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भाजपा के ‘हिंदुत्व मॉडल’ को बड़ी चुनौती दे रहा समर्थ मिश्रा का ‘समाजवादी हिंदुत्व’, बरेली कैंट विधानसभा सीट पर समाजवादी हिन्दुत्व का सबसे बड़ा ब्राह्मण चेहरा बनकर उभर रहे समर्थ मिश्रा, पार्टी ने भी बढ़ाया कद

 

नीरज सिसौदिया, बरेली

उत्तर प्रदेश की राजनीति में लंबे समय से हिंदुत्व भारतीय जनता पार्टी की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत माना जाता रहा है। भाजपा ने वर्षों तक इस मुद्दे के सहारे चुनावी सफलता हासिल की है, लेकिन अब समाजवादी पार्टी भी इसी मैदान में अपने नए अंदाज के साथ उतरती दिखाई दे रही है। बरेली कैंट विधानसभा सीट पर समाजवादी पार्टी के युवा नेता और प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य समर्थ मिश्रा इस रणनीति का सबसे प्रमुख चेहरा बनकर उभर रहे हैं। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि समर्थ मिश्रा ने जिस तरह से धार्मिक आयोजनों को सामाजिक समरसता और समाजवादी विचारधारा के साथ जोड़कर प्रस्तुत किया है, उसने भाजपा के पारंपरिक हिंदुत्व एजेंडे को सीधी चुनौती देने का काम किया है।

हाल ही में आयोजित सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा और उससे पहले निकाली गई भगवान परशुराम जयंती शोभायात्रा ने समर्थ मिश्रा को बरेली की राजनीति में एक अलग पहचान दिलाई है। इन आयोजनों ने यह संदेश देने का प्रयास किया कि हिंदू आस्था और धार्मिक परंपराओं पर किसी एक राजनीतिक दल का अधिकार नहीं हो सकता। समाजवादी पार्टी भी भारतीय संस्कृति, धार्मिक परंपराओं और सनातन मूल्यों का सम्मान करती है।

भागवत कथा से दिया बड़ा राजनीतिक संदेश

20 मई से 26 मई तक कैंट विधानसभा क्षेत्र के सुभाष नगर स्थित रामलीला ग्राउंड में आयोजित सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा का समापन विशाल भंडारे के साथ हुआ। इस धार्मिक आयोजन के मुख्य आयोजक समर्थ मिश्रा रहे। कथा के दौरान प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे और क्षेत्र में धार्मिक वातावरण बना रहा।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह आयोजन केवल धार्मिक कार्यक्रम नहीं था बल्कि इसके पीछे एक स्पष्ट राजनीतिक संदेश भी छिपा हुआ था। समाजवादी पार्टी लंबे समय से भाजपा द्वारा लगाए जाने वाले ‘हिंदू विरोधी’ आरोपों का सामना करती रही है। ऐसे में समर्थ मिश्रा ने भागवत कथा जैसे आयोजन के माध्यम से यह बताने की कोशिश की कि समाजवादी विचारधारा और हिंदू आस्था एक-दूसरे के विरोधी नहीं बल्कि साथ-साथ चल सकती हैं।

44 डिग्री तापमान में नंगे पांव निकाली कलश यात्रा

श्रीमद्भागवत कथा शुरू होने से पहले 20 मई को निकाली गई भव्य कलश यात्रा भी चर्चा का विषय बनी। करीब 44 डिग्री की भीषण गर्मी में समर्थ मिश्रा लगभग तीन किलोमीटर तक नंगे पांव यात्रा में शामिल रहे। सुभाष नगर रामलीला ग्राउंड से निकली इस यात्रा में बड़ी संख्या में महिलाओं, युवाओं और स्थानीय लोगों ने भाग लिया।

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, इस यात्रा ने समर्थ मिश्रा की छवि केवल एक राजनीतिक कार्यकर्ता की नहीं बल्कि धार्मिक और सामाजिक आयोजनों में सक्रिय जननेता के रूप में स्थापित करने का काम किया। भाजपा जिन इलाकों में पारंपरिक रूप से मजबूत मानी जाती है, उन्हीं क्षेत्रों में इस तरह के आयोजन कर समर्थ मिश्रा ने राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की है।

परशुराम जयंती से ब्राह्मण समाज में मजबूत हुई पकड़

समर्थ मिश्रा ने इससे पहले भगवान परशुराम जयंती पर भव्य शोभायात्रा का आयोजन किया था। ब्राह्मण समाज में भगवान परशुराम को विशेष सम्मान प्राप्त है और इस आयोजन के जरिए समर्थ मिश्रा ने ब्राह्मण समाज के बीच अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई।

राजनीतिक दृष्टि से देखा जाए तो यह कदम काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। बरेली कैंट विधानसभा सीट पर ब्राह्मण मतदाता निर्णायक भूमिका में माने जाते हैं। ऐसे में समर्थ मिश्रा ने धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों के माध्यम से इस वर्ग के बीच अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने का प्रयास किया है।

क्या है ‘समाजवादी हिंदुत्व’ का मॉडल?

