नीरज सिसौदिया, चंडीगढ़
चंडीगढ़ स्थित केशव भवन में आयोजित एक विशेष कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के उत्तर क्षेत्र प्रचारक प्रमुख बनवीर सिंह ने भारतीय संस्कृति, मातृभाषा और ‘स्व’ यानी अपनी पहचान के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि समाज में आज जो भटकाव और अनेक समस्याएं दिखाई दे रही हैं, उनका सबसे बड़ा कारण अपने ‘स्व’ को भूल जाना है।

यह कार्यक्रम पुस्तक “स्व से साक्षात्कार” के पंजाबी अनुवाद “ਸਵੈ ਨਾਲ ਮੁਲਾਕਾਤ” के लोकार्पण के अवसर पर आयोजित किया गया था। इस पुस्तक में पूजनीय सरसंघचालक मोहन भागवत, अखिल भारतीय सह सरकार्यवाह अरुण कुमार, प्रज्ञा प्रवाह के राष्ट्रीय संयोजक जेनंदकुमार तथा बनवीर सिंह के ‘स्व’ विषय पर विचार और संबोधन शामिल हैं।
कार्यक्रम में बोलते हुए बनवीर सिंह ने कहा कि जब तक व्यक्ति यह नहीं समझेगा कि वह कौन है, उसकी प्रकृति क्या है और उसकी जड़ें क्या हैं, तब तक वास्तविक प्रगति संभव नहीं हो सकती। उन्होंने कहा कि भारत का विकास तभी संभव है, जब देश अपनी संस्कृति, परंपरा और मूल विचारों के आधार पर आगे बढ़े।

उन्होंने कहा कि आज लोग आधुनिक बनने की दौड़ में अपनी भाषा, परंपराएं और संस्कार पीछे छोड़ते जा रहे हैं। यही कारण है कि समाज में मानसिक तनाव, असंतुलन और पहचान का संकट बढ़ रहा है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि आधुनिकता अपनाने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन अपनी जड़ों से कट जाना सबसे बड़ी समस्या है।
बनवीर सिंह ने विशेष रूप से मातृभाषा के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि हर व्यक्ति को अपनी मातृभाषा में बातचीत करनी चाहिए। उन्होंने लोगों से आग्रह किया कि कम से कम अपने घरों में तो मातृभाषा का ही प्रयोग करें। उनके अनुसार भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं होती, बल्कि वह संस्कृति, विचार और जीवन मूल्यों को आगे बढ़ाने का सबसे बड़ा साधन होती है।
उन्होंने युवाओं से कहा कि वे दुनिया की नई तकनीक और आधुनिक ज्ञान जरूर अपनाएं, लेकिन पश्चिमी सोच के अंधानुकरण से बचें। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति में जीवन को संतुलित और मानवीय बनाने की शक्ति है, इसलिए युवाओं को अपने देश की परंपराओं और मूल्यों को समझना चाहिए।
इस पुस्तक का पंजाबी अनुवाद विद्या भारती पंजाब के संपर्क विभाग द्वारा किया गया है। कार्यक्रम की अध्यक्षता विद्या भारती पंजाब के महामंत्री संदीप धुरिया ने की। उन्होंने भी अपने संबोधन में युवाओं से भारतीय संस्कृति और मूल्यों से जुड़े रहने का आह्वान किया।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी निर्मलजीत सिंह कलसी मौजूद रहे। उन्होंने कहा कि विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में आगे बढ़ना समय की आवश्यकता है, लेकिन पश्चिमीकरण की अंधी दौड़ में अपनी संस्कृति और जड़ों को भूल जाना उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि भारत की असली ताकत उसकी संस्कृति और पारिवारिक मूल्य हैं, जिन्हें बचाए रखना बेहद जरूरी है।
इस अवसर पर चंडीगढ़ साहित्य अकादमी के चेयरमैन मनमोहन सिंह, गौरव टंडन, प्रेम शर्मा, संपर्क विभाग के कार्यकर्ता रमेश अरोड़ा और प्रवीण गुप्ता सहित कई शिक्षाविद, चिंतक और सामाजिक कार्यकर्ता उपस्थित रहे।
कार्यक्रम में वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि भारत को यदि विश्व में अपनी अलग पहचान बनानी है, तो उसे अपनी संस्कृति, भाषा और मूल विचारों के साथ आगे बढ़ना होगा। वक्ताओं ने कहा कि ‘स्व’ की भावना ही व्यक्ति और समाज को सही दिशा देती है।
लोकार्पण समारोह के दौरान उपस्थित लोगों ने पुस्तक के पंजाबी अनुवाद की सराहना की और कहा कि इससे पंजाबी भाषी समाज तक भारतीय चिंतन और ‘स्व’ की अवधारणा को पहुंचाने में मदद मिलेगी। कार्यक्रम का माहौल पूरी तरह भारतीय संस्कृति, भाषा और राष्ट्र भावना से ओत-प्रोत दिखाई दिया।




