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दो साल से पीडीए पंचायतों के जरिये बना रहे माहौल, लोकसभा में अपने ब्लॉक से दिलाई जीत, आंवला में सपा का तीन दशक का सूखा खत्म करने की तैयारी कर रहे डॉ. जीराज सिंह यादव, परसेप्शन के खेल में निकले सबसे आगे, जानिये कैसे?

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नीरज सिसौदिया, बरेली
बरेली जिले की आंवला विधानसभा सीट उत्तर प्रदेश की उन सीटों में गिनी जाती है जहां समाजवादी पार्टी को पिछले तीन दशक से भी अधिक समय से जीत का इंतजार है। राजनीतिक समीकरण कई बार बदले, पार्टियां बदलीं, उम्मीदवार बदले, लेकिन सपा इस सीट पर जीत दर्ज नहीं कर सकी। हालांकि अब राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है कि आने वाले चुनाव में यह तस्वीर बदल सकती है। इसकी वजह बनकर उभरे हैं समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता डॉ. जीराज सिंह यादव, जिन्होंने पिछले कुछ वर्षों में क्षेत्र में अपनी सक्रियता और जनसंपर्क के जरिये एक मजबूत राजनीतिक परसेप्शन खड़ा कर दिया है।
दरअसल आंवला विधानसभा सीट पर सपा को आखिरी जीत वर्ष 1993 में मिली थी, जब समाजवादी पार्टी के महिपाल सिंह यादव ने यहां से चुनाव जीतकर पार्टी का परचम लहराया था। लेकिन इसके बाद राजनीतिक समीकरण बदलते चले गए। महिपाल सिंह का दौर खत्म हो गया। 1996 और 2002 के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के धर्मपाल सिंह सैनी ने लगातार दो बार जीत दर्ज की और सपा को हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद वर्ष 2007 में बहुजन समाज पार्टी की लहर चली और भाजपा के धर्मपाल सिंह को बसपा के उम्मीदवार राधाकृष्ण से हार का सामना करना पड़ा।
हालांकि 2007 के बाद स्थिति फिर बदली और धर्मपाल सिंह सैनी ने इस सीट पर अपना दबदबा कायम कर लिया। उन्होंने लगातार चुनाव जीतकर जीत की हैट्रिक लगाई और समाजवादी पार्टी को हर बार हार का सामना करना पड़ा। इस तरह पिछले करीब साढ़े तीन दशक से आंवला विधानसभा सीट पर सपा की जीत का इंतजार बना हुआ है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि पिछले दो विधानसभा चुनावों में सपा की हार की सबसे बड़ी वजह बाहरी उम्मीदवारों को टिकट देना रहा। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने सिद्धराज सिंह को उम्मीदवार बनाया, जबकि 2022 के चुनाव में आरके शर्मा को टिकट दिया गया। दोनों ही उम्मीदवारों को स्थानीय राजनीति से जुड़ा चेहरा नहीं माना गया और इसका असर चुनावी नतीजों में साफ दिखाई दिया।
इसी तरह वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने आंवला लोकसभा सीट से नीरज मौर्या को उम्मीदवार बनाया। नीरज मौर्या ने लोकसभा चुनाव तो जीत लिया, लेकिन आंवला विधानसभा क्षेत्र से उन्हें अपेक्षित बढ़त नहीं मिल सकी। दिलचस्प पहलू यह रहा कि जिस मझगवां ब्लॉक से डॉ. जीराज सिंह यादव ब्लॉक प्रमुख रहे हैं, उस ब्लॉक से समाजवादी पार्टी को बढ़त मिली। स्थानीय राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह जीत सपा की नहीं बल्कि जीराज सिंह यादव के व्यक्तिगत प्रभाव की जीत मानी जा रही है।
दरअसल, डॉ. जीराज सिंह यादव पिछले कई दशकों से क्षेत्र की राजनीति और समाजसेवा में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। उन्होंने न केवल अपने समाज बल्कि अन्य वर्गों के बीच भी मजबूत जनाधार तैयार किया है। स्थानीय लोगों का कहना है कि ठाकुर और दलित बहुल गांवों में भी उनके समर्थकों की लंबी फेहरिस्त है, जो उनके सामाजिक व्यवहार और सक्रियता की वजह से तैयार हुई है।
