इंटरव्यू

चुनाव अब लहर का हो गया है, राहुल गांधी ने अच्छा माहौल बना दिया है, कांग्रेस जहां से भी लड़ेगी अच्छा लड़ेगी, मैं नहीं जानता कैंट से सपा के कौन से मुस्लिम नेता टिकट मांग रहे हैं, अकेले मुस्लिम वोटों से नहीं जीता जा सकता है कैंट, भाजपा को रोकने के लिए हिन्दू-मुस्लिम दोनों का साथ जरूरी, पढ़ें दिग्गज कांग्रेस नेता नवाब मुजाहिद हसन खां का बेबाक इंटरव्यू

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विधानसभा चुनाव की आहट के साथ बरेली कैंट की सियासत भी तेजी से गरमाने लगी है। पूर्व कांग्रेस-सपा गठबंधन प्रत्याशी नवाब मुजाहिद हसन खां ने इंडिया टाइम 24 डॉट कॉम के संपादक नीरज सिसौदिया से खास बातचीत में आगामी चुनाव की तैयारियों से लेकर वोट चोरी के आरोपों, एसआईआर के जरिए मतदाता सूची में हुए बदलाव, मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर चल रहे विवाद, कैंट में मुस्लिम नेताओं के प्रभाव, हिंदू-मुस्लिम वोटों के चुनावी समीकरण, कांग्रेस-सपा गठबंधन के संभावित सीट बंटवारे, संगठन बनाम उम्मीदवार के चेहरे की लड़ाई, टिकट के दावेदारों की बढ़ती संख्या, प्रदेश और स्थानीय मुद्दों तथा अपनी चुनावी तैयारी तक तमाम सवालों पर खुलकर अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि कैंट में मुस्लिम वोट महत्वपूर्ण हैं, लेकिन केवल मुस्लिम वोटों के दम पर चुनाव जीतना संभव नहीं है। उनके मुताबिक भाजपा को रोकने के लिए हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों के वोट जरूरी होंगे। उन्होंने यह भी कहा कि यदि कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच ईमानदार और बेहतर तालमेल वाला गठबंधन होता है तो बरेली की नौ विधानसभा सीटों में से सात से आठ सीटों पर गठबंधन जीत की स्थिति में आ सकता है। पेश हैं वरिष्ठ कांग्रेस नेता नवाब मुजाहिद हसन खां से नीरज सिसौदिया की बातचीत के मुख्य अंश…

सवाल: विधानसभा चुनाव अब नजदीक आ रहे हैं। मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर पूरे देश में बवाल चल रहा है। ऐसी स्थिति में आपकी और कांग्रेस की बरेली में क्या तैयारी है कि वोट चोरी न हो?

जवाब : देखिए, जिस तरह से वोट की चोरी हुई है और बेईमानी हुई है, उसे लेकर वोटर और नेता अब दोनों ही अलर्ट हो गए हैं। एसआईआर के जरिए भी लोगों के वोट काटे गए हैं तो पब्लिक समझ गई है। पब्लिक ने अपना काफी काम तो कर लिया है। बाकी ज्ञानेश कुमार जैसे लोगों पर भी रोक जरूर लगेगी और इतनी खुलकर बेईमानी अब नहीं होगी, क्योंकि नेता और जनता सब अलर्ट हैं।

सवाल: बरेली कैंट विधानसभा सीट पर टिकट की दावेदारी कर रहे कुछ मुस्लिम नेताओं का कहना है कि कैंट सीट पर मुस्लिम नेताओं का दबदबा है, वहीं कुछ का कहना है कि कैंट सीट पर मुस्लिम नेताओं का दबदबा परिसीमन से पहले था, अब नहीं रहा। आपको क्या लगता है, मुस्लिम नेताओं का दबदबा अभी भी बरकरार है या आपको उम्मीद नहीं रह गई?

