्री आखिर कहां गई और उसका निस्तारण किस प्रक्रिया के तहत किया गया।

उमेश गौतम

पूरे मामले में सबसे ज्यादा विवाद उस समय खड़ा हुआ जब यह आरोप सामने आया कि फूड कोर्ट और स्मार्ट सिटी विकास के नाम पर निजी व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को फायदा पहुंचाया जा रहा है। शिकायत में दावा किया गया है कि बड़े ब्रांड्स और व्यावसायिक कंपनियों को लाभ देने के लिए पूरी परियोजना को बदला गया। यहां तक कहा गया है कि “Zudio” जैसे बड़े ब्रांड को लाभ पहुंचाने की मंशा से गरीब स्ट्रीट वेंडरों के लिए बनाई गई परियोजना का स्वरूप बदल दिया गया।
राजकुमार मेहरोत्रा ने अपनी शिकायत में यह भी लिखा है कि एक तरफ केंद्र सरकार प्रधानमंत्री स्वनिधि योजना के तहत छोटे दुकानदारों और रेहड़ी-पटरी वालों को बिना गारंटी के 10 हजार रुपए तक का ऋण देकर रोजगार बचाने की बात कर रही है, वहीं दूसरी तरफ बरेली नगर निगम उन्हीं गरीब वेंडरों के पुनर्वास के नाम पर बनाई गई दुकानों को निजी कंपनियों के हवाले कर रहा है। इसे उन्होंने “गरीबों पर स्मार्ट सिटी का अत्याचार” बताया है।
शिकायत में यह भी कहा गया है कि 10×10 वर्गफुट की दुकानों के लिए 10 लाख रुपए प्रीमियम और 20 हजार रुपए मासिक किराया निर्धारित किया गया। सवाल उठाया गया कि आखिर इतने महंगे किराए और प्रीमियम के साथ कोई गरीब स्ट्रीट वेंडर दुकान कैसे ले पाएगा? शिकायतकर्ता ने पूछा है कि इन दरों का निर्धारण किस आधार पर किया गया और क्या यह पूरी प्रक्रिया जानबूझकर गरीबों को बाहर करने के लिए बनाई गई थी?


पूरा मामला अब इसलिए भी गंभीर हो गया है क्योंकि शिकायत में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के उल्लंघन का भी आरोप लगाया गया है। शिकायतकर्ता का कहना है कि सरकारी संसाधनों का मनमाने तरीके से उपयोग कर गरीबों के समानता और आजीविका के अधिकार का हनन किया गया। साथ ही स्ट्रीट वेंडर्स (जीविका संरक्षण एवं सड़क विक्रय विनियमन) अधिनियम 2014 की भावना को भी पूरी तरह नजरअंदाज किया गया।
बता दें कि यह जमीन 10 हजार से 11 हजार वर्ग फुट के दायरे में फैली है और इसका बाजार मूल्य करोड़ों नहीं अरबों रुपए में है और इसे एक करोड़ 93 लाख रुपए की लीज पर 15 साल के लिए एडटेक कंपनी को नगर निगम की ओर से दे दिया गया है। शिकायत में यह भी दावा किया गया है कि जिस निजी फर्म एडटेक को जमीन दी गई, उसके निर्माण कार्य का मानचित्र भी कथित तौर पर बरेली विकास प्राधिकरण से स्वीकृत नहीं कराया गया। यदि यह आरोप सही साबित होता है तो मामला अवैध निर्माण की श्रेणी में भी आ सकता है। इतना ही नहीं पुरानी जेल परिसर में जो लाइट एंड साउंड सिस्टम स्थापित किया गया था उसे भी फूड कोर्ट परिसर में शिफ्ट किया जाएगा। इसके भी लाखों के उपकरण और अन्य सामग्री एडटेक फर्म अपनी सुपुर्दगी में ले जा चुकी है। यानी जितनी राशि लीज की नहीं उतनी कीमत के उपकरण कंपनी को दे दिए गए।
राजकुमार मेहरोत्रा ने शासन से मांग की है कि पूरे मामले की जांच भ्रष्टाचार निवारण संगठन (विजिलेंस) या आर्थिक अपराध शाखा (EOW) से कराई जाए। साथ ही संबंधित अधिकारियों, ठेकेदारों और निजी फर्मों की भूमिका की जांच कर कठोर कार्रवाई की जाए। शिकायत में यह भी मांग की गई है कि तीन करोड़ रुपए से अधिक सरकारी धन की क्षति के लिए जिम्मेदार अधिकारियों से वसूली की जाए और पूरी निविदा प्रक्रिया, भुगतान, ध्वस्तीकरण और लीज से जुड़े दस्तावेजों की फॉरेंसिक ऑडिट कराई जाए। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि अगर उनकी शिकायत पर कार्रवाई नहीं की गई ताे वह अदालत में इस भ्रष्टाचार के खिलाफ याचिका दायर करेंगे।
बरेली नगर निगम और स्मार्ट सिटी परियोजना पहले भी कई बार सवालों के घेरे में आ चुकी है, लेकिन इस बार मामला सीधे गरीब स्ट्रीट वेंडरों के अधिकारों, करोड़ों रुपये की सरकारी संपत्ति और निजी कंपनियों को कथित लाभ पहुंचाने से जुड़ा होने के कारण और ज्यादा संवेदनशील माना जा रहा है। अब निगाहें उत्तर प्रदेश शासन और जांच एजेंसियों पर टिक गई हैं कि क्या इस मामले में निष्पक्ष जांच होगी या फिर यह शिकायत भी सरकारी फाइलों में दबकर रह जाएगी।

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