नीरज सिसौदिया, बरेली
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आते जा रहे हैं, वैसे-वैसे बरेली की 125 कैंट विधानसभा सीट पर समाजवादी पार्टी के टिकट को लेकर राजनीतिक हलचल तेज होती जा रही है। पार्टी के भीतर टिकट के दावेदारों की संख्या सबसे अधिक इसी सीट पर बताई जा रही है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में अब यह सवाल भी जोर पकड़ने लगा है कि आखिर टिकट उस चेहरे को मिले, जिसने पिछले कई महीनों से जनता और संगठन के बीच लगातार काम किया है, या फिर ऐसे नेता को, जिसकी सक्रियता केवल टिकट की चर्चा तक सीमित रही है।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि कैंट विधानसभा सीट पर इस समय दर्जनभर से अधिक नेता टिकट की दौड़ में खुद को शामिल मान रहे हैं, लेकिन यदि जमीनी सक्रियता का आकलन किया जाए तो केवल तीन नाम ही लगातार चर्चा में दिखाई देते हैं। इनमें वरिष्ठ समाजवादी नेता एवं पूर्व विधानसभा प्रत्याशी राजेश अग्रवाल, डॉ. अनीस बेग तथा इंजीनियर अनीस अहमद खां प्रमुख रूप से शामिल हैं। इन तीनों नेताओं ने अलग-अलग स्तर पर जनता के बीच लगातार अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है।
राजेश अग्रवाल लंबे समय से कैंट विधानसभा क्षेत्र में जनसंपर्क, जनसमस्याओं को लेकर संघर्ष, धरना-प्रदर्शन, सामाजिक कार्यक्रमों और संगठनात्मक गतिविधियों में सक्रिय रहे हैं। चौपुला रेलवे अंडरपास का मुद्दा हो, हाउस टैक्स का मुद्दा हो, विभिन्न क्षेत्रों में जनसंवाद कार्यक्रम हों या स्थानीय समस्याओं को लेकर आंदोलन, राजेश अग्रवाल पिछले तीन दशक से लगातार जनता के बीच दिखाई देते रहे हैं। यही कारण है कि समर्थक उन्हें क्षेत्र का सबसे सक्रिय दावेदार मानते हैं।

वहीं, डॉ. अनीस बेग ने पिछले लगभग दो वर्ष में अपनी राजनीतिक सक्रियता को नई ऊंचाई दी है। उन्होंने पूरे कैंट विधानसभा क्षेत्र में लगातार पीडीए गोष्ठियां, पीडीए पंचायतें और महापंचायतें आयोजित कीं। इसके अलावा सामाजिक कार्यक्रम, अल्पसंख्यक और पिछड़े वर्गों के बीच संवाद तथा संगठन के अभियान को गांव-गांव और वार्ड-वार्ड तक पहुंचाने का काम किया। पार्टी के हर बड़े कार्यक्रम में उनकी सक्रिय भागीदारी भी लगातार देखने को मिली है।

तीसरे प्रमुख दावेदार इंजीनियर अनीस अहमद खां हैं। जब लोकसभा चुनाव की समीक्षा बैठक में पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने भावी उम्मीदवार के तौर पर उनका नाम लेकर बरेली जिले से गए पार्टी नेताओं से उनके समर्थन और विरोध में हाथ उठाने को कहा था तब से उन्होंने क्षेत्र में काफी सक्रियता दिखाई है। जनसंपर्क अभियान चलाए, वोट बनवाए, पीडीए सम्मेलन और गोष्ठियों का आयोजन कराया और पार्टी कार्यक्रमों में भागीदारी भी बढ़ाई।

राजनीतिक हलकों में चर्चा इस बात की भी है कि इन तीनों नेताओं की एक समान विशेषता यह है कि ये केवल चुनावी मौसम में नहीं, बल्कि संगठन के नियमित कार्यक्रमों में भी सहयोग करते रहे हैं। चाहे पार्टी की बैठक हो, आंदोलन हो, प्रशिक्षण शिविर हो या कोई सामाजिक अभियान, इनकी मौजूदगी लगातार दर्ज की गई है। वहीं, पिछले चुनाव में टिकट के लिए पुरजोर तैयारी करने वाले अनुराग सिंह नीटू और संजीव सक्सेना जैसे नेता भी काफी समय से सक्रिय हैं।


