नीरज सिसौदिया, बरेली
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर राजनीतिक दलों ने भले ही अभी अपने पत्ते पूरी तरह न खोले हों, लेकिन चुनावी माहौल धीरे-धीरे गर्म होने लगा है। इसी बीच इंडिया टाइम 24 डॉट कॉम (indiatime24.com) की ओर से बरेली शहर विधानसभा सीट पर समाजवादी पार्टी के संभावित उम्मीदवारों को लेकर कराए गए एक विस्तृत सर्वे ने कई दिलचस्प संकेत दिए हैं। सर्वे बताता है कि पार्टी के भीतर कई दावेदार सक्रिय हैं, लेकिन लोकप्रियता के मामले में बरेली शहर विधानसभा अध्यक्ष हसीव खान सबसे आगे दिखाई देते हैं। हालांकि, यह सर्वे यह भी संकेत देता है कि उम्मीदवार चयन के साथ-साथ भाजपा की रणनीति भी इस सीट के चुनावी नतीजों पर निर्णायक असर डाल सकती है।
एक अप्रैल से 30 जून के बीच किए गए इस सर्वे में 10 हजार लोगों से फोन पर बातचीत कर उनकी राय ली गई। सर्वे में शास्त्री नगर, राजेंद्र नगर, कर्मचारी नगर, कोहाड़ापीर, भूड़, बानखाना सहित बरेली शहर विधानसभा क्षेत्र के विभिन्न इलाकों के मतदाताओं को शामिल किया गया। राय देने वालों की आयु 20 से 60 वर्ष के बीच रही। सर्वे में 30 प्रतिशत मुस्लिम, 35 प्रतिशत हिंदू, 15 प्रतिशत पंजाबी-खत्री तथा शेष अन्य समुदायों के मतदाताओं को शामिल किया गया।

हसीब खान सबसे आगे, मुकाबला बेहद दिलचस्प
सर्वे के अनुसार समाजवादी पार्टी के संभावित उम्मीदवारों में 22 प्रतिशत लोगों ने हसीब खान को अपनी पहली पसंद बताया। इसके बाद 20 प्रतिशत लोगों ने मोहम्मद कलीमुद्दीन के पक्ष में राय दी। 19 प्रतिशत मतदाताओं ने गौरव सक्सेना को पसंद किया, जबकि 18 प्रतिशत लोगों ने अब्दुल कय्यूम खां उर्फ मुन्ना का समर्थन किया। 15 प्रतिशत लोगों ने मयंक शुक्ला उर्फ मोंटी को अपनी पसंद बताया, जबकि 5 प्रतिशत लोगों ने कहा कि वे किसी भी दावेदार को नहीं जानते।
इन आंकड़ों से साफ है कि समाजवादी पार्टी में टिकट की दौड़ एकतरफा नहीं है। शीर्ष चार दावेदारों के बीच लोकप्रियता का अंतर बहुत कम है, जिससे यह संकेत मिलता है कि अंतिम फैसला संगठन, जातीय-सामाजिक समीकरण और पार्टी नेतृत्व की रणनीति को ध्यान में रखकर ही होगा।

युवाओं की पसंद बने मोहम्मद कलीमुद्दीन
सर्वे में आयु वर्ग के आधार पर भी मतदाताओं की पसंद जानने की कोशिश की गई। इसमें सबसे दिलचस्प तस्वीर युवा मतदाताओं की सामने आई। 20 से 45 वर्ष आयु वर्ग के 35 प्रतिशत युवाओं ने मोहम्मद कलीमुद्दीन को अपनी पहली पसंद बताया, जबकि 32 प्रतिशत युवाओं ने हसीव खान के पक्ष में राय दी। इससे संकेत मिलता है कि शिक्षित और युवा मतदाताओं के बीच कलीमुद्दीन की अच्छी स्वीकार्यता बन रही है। वहीं, हसीव खान भी युवा वर्ग में मजबूत पकड़ बनाए हुए हैं।
वरिष्ठ मतदाताओं की पहली पसंद बने मुन्ना
45 से 60 वर्ष आयु वर्ग के मतदाताओं की राय इससे अलग दिखाई दी। इस वर्ग के 53 प्रतिशत** लोगों ने अब्दुल कय्यूम खां उर्फ मुन्ना को सबसे उपयुक्त उम्मीदवार माना। 25 प्रतिशत** लोगों ने हसीव खान का समर्थन किया, जबकि 18 प्रतिशत** लोगों ने मयंक शुक्ला उर्फ मोंटी को पहली पसंद बताया। यह आंकड़े बताते हैं कि वरिष्ठ मतदाता अनुभव, जनसंपर्क और लंबे समय से सक्रिय नेताओं को अधिक प्राथमिकता दे रहे हैं।