जवाब : मुस्लिम नेताओं का दबदबा तो है ही। मैं जब चुनाव लड़ा था तो मुझे 77 हजार वोट मिले थे और 77 हजार वोट मायने रखते हैं। मैं उस परिस्थिति में लड़ा था, उस माहौल में लड़ा था, जिस माहौल में भाजपा की तूती बोल रही थी और बहुमत से भी कहीं अधिक सीटें भाजपा की आईं। उन परिस्थितियों में भी मुझे 77 हजार वोट मिले तो दबदबा तो कायम है मुस्लिम नेताओं का। लेकिन यह उम्मीदवार पर भी निर्भर करता है कि कौन मुस्लिम उम्मीदवार कितने हिंदू वोट ला सकता है।

सवाल: क्या अकेले मुस्लिम वोटों के दम पर कैंट विधानसभा सीट जीती जा सकती है?

जवाब : देखिए, यह कहना तो बड़ा मुश्किल है कि अकेले दम पर जीत लेंगे। जब मैं लड़ा था तो मुझे 15 हजार हिंदू साहिबानों का वोट मिला था। तो मुझे नहीं लगता कि अकेले मुस्लिम वोटों के दम पर जीत पाएंगे और यह भी नहीं लगता कि अकेले हिंदू वोटों के दम पर भी चुनाव जीता जा सकता है। अकेले कोई नहीं जीत पाएगा, क्योंकि उसे भी दूसरे धर्म के वोट की जरूरत होगी। अगर भाजपा को रोकना है तो हिंदू और मुस्लिम दोनों वोटों की जरूरत पड़ेगी। न अकेले हिंदू वोटों के दम पर हम जीत सकते हैं और न ही अकेले मुस्लिम वोटों के दम पर।

सवाल: कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के गठबंधन की चर्चाएं बहुत जोर-शोर से चल रही हैं, लेकिन अभी तक सीटों का बंटवारा नहीं हो पाया है। आपका क्या मानना है कि सीटों का बंटवारा कब तक कर देना चाहिए?

जवाब : देखिए, सीटों का बंटवारा तो उसूलन अब हो जाना चाहिए और कैंडिडेट को, कुछ नहीं तो व्यक्तिगत रूप से यह बता देना चाहिए कि उसे ही चुनाव लड़ना है, ताकि उम्मीदवार अपनी तैयारी कर सके। लेकिन पार्टी के मामले अलग होते हैं। पार्टी यह सोचती है कि अगर जल्दी उम्मीदवार घोषित कर दिए गए तो अन्य दावेदार नाराज हो जाएंगे। कुछ लोग दूसरे दलों से टिकट ले आएंगे, कुछ लोग खुलेआम विरोध में उतर आएंगे। इन सब कंट्रोवर्सी से बचने के लिए उम्मीदवार की घोषणा ऐन वक्त पर की जाती है।
लेकिन देर से उम्मीदवार घोषित होने का नुकसान तो पार्टी को उठाना ही पड़ता है। किसी भी उम्मीदवार को अपने विधानसभा क्षेत्र में बतौर उम्मीदवार चुनावी तैयारी के लिए कम से कम तीन महीने का वक्त तो चाहिए ही होता है। लेकिन जब उसे वक्त नहीं मिलता है तो फिर वह चुनाव हवा में ही होता है।

सवाल: बात जब संगठन की आती है तो समाजवादी पार्टी हो या फिर कांग्रेस, दोनों ही संगठनात्मक रूप से भाजपा के मुकाबले काफी कमजोर नजर आते हैं। इन परिस्थितियों में आपको क्या लगता है कि संगठन की लड़ाई और उम्मीदवार के चेहरे की लड़ाई में विपक्ष कैसे पार पा सकता है?

जवाब : देखिए, अच्छे संगठन का फर्क तो पड़ता है। अगर यह कहा जाए कि संगठन का कोई फर्क नहीं पड़ता तो मेरे हिसाब से यह बात एकदम सही नहीं है। संगठन अगर आपका मजबूत नहीं होगा तो आप चुनाव नहीं जीत सकते। जब तक आपके बूथ स्तर पर कार्यकर्ता सक्रिय नहीं होंगे, तब तक आप चुनाव नहीं जीत सकते, क्योंकि संगठन जो होता है वह वोटर का हौसला बढ़ाने का काम करता है।

सवाल: कैंट विधानसभा सीट से आप भी टिकट के दावेदार हैं। वहीं कुछ और दावेदार भी समाजवादी पार्टी और कांग्रेस से दावेदारी जता रहे हैं। आपको क्या लगता है कि जितने ज्यादा दावेदार होंगे, गठबंधन को उतना नुकसान होगा या फायदा होगा?

