यूपी

संतों के दरबार से होकर निकलेगा यूपी की सत्ता का रास्ता, आशीर्वाद ही नहीं सियासी संदेश भी देंगे संत, क्या 2027 में अखिलेश यादव बदलेंगे समाजवादी राजनीति का पुराना चेहरा? बड़ा मंगलवार पर भंडारों के आयोजन ने दिए बड़े संकेत, मुस्लिम धर्मगुरुओं से आगे हिंदू संतों और मठों की ओर बढ़ते कदमों के क्या हैं राजनीतिक मायने?

नीरज सिसौदिया, बरेली
उत्तर प्रदेश की राजनीति में लंबे समय तक यह धारणा मजबूत रही कि समाजवादी पार्टी का सबसे ठोस सामाजिक और राजनीतिक रिश्ता मुस्लिम नेतृत्व, उलेमाओं और मदरसा नेटवर्क से रहा है। टिकट वितरण से लेकर स्थानीय चुनावी समीकरणों तक, कई क्षेत्रों में मुस्लिम धर्मगुरुओं और प्रभावशाली मौलानाओं की राय को अहम माना जाता था। पश्चिमी यूपी, रुहेलखंड, अवध और पूर्वांचल के कई जिलों में सपा उम्मीदवारों के चयन में यह फैक्टर अक्सर चर्चा का विषय रहा।
लेकिन 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले तस्वीर तेजी से बदलती दिखाई दे रही है। बड़ा मंगलवार के दिन बड़े पैमाने पर भंडारों का आयोजन कर अखिलेश यादव ने सॉफ्ट हिन्दुत्व का बड़ा संकेत देने का प्रयास किया है। ये भंडारे प्रदेश भर में आयोजित किए गए। लखनऊ में बरेली कैंट विधानसभा सीट से टिकट के प्रबल दावेदार डॉक्टर अनीस बेग भी मौजूद रहे जो बरेली में रामलीला के मंच से लेकर दीपावली के त्योहार तक हिन्दू-मुस्लिम भाईचारे का चेहरा बने हुए हैं। वहीं, दूसरी ओर बरेली में कैंट विधानसभा सीट से सपा के टिकट के सबसे प्रबल हिन्दू दावेदार राजेश अग्रवाल ने अखिलेश यादव के आह्वान पर बड़ा मंगलवार के दिन कई मंदिरों पर प्रसाद वितरण का आयोजन किया।

बरेली में प्रसाद वितरण करते सपा नेता राजेश अग्रवाल।
हनुमान मंदिर में पूजा अर्चना करते राजेश अग्रवाल।

अब सवाल यह नहीं है कि समाजवादी पार्टी मुस्लिम वोट बचा पाएगी या नहीं, बल्कि बड़ा सवाल यह है कि क्या अखिलेश यादव हिंदू संतों, मठाधीशों और शंकराचार्यों के प्रभाव को भी उसी गंभीरता से समझ रहे हैं, जिस तरह भाजपा वर्षों से समझती रही है।

लखनऊ में सपा प्रमुख अखिलेश यादव के साथ भंडारे का प्रसाद ग्रहण करते राजेंद्र चौधरी और बरेली के सपा नेता डॉक्टर अनीस बेग।