इसके विपरीत कैंट विधानसभा से टिकट के दावेदार बताए जा रहे कई अन्य नेताओं को लेकर सवाल उठ रहे हैं। पार्टी कार्यकर्ताओं का कहना है कि ऐसे कई चेहरे हैं, जो न तो क्षेत्र में नियमित रूप से दिखाई देते हैं और न ही संगठनात्मक बैठकों में उनकी उपस्थिति रहती है। इसके बावजूद वे टिकट के मजबूत दावेदार होने का दावा करते हैं। इनमें कुछ कनफ्यूज नेता हैं जो हर चुनाव में सीट बदल लेते हैं और अबकी बार तय नहीं कर पा रहे हैं कि चुनाव लड़ें तो कहां से लड़ें? वहीं, दूसरी ओर कुछ ऐसे नेता हैं जो परिवार सहित पिछले लगभग डेढ़ दशक में लगातार पांच बड़े चुनाव हार चुके हैं। फिलहाल ये नेताजी राजनीतिक रूप से फ्यूज हो चुके हैं। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि ये फ्यूज होने के साथ ही ये कनफ्यूज भी हैं। पहले इन्होंने शहर विधानसभा सीट से टिकट के लिए दावेदारी जताई, उसके बाद सार्वजनिक मंच से घोषणा कर दी कि इस बार चुनाव नहीं लड़ेंगे। फिर कुछ दिन बाद दो-दो सीटों से तैयारी करने की चर्चाएं उड़ाई गईं। इनमें एक कैंट तो दूसरी नवाबगंज विधानसभा सीट है। फिर नेताजी का दिल कैंट पर आ गया। नेताजी ने संगठन के आयोजनों में भागीदारी शुरू कर दी। अब जब उनका चहेता जिला अध्यक्ष बन गया तो नेताजी के अरमान फिर से जाग उठे। हालांकि चुनाव के बाद वो कौन से बिल में चले जाते हैं यह कोई नहीं जानता। वो कभी सपा में जाते हैं तो कभी कांग्रेस में चले जाते हैं तो कभी फिर वापस सपा में उछल-कूद मचाते हैं। इनके कुछ विरोधी तो इन्हें चुनावी मैदान के ”सियासी बंदर” भी कहने लगे हैं। इनके विरोधी कांग्रेस में भी हैं और सपा में भी। अब ये ”सियासी बंदर” कभी किसी का टिकट झपट लाते हैं तो कभी किसी का टिकट ले उड़ते हैं। कांग्रेसी भी इनसे परेशान थे और सपाई भी परेशान हैं। बरेली में कांग्रेस की बर्बादी का पूरा क्रेडिट भी इन्हीं नेता जी को दिया जाता है। इनके विरोधी नेताओं का कहना है कि ”सियासी बंदर” मेहनती दावेदारों से टिकट तो छीनकर ले जाते हैं लेकिन जब भाजपा से सीट छीनने जाते हैं तो चारों खाने चित हो जाते हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि किसी भी विधानसभा चुनाव में केवल पहचान या व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा पर्याप्त नहीं होती। चुनाव जीतने के लिए मजबूत बूथ नेटवर्क, कार्यकर्ताओं की टीम, जनता से लगातार संवाद और संगठन के साथ समन्वय आवश्यक होता है। यदि किसी नेता ने चुनाव से पहले क्षेत्र में लगातार काम ही नहीं किया है, तो टिकट मिलने के बाद कुछ ही महीनों में मजबूत चुनावी ढांचा तैयार करना आसान नहीं होता।
सूत्रों के अनुसार, कुछ ऐसे दावेदार भी हैं जिन्होंने कुछ समय पहले सार्वजनिक रूप से यह घोषणा कर दी थी कि वे कैंट विधानसभा से चुनाव नहीं लड़ेंगे। अब राजनीतिक परिस्थितियां बदलने के साथ वही नेता दोबारा इस सीट से चुनाव लड़ने की तैयारी करते दिखाई दे रहे हैं। बताया यह भी जाता है कि जिला अध्यक्ष के तौर पर शुभलेश यादव की दोबारा ताजपोशी में भी इन ”सियासी बंदरों” की अहम भूमिका रही है। यानी जमीन पर कुछ हो न हो मगर हाईकमान में इनकी पकड़ मजबूत है। पिछले चुनाव में भी शुभलेश यादव इनका सपोर्ट करते नजर आए थे। इससे कार्यकर्ताओं के बीच भी असमंजस की स्थिति बनी हुई है।
इतना ही नहीं, राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी है कि कुछ दावेदार एक साथ कई विधानसभा क्षेत्रों से अपनी संभावनाएं तलाश रहे हैं। कुछ नेता दूसरे जिले की विधानसभा सीटों पर भी दावा जता रहे हैं, जबकि कुछ एक ही समय में दो या तीन सीटों पर अपनी दावेदारी बनाए हुए हैं। ऐसे नेताओं को लेकर पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच सवाल उठ रहा है कि यदि कोई नेता यह तय ही नहीं कर पा रहा कि उसे किस विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ना है, तो वह किसी एक क्षेत्र में मजबूत जनाधार कैसे तैयार करेगा?