समर्थ मिश्रा जिस विचार को आगे बढ़ा रहे हैं, उसे राजनीतिक हलकों में ‘समाजवादी हिंदुत्व’ कहा जा रहा है। यह ऐसा हिंदुत्व है जो किसी धर्म या समुदाय को विरोधी मानकर नहीं चलता बल्कि सभी धर्मों के सम्मान और सामाजिक सद्भाव की बात करता है।

समर्थ मिश्रा का मानना है कि हिंदुत्व का अर्थ समाज को बांटना नहीं बल्कि जोड़ना है। उनके कार्यक्रमों में हिंदू समाज के साथ-साथ मुस्लिम, सिख और अन्य समुदायों के लोग भी शामिल होते दिखाई देते हैं। यही वजह है कि उनके समर्थक इसे भाजपा के हिंदुत्व से अलग और अधिक समावेशी मॉडल के रूप में प्रस्तुत करते हैं।

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि समाजवादी पार्टी के लिए यह रणनीति भविष्य में काफी महत्वपूर्ण साबित हो सकती है, क्योंकि भाजपा की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत माने जाने वाले हिंदुत्व के मुद्दे पर अब विपक्ष भी अपनी वैकल्पिक व्याख्या प्रस्तुत कर रहा है।

पार्टी ने भी बढ़ाया समर्थ मिश्रा का राजनीतिक कद

समर्थ मिश्रा लंबे समय से समाजवादी पार्टी के संगठन में सक्रिय भूमिका निभाते रहे हैं। वे पहले लोहिया वाहिनी के राष्ट्रीय सचिव रह चुके हैं। इसके बाद वर्ष 2023 में उन्हें प्रदेश नेतृत्व द्वारा जिला उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई थी।

संगठन में लगातार सक्रियता और बढ़ते जनसंपर्क को देखते हुए पार्टी ने उनका कद और बढ़ाया तथा उन्हें समाजवादी पार्टी की प्रदेश कार्यकारिणी का सदस्य नियुक्त किया। राजनीतिक जानकार इसे उनके बढ़ते प्रभाव और नेतृत्व क्षमता की मान्यता के रूप में देख रहे हैं।

कैंट सीट पर मजबूत हो रही दावेदारी

बरेली कैंट विधानसभा सीट से समर्थ मिश्रा को समाजवादी पार्टी के संभावित टिकट दावेदारों में प्रमुख माना जा रहा है। माना जा रहा है कि वे केवल संगठनात्मक सक्रियता तक सीमित नहीं रहना चाहते बल्कि आगामी विधानसभा चुनाव में सीधे चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी भी कर रहे हैं।

विशेष बात यह है कि जिन क्षेत्रों में उन्होंने धार्मिक आयोजन किए, वे इलाके भाजपा के मजबूत गढ़ माने जाते हैं। समाजवादी पार्टी को इन क्षेत्रों में अब तक अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी है। ऐसे में समर्थ मिश्रा की रणनीति इन इलाकों में पार्टी की राजनीतिक पैठ बढ़ाने की कोशिश के रूप में देखी जा रही है।

बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच नया प्रयोग

उत्तर प्रदेश की राजनीति में हिंदुत्व और सामाजिक समीकरण हमेशा से चुनावी परिणामों को प्रभावित करते रहे हैं। ऐसे समय में समर्थ मिश्रा का ‘समाजवादी हिंदुत्व’ मॉडल एक नया राजनीतिक प्रयोग माना जा रहा है। धार्मिक आयोजनों के माध्यम से वे एक ओर ब्राह्मण समाज से जुड़ाव बढ़ा रहे हैं तो दूसरी ओर समाजवादी पार्टी की पारंपरिक सामाजिक न्याय की राजनीति को भी साथ लेकर चलने का प्रयास कर रहे हैं।

आने वाले समय में यह रणनीति कितनी सफल होगी, यह चुनावी नतीजे तय करेंगे। लेकिन इतना जरूर है कि बरेली कैंट की राजनीति में समर्थ मिश्रा ने खुद को एक ऐसे युवा नेता के रूप में स्थापित कर लिया है जो भाजपा के सबसे मजबूत माने जाने वाले हिंदुत्व के मुद्दे पर सीधे मुकाबले की तैयारी करता दिखाई दे रहा है। यही वजह है कि आज समर्थ मिश्रा को समाजवादी पार्टी के भीतर ‘समाजवादी हिंदुत्व’ के सबसे प्रमुख ब्राह्मण चेहरे के रूप में देखा जा रहा है और उनकी राजनीतिक गतिविधियां लगातार चर्चा का विषय बनी हुई हैं।

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