दरअसल, 2027 में संत केवल आशीर्वाद नहीं, राजनीतिक संदेश भी देंगे। उत्तर प्रदेश की राजनीति अब उस मोड़ पर पहुंच चुकी है जहां संतों और मठों की भूमिका केवल धार्मिक मंच तक सीमित नहीं रही। वे सामाजिक प्रभाव, सांस्कृतिक पहचान और राजनीतिक वैधता के बड़े केंद्र बन चुके हैं। भाजपा के पास योगी आदित्यनाथ और राम मंदिर की मजबूत वैचारिक जमीन है। लेकिन समाजवादी पार्टी अब उस जमीन में सेंध लगाने की कोशिश करती दिख रही है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या अखिलेश यादव मुस्लिम धर्मगुरुओं के साथ-साथ हिंदू संतों और मठों को भी टिकट वितरण, संगठन और राजनीतिक रणनीति में वास्तविक महत्व देंगे या यह केवल प्रतीकात्मक संपर्क बनकर रह जाएगा। क्योंकि 2027 में यूपी की सत्ता केवल जातीय समीकरणों से नहीं तय होगी। बहुत संभव है कि उसका रास्ता सचमुच संतों के दरबार से होकर ही निकले।
2024 के लोकसभा चुनाव के बाद यूपी की राजनीति का पूरा फ्रेम बदल गया। भाजपा को यह एहसास हुआ कि केवल राम मंदिर का मुद्दा पर्याप्त नहीं रहेगा, जबकि समाजवादी पार्टी को यह समझ आया कि केवल पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समीकरण के सहारे 2027 का चुनाव जीतना आसान नहीं होगा। ऐसे में “संत राजनीति” अब निर्णायक फैक्टर बनती जा रही है।
हाल के महीनों में अखिलेश यादव का लगातार हिंदू संतों के संपर्क में आना इसी बदलाव का संकेत माना जा रहा है। उन्होंने ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती से मुलाकात कर न सिर्फ आशीर्वाद लिया, बल्कि उन्हें “सच्चा संत” बताते हुए भाजपा पर “फर्जी संतों” को आगे बढ़ाने का आरोप भी लगाया। यह वही समाजवादी पार्टी है जिस पर कभी भाजपा “मुस्लिम तुष्टिकरण” का सबसे बड़ा आरोप लगाती थी। अब वही पार्टी हिंदू धार्मिक प्रतीकों और संत समाज के साथ संवाद बढ़ाने की रणनीति पर चलती दिखाई दे रही है।

क्यों महत्वपूर्ण हो गए हैं संत और मठ?
उत्तर प्रदेश में धार्मिक संस्थाओं का प्रभाव केवल आध्यात्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक भी है। गोरखनाथ मठ, अयोध्या के प्रमुख अखाड़े, काशी विद्वत परिषद, ज्योतिर्मठ, निरंजनी अखाड़ा, जूना अखाड़ा और विभिन्न वैष्णव पीठों का प्रभाव करोड़ों अनुयायियों तक फैला हुआ है।
इन मठों और संतों की सबसे बड़ी ताकत यह है कि वे जातीय सीमाओं से ऊपर संवाद करते हैं। एक बड़ा संत जब किसी मुद्दे पर बोलता है तो उसका असर केवल ब्राह्मण या साधु समाज तक सीमित नहीं रहता, बल्कि गांवों और कस्बों के व्यापक हिंदू मानस तक पहुंचता है। यही कारण है कि भाजपा ने पिछले एक दशक में संत समाज के साथ अपने रिश्तों को राजनीतिक शक्ति में बदला। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ स्वयं गोरखनाथ मठ के महंत हैं। राम मंदिर आंदोलन के बाद भाजपा ने धार्मिक-सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को अपने सबसे बड़े वैचारिक हथियार में बदल दिया। लेकिन अब चुनौती यह है कि क्या समाजवादी पार्टी इस स्पेस में कुछ जगह बना सकती है?

सपा की सबसे बड़ी चुनौती: “छवि परिवर्तन”
समाजवादी पार्टी के सामने सबसे बड़ी समस्या संगठन नहीं, बल्कि छवि की है। भाजपा वर्षों से यह नैरेटिव गढ़ती रही है कि सपा की राजनीति “मुस्लिम तुष्टिकरण” पर आधारित है। यही कारण है कि हिंदू धार्मिक समूहों का बड़ा हिस्सा भाजपा के साथ भावनात्मक रूप से जुड़ गया। अब अखिलेश यादव इस छवि को बदलने की कोशिश कर रहे हैं। यही वजह है कि वह केवल मुस्लिम उलेमाओं से मुलाकात करने वाले नेता की छवि से बाहर निकलना चाहते हैं।
हाल के दिनों में उन्होंने न केवल शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद से मुलाकात की, बल्कि उनके सम्मान के मुद्दे पर योगी सरकार को भी घेरा। प्रयागराज में शंकराचार्य के अनुयायियों के साथ कथित पुलिस दुर्व्यवहार को लेकर अखिलेश खुलकर सामने आए। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार यह केवल “सहानुभूति राजनीति” नहीं थी, बल्कि ब्राह्मण संत समाज को संदेश देने की कोशिश भी थी कि सपा अब हिंदू धार्मिक नेतृत्व से दूरी नहीं रखना चाहती।