उम्मीदवारों की अलग-अलग पहचान बनी ताकत
सर्वे में मतदाताओं से यह भी पूछा गया कि वे किस आधार पर किसी नेता** को पसंद करते हैं। इसमें अलग-अलग नेताओं की अलग पहचान उभरकर सामने आई। हसीव खान को लोगों ने जरूरतमंदों की मदद करने वाले, सामाजिक रूप से सक्रिय और बच्चों की शिक्षा के लिए गंभीर प्रयास करने वाले नेता** के रूप में पसंद किया। लोगों का मानना रहा कि वे लगातार आम लोगों के बीच रहते हैं और जरूरतमंदों की सहायता करते हैं।
अब्दुल कय्यूम खां उर्फ मुन्ना और गौरव सक्सेना को मतदाताओं ने नगर निगम से जुड़ी जनसमस्याओं के समाधान को प्राथमिकता देने वाले नेता के रूप में देखा। लोगों का कहना था कि वे सड़क, नाली, सफाई और स्थानीय विकास जैसे मुद्दों पर लगातार सक्रिय रहते हैं। बता दें कि दोनों ही नगर निगम के पार्षद हैं और गौरव सक्सेना तो नगर निगम में विपक्ष के नेता भी हैं।

मोहम्मद कलीमुद्दीन को लोगों ने शिक्षित, समाज में शिक्षा की अलख जगाने वाले और कोरोना महामारी के दौरान जरूरतमंदों की मदद करने वाले नेता के रूप में सराहा। खासकर युवा और शिक्षित वर्ग में उनकी यही छवि उन्हें बढ़त दिलाती दिखाई दी।
भाजपा की रणनीति पर भी टिकी सपा की उम्मीद
सर्वे का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष भाजपा के संभावित उम्मीदवार को लेकर सामने आया। सर्वे में शामिल 90 प्रतिशत लोगों का मानना था कि यदि भाजपा एक बार फिर मौजूदा विधायक और वन राज्य मंत्री अरुण कुमार सक्सेना को ही उम्मीदवार बनाती है तो समाजवादी पार्टी के लिए इस सीट पर जीत दर्ज करना बेहद कठिन या लगभग नामुमकिन होगा। मतदाताओं का मानना है कि मौजूदा विधायक के पास मजबूत संगठन, स्थापित जनाधार और चुनावी अनुभव है, जिसका सीधा असर मुकाबले पर पड़ सकता है। उनका कहना था कि अरुण कुमार को मुस्लिम वोट भी मिलते हैं जो समाजवादी पार्टी का आधार वोट बैंक माना जाता है।
हालांकि, दूसरी ओर 55 प्रतिशत लोगों ने यह भी कहा कि यदि भाजपा इस सीट पर उम्मीदवार बदलती है और किसी मुस्लिम युवा चेहरे को उतारती है तो समाजवादी पार्टी के पास चुनाव जीतने का अच्छा अवसर बन सकता है क्योंकि मुस्लिम उम्मीदवार के मैदान में होने पर मुस्लिम वोटों के बिखराव को रोका जा सकता है। इससे स्पष्ट है कि मुकाबले की दिशा काफी हद तक भाजपा के टिकट वितरण पर भी निर्भर करेगी।

सामाजिक समीकरण भी होंगे अहम
बरेली शहर विधानसभा सीट पर हिंदू, मुस्लिम, पंजाबी-खत्री और अन्य समुदायों का मिला-जुला मतदाता आधार है। ऐसे में किसी भी राजनीतिक दल के लिए केवल एक वर्ग के सहारे चुनाव जीतना आसान नहीं होगा। उम्मीदवार की व्यक्तिगत छवि, संगठन की मजबूती, स्थानीय मुद्दों पर सक्रियता और सभी समुदायों में स्वीकार्यता महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
समाजवादी पार्टी के सामने चुनौती यह होगी कि वह ऐसा चेहरा सामने लाए जो पारंपरिक वोट बैंक के साथ-साथ अन्य वर्गों में भी प्रभाव पैदा कर सके। सर्वे में सामने आए आंकड़े बताते हैं कि प्रत्येक प्रमुख दावेदार की अपनी अलग ताकत और समर्थक वर्ग है।
टिकट चयन पर रहेगी नजर
जैसे-जैसे विधानसभा चुनाव नजदीक आएंगे, समाजवादी पार्टी में टिकट को लेकर गतिविधियां और तेज होना तय है। फिलहाल सर्वे यह संकेत देता है कि हसीव खान लोकप्रियता के मामले में आगे हैं, लेकिन मोहम्मद कलीमुद्दीन, अब्दुल कय्यूम खां उर्फ मुन्ना और गौरव सक्सेना भी मजबूत दावेदारी बनाए हुए हैं। वहीं मयंक शुक्ला उर्फ मोंटी भी अपने-अपने समर्थक वर्ग के बीच सक्रिय हैं।
कुल मिलाकर यह सर्वे बताता है कि बरेली शहर विधानसभा सीट पर समाजवादी पार्टी के लिए उम्मीदवार चयन आसान नहीं होगा। पार्टी को लोकप्रियता, सामाजिक समीकरण, संगठनात्मक क्षमता और चुनावी जीत की संभावना जैसे सभी पहलुओं को ध्यान में रखकर फैसला लेना होगा। साथ ही भाजपा किसे मैदान में उतारती है, यह भी इस सीट के चुनावी समीकरण को निर्णायक रूप से प्रभावित कर सकता है।