संगठन से जुड़े नेताओं का कहना है कि चुनाव केवल टिकट मिलने के बाद नहीं लड़ा जाता, बल्कि उसकी तैयारी वर्षों पहले शुरू होती है। बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं का नेटवर्क बनाना, जनता के सुख-दुख में शामिल होना, स्थानीय मुद्दों पर संघर्ष करना और पार्टी की विचारधारा को घर-घर तक पहुंचाना ही किसी उम्मीदवार की वास्तविक ताकत होती है।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि कैंट विधानसभा सीट समाजवादी पार्टी के लिए हमेशा चुनौतीपूर्ण रही है। पिछले चुनावों के परिणाम भी यही संकेत देते हैं कि यदि पार्टी ने जमीनी कार्यकर्ताओं और सक्रिय चेहरों की अनदेखी की तो परिणाम उम्मीद के अनुरूप नहीं आ सकते। ऐसे में टिकट वितरण के समय संगठन के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि वह केवल राजनीतिक समीकरणों के आधार पर नहीं, बल्कि क्षेत्र में किए गए वास्तविक कार्यों और संगठनात्मक योगदान का भी मूल्यांकन करे।
पार्टी के कई कार्यकर्ताओं का भी मानना है कि चुनाव में अब अधिक समय शेष नहीं है। यदि कोई नया चेहरा अभी सक्रिय भी होता है तो इतने कम समय में वह जनता के बीच वह विश्वास और संगठनात्मक ढांचा तैयार नहीं कर पाएगा, जो वर्षों की मेहनत से बनता है। यदि टिकट की घोषणा चुनाव से एक-दो महीने पहले होती है, तो सबसे अधिक लाभ उसी उम्मीदवार को मिलेगा, जिसने पहले से क्षेत्र में मजबूत नेटवर्क तैयार कर रखा हो।
बरेली कैंट विधानसभा की राजनीति फिलहाल इसी सवाल के इर्द-गिर्द घूम रही है कि टिकट किसे मिलेगा। लेकिन एक बात स्पष्ट रूप से सामने आ रही है कि इस सीट पर केवल टिकट का दावा करना पर्याप्त नहीं माना जा रहा। पार्टी कार्यकर्ता और स्थानीय राजनीतिक पर्यवेक्षक अब दावेदारों के जमीनी काम, संगठनात्मक सक्रियता और जनता के बीच उनकी स्वीकार्यता को भी महत्वपूर्ण पैमाना मान रहे हैं। आने वाले दिनों में पार्टी नेतृत्व किसे प्राथमिकता देता है, इस पर न केवल कैंट विधानसभा बल्कि पूरे बरेली के राजनीतिक समीकरणों की नजर टिकी रहेगी क्योंकि कैंट सीट से भाजपा के मौजूदा विधायक संजीव अग्रवाल को हराना चुनावी बरसात के सियासी मेढकों के बूते की बात तो बिल्कुल नहीं है।