टिकट बंटवारे में क्या बदल सकता है?
यूपी की राजनीति में टिकट वितरण केवल जातीय गणित का मामला नहीं होता। स्थानीय धार्मिक प्रभाव भी कई सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाता है। अतीत में सपा पर आरोप लगते रहे कि कुछ सीटों पर मुस्लिम धर्मगुरुओं की सिफारिशें उम्मीदवार चयन में प्रभाव डालती थीं। खासकर पश्चिमी यूपी, बरेली, रामपुर, संभल, मुरादाबाद, आजमगढ़ और कुछ पूर्वांचली क्षेत्रों में यह चर्चा आम रही। लेकिन 2027 में तस्वीर अलग हो सकती है।
यदि सपा वास्तव में हिंदू संत समाज के साथ रिश्ते मजबूत करती है तो इसका असर टिकट वितरण पर भी दिख सकता है। ऐसे उम्मीदवारों को प्राथमिकता मिल सकती है जिनकी स्थानीय मठों, आश्रमों या धार्मिक संगठनों में स्वीकार्यता हो। अखिलेश यादव जानते हैं कि भाजपा को सीधे हिंदुत्व के मुद्दे पर चुनौती देना आसान नहीं है, लेकिन “संतों का सम्मान” और “धार्मिक संवाद” जैसे मुद्दों पर वह राजनीतिक स्पेस बना सकते हैं।

भाजपा की चिंता भी कम नहीं
यह मान लेना गलत होगा कि संत समाज पूरी तरह भाजपा के साथ एकतरफा खड़ा है। हाल के वर्षों में कई बड़े संतों ने भाजपा सरकारों पर सवाल भी उठाए हैं। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती लगातार गौ रक्षा, गौशालाओं और सनातन मुद्दों पर सरकार को कठघरे में खड़ा करते रहे हैं। उन्होंने यहां तक कहा कि जो दल गौ रक्षा पर शपथ लेगा, संत समाज उसके समर्थन पर विचार करेगा। यह भाजपा के लिए संकेत है कि केवल “हिंदुत्व” की ब्रांडिंग पर्याप्त नहीं होगी। संत समाज अब परिणाम और नीतिगत प्रतिबद्धता भी देख रहा है। इसीलिए भाजपा भी लगातार ब्राह्मण और संत समुदाय को साधने में जुटी है। प्रयागराज महाकुंभ और विभिन्न धार्मिक आयोजनों के दौरान सरकार और संत समाज की नजदीकियां इसी रणनीति का हिस्सा मानी जा रही हैं। पूर्व केंद्रीय मंत्री कलराज मिश्र और उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक जैसे ब्राह्मण चेहरे भी संत समाज के सम्मान के मुद्दों पर खुलकर सक्रिय दिखाई दिए।

क्या “सॉफ्ट हिंदुत्व” की ओर बढ़ रही है सपा?
राजनीतिक गलियारों में अब यह चर्चा तेज है कि समाजवादी पार्टी “सॉफ्ट हिंदुत्व” की ओर बढ़ रही है। अखिलेश यादव अब केवल संविधान, पीडीए और सामाजिक न्याय की बात नहीं करते, बल्कि धार्मिक आयोजनों, संत मुलाकातों और हिंदू प्रतीकों के जरिए भी संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं।
यह बदलाव इसलिए भी जरूरी है क्योंकि 2027 का चुनाव केवल जातीय समीकरणों का चुनाव नहीं होगा। यह “सांस्कृतिक वैधता” का भी चुनाव होगा। यदि भाजपा संत समाज के जरिए हिंदू भावनात्मक ध्रुवीकरण मजबूत करती है और सपा केवल पारंपरिक वोट बैंक तक सीमित रह जाती है, तो मुकाबला कठिन हो सकता है। लेकिन यदि अखिलेश यादव संत समाज के एक हिस्से को यह भरोसा दिलाने में सफल हो जाते हैं कि सपा “हिंदू विरोधी” नहीं है, तो चुनावी समीकरण बदल सकते हैं।

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