करीब दो साल पहले जब समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने पीडीए (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) का नारा दिया, तो आंवला विधानसभा क्षेत्र में इस नारे को जमीन पर उतारने में डॉ. जीराज सिंह यादव ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने लगातार पीडीए पंचायतों और बैठकों का आयोजन शुरू किया। इन बैठकों के जरिये उन्होंने विभिन्न समाजों के लोगों को एक मंच पर लाने की कोशिश की।
करीब डेढ़ साल पहले उन्होंने आंवला विधानसभा क्षेत्र में पीडीए महापंचायत का आयोजन किया था। उस समय यह कार्यक्रम न केवल आंवला बल्कि पूरे बरेली जिले की नौ विधानसभा सीटों में सबसे बड़ा सम्मेलन माना गया था। इस कार्यक्रम में बड़ी संख्या में लोगों की भागीदारी ने राजनीतिक हलकों का ध्यान अपनी ओर खींचा। इसमें लगभग तीन हजार लोग जुटे और किसी भी बड़े नेता को इसमें नहीं बुलाया गया। इसके बाद बरेली महानगर और शहर विधानसभा क्षेत्र में भी इसी तरह के बड़े कार्यक्रम आयोजित किए गए।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि पीडीए पंचायतों के जरिये डॉ. जीराज सिंह यादव ने एक ऐसा माहौल तैयार किया है, जिसने उन्हें आंवला विधानसभा क्षेत्र में सपा के संभावित उम्मीदवारों की दौड़ में आगे ला खड़ा किया है। लगातार बैठकों और जनसंपर्क अभियानों के कारण उनका राजनीतिक प्रभाव लगातार बढ़ता दिखाई दे रहा है।
डॉ. जीराज सिंह यादव केवल राजनीतिक कार्यक्रमों तक ही सीमित नहीं हैं बल्कि सामाजिक और धार्मिक गतिविधियों में भी उनकी सक्रिय भागीदारी रहती है। क्षेत्र की लगभग हर रामलीला में उन्होंने बतौर मुख्य अतिथि अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। इसके अलावा धार्मिक आयोजनों और सामाजिक कार्यक्रमों में उनकी भागीदारी उन्हें आम लोगों से जोड़ती है।
युवा वर्ग में भी उनका खासा प्रभाव माना जाता है। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि वह खेल गतिविधियों को लगातार प्रोत्साहित करते रहे हैं। क्षेत्र में आयोजित होने वाली खेल प्रतियोगिताओं में उनका सहयोग और भागीदारी युवाओं को उनके करीब लाती है।
सामाजिक कार्यों की बात करें तो गरीब बेटियों की शादी में मदद करना, जरूरतमंद परिवारों को मकान बनाने में सहयोग देना और आर्थिक रूप से कमजोर लोगों की सहायता करना उनके कामों में शामिल रहा है। इसी वजह से गरीब तबके में भी उनकी अच्छी पकड़ मानी जाती है।
स्थानीय राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि चुनाव केवल जातीय समीकरणों से नहीं जीते जाते, बल्कि परसेप्शन भी बहुत बड़ी भूमिका निभाता है। जनता के बीच किस नेता की छवि कैसी है, यह चुनावी परिणामों को काफी हद तक प्रभावित करता है।
आंवला विधानसभा सीट पर फिलहाल परसेप्शन की इस राजनीति में डॉ. जीराज सिंह यादव काफी आगे निकलते हुए दिखाई दे रहे हैं। उनकी सक्रियता, जनसंपर्क और सामाजिक कार्यों के कारण लोगों के बीच यह धारणा बन रही है कि अगर उन्हें मौका मिला तो वह समाजवादी पार्टी के लंबे समय से चले आ रहे सूखे को खत्म कर सकते हैं।
हालांकि अंतिम फैसला समाजवादी पार्टी के नेतृत्व को ही करना है कि वह आगामी विधानसभा चुनाव में किसे उम्मीदवार बनाती है। लेकिन क्षेत्र में जिस तरह की चर्चा चल रही है, उससे यह साफ संकेत मिल रहा है कि डॉ. जीराज सिंह यादव ने अपने काम और सक्रियता के बल पर मजबूत दावेदारी पेश कर दी है।
अब देखने वाली बात यह होगी कि समाजवादी पार्टी इस परसेप्शन को किस तरह देखती है और क्या पार्टी नेतृत्व आंवला विधानसभा सीट पर नया प्रयोग करते हुए स्थानीय चेहरे पर भरोसा करता है या फिर कोई अलग राजनीतिक समीकरण बनता है। लेकिन इतना तय है कि अगर मौजूदा माहौल इसी तरह बना रहा तो आने वाले चुनाव में आंवला विधानसभा सीट पर मुकाबला पहले से कहीं ज्यादा दिलचस्प हो सकता है।

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