जवाब : देखिए, नुकसान की स्थिति मैं नहीं समझता कि अब है। मैं अपनी बात नहीं कर रहा हूं, मैं एक सामान्य बात कर रहा हूं। क्योंकि जनता इस वक्त सरकार से बड़ी त्रस्त है। महंगाई है, बेरोजगारी है और भी कई छोटी-छोटी चीजें हैं, जिन्होंने आम जनता को परेशान किया हुआ है। जो आदमी पहले 12-15 हजार रुपये में अपना घर चला लेता था, वह आज अपना घर नहीं चला पा रहा। तो इसका फर्क तो पड़ेगा ही।

 

सवाल: तो क्या यह पूरा चुनाव प्रदेश के मुद्दों पर लड़ा जाएगा या स्थानीय मुद्दे भी इसमें कुछ भूमिका निभाएंगे?

जवाब : देखिए, मुझे तो यह लगता है कि चुनाव अब लहर का हो गया है। जिसने अपनी लहर बना ली, हवा बना ली, चाहे सच बोलकर, चाहे झूठ बोलकर, तो हमारी जो जनता है वह भेड़चाल में उसी के पीछे चल पड़ती है। तो चुनाव अब सिर्फ लहर का रह गया है। मुद्दे होते हैं, लेकिन उस लहर के सामने मुद्दे बहुत पीछे रह जाते हैं।

सवाल: समाजवादी पार्टी से कुछ मुस्लिम नेता भी टिकट की दावेदारी कर रहे हैं। आपको क्या लगता है कि वे नेता जीतने की स्थिति में हैं?

जवाब : मुझे नहीं पता कि समाजवादी पार्टी से कौन से मुस्लिम नेता टिकट मांग रहे हैं। नेता तो नेता होता है। जिस तरह से हिंदू नेता टिकट मांग रहे हैं, वैसे ही मुस्लिम नेता भी टिकट मांग रहे हैं। यह पब्लिक को तय करना होता है कि उसे कौन सा नेता पसंद है।

सवाल: आपका चुनाव लड़ने का क्या विचार है?

जवाब : पार्टी के हक में अगर सीट चली गई बरेली कैंट की और पार्टी ने ऑफर किया तो लड़ लेंगे और पार्टी ने ऑफर नहीं किया तो नहीं लड़ेंगे। हम तो पार्टी के वफादार हैं।

सवाल: आपको क्या लगता है, वर्तमान माहौल को देखकर कि समाजवादी पार्टी और कांग्रेस का गठबंधन जिले की नौ में से कितनी विधानसभा सीटें जीतने की स्थिति में है?

जवाब : देखिए, अगर गठबंधन अच्छा हो गया और ईमानदारी से हो गया तथा दोनों पार्टियों ने ठीक तरीके से तालमेल बिठा लिया, नफरत अपने दिल से निकाल दी तो नौ में से सात से आठ सीट गठबंधन जीत सकता है।

सवाल: अगर कांग्रेस और समाजवादी पार्टी का गठबंधन होता है तो आपके हिसाब से कांग्रेस को बरेली जिले की कितनी सीटों पर दावा करना चाहिए और वह कौन-कौन सी सीटें हैं, जहां कांग्रेस जीतने की स्थिति में आपको लगती है?

जवाब : देखिए, इस बार राहुल गांधी जी ने बहुत मेहनत करके कांग्रेस के पक्ष में एक माहौल बनाया है और जनता के दिल में कांग्रेस के लिए एक सहानुभूति है। इस वक्त तो तमाम पढ़े-लिखे और ओबीसी राहुल गांधी जी की तारीफ करते हैं, उनके बारे में ही बात करते हैं। तो कांग्रेस जहां से भी लड़ेगी, बहुत अच्छा लड़ेगी।

रही बात सीटों की तो भोजीपुरा भी कांग्रेस के लिए अच्छी है, कैंट भी अच्छी है, शहर भी अच्छी है, बहेड़ी भी अच्छी है, फरीदपुर भी अच्छी है और बिथरी भी अच्छी है। अगर कांग्रेस इन सीटों पर लड़ती है तो कांग्रेस की स्थिति यहां ज्यादा अच्छी रहेगी।

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