नीरज सिसौदिया, बरेली
बदायूं की राजनीति में एक बड़े राजनीतिक परिवार का भारतीय जनता पार्टी से मोहभंग होकर समाजवादी पार्टी की ओर जाना भाजपा के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। भाजपा के पूर्व विधायक कुशाग्र सागर के समाजवादी पार्टी में शामिल होने की तैयारी के पीछे वरिष्ठ सपा नेता और दो बार के ब्लॉक प्रमुख चंद्रसेन सागर की भूमिका को अहम माना जा रहा है। सपा महासचिव शिवपाल यादव की चाल पर चंद्रसेन सागर ने ऐसा कमाल कर दिखाया कि भगवा ब्रिगेड की नींद हराम हो गई।चंद्रसेन सागर ने वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में बदायूं सीट पर आदित्य यादव के पक्ष में प्रचार की जिम्मेदारी संभाली थी। अब उनके रिश्तेदार कुशाग्र सागर का सपा की ओर रुख करना जिले के राजनीतिक समीकरणों में एक नया अध्याय जोड़ रहा है। कुशाग्र सागर आगामी 26 अक्टूबर को लखनऊ में औपचारिक रूप से समाजवादी पार्टी में शामिल होंगे।
कुशाग्र सागर काे मिली सियासत की विरासत बेहद समृद्ध है। उनका परिवार लंबे समय से बदायूं की राजनीति में प्रभाव रखता रहा है। उनके पिता योगेंद्र सागर विधायक रह चुके हैं और परिवार के अन्य सदस्य भी प्रशासनिक तथा पुलिस सेवाओं से जुड़े रहे हैं। ऐसे परिवार का भाजपा से अलग होकर सपा में जाना केवल एक नेता के पाला बदलने तक सीमित नहीं है। इससे बदायूं में परिवार के पुराने राजनीतिक संपर्कों, समर्थकों और स्थानीय समीकरणों को लेकर भी चर्चा तेज हो सकती है।

चंद्रसेन सागर की भूमिका से जुड़ी है राजनीतिक घटनाक्रम की कड़ी
चंद्रसेन सागर बदायूं और बरेली की राजनीति में समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं में गिने जाते हैं। वह दो बार ब्लॉक प्रमुख रह चुके हैं और सैफई परिवार के साथ उनके पुराने संबंध बताए जाते हैं। उनके बड़े भाई डॉ. सियाराम सागर पांच बार विधायक रहे थे और समाजवादी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के भरोसेमंद नेताओं में शामिल माने जाते थे। चंद्रसेन सागर की गिनती सपा महासचिव शिवपाल सिंह यादव के चुनिंदा करीबियों में होती है।
वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में शिवपाल सिंह यादव ने बदायूं सीट पर आदित्य यादव के चुनाव अभियान के लिए चंद्रसेन सागर को विशेष जिम्मेदारी सौंपी थी। चंद्रसेन सागर ने केवल बिसौली क्षेत्र तक अपनी भूमिका सीमित नहीं रखी, बल्कि पूरे लोकसभा क्षेत्र में प्रचार किया। उनकी कोशिश दलित मतदाताओं को आदित्य यादव के पक्ष में लामबंद करने की थी। इस चुनाव में कुशाग्र सागर के परिवार से जुड़े कई लोग भी आदित्य यादव के समर्थन में जुटे थे।

इस राजनीतिक घटनाक्रम का असर भाजपा के भीतर भी महसूस किए जाने की बात सामने आई। बताया जाता है कि भाजपा के तत्कालीन बदायूं लोकसभा प्रत्याशी दुर्विजय सिंह शाक्य चुनाव के बाद कुशाग्र सागर को लेकर असहज थे और उनके टिकट को लेकर सवाल उठा रहे थे। ऐसे में लोकसभा चुनाव के बाद कुशाग्र सागर की भाजपा में राजनीतिक स्थिति और भविष्य को लेकर चर्चाएं शुरू हो गई थीं।
अब कुशाग्र सागर का सपा में जाना इस घटनाक्रम की अगली कड़ी के रूप में देखा जा रहा है। चंद्रसेन सागर की भूमिका को इस लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है कि लोकसभा चुनाव के दौरान बने राजनीतिक संपर्क और पारिवारिक रिश्ते अब विधानसभा चुनाव से पहले नए राजनीतिक समीकरण का आधार बन सकते हैं।
योगेंद्र सागर से कुशाग्र तक, तीन दशक का राजनीतिक सफर
कुशाग्र सागर के परिवार की राजनीतिक पृष्ठभूमि तीन दशक से अधिक पुरानी है। बदायूं जिले के तिलोकपुर गांव से जुड़े इस परिवार में कृष्ण प्रकाश सागर के पुत्र योगेंद्र सागर ने राजनीति में पहचान बनाई। उनके भाई अनिल सागर 1995 बैच के आईपीएस अधिकारी थे, जिनका कुछ वर्ष पहले निधन हो गया। परिवार के एक अन्य सदस्य संजीव सागर उत्तर प्रदेश पुलिस में निरीक्षक रहे, लेकिन बाद में उन्होंने सेवा से त्यागपत्र दे दिया था।

योगेंद्र सागर ने वर्ष 1993 में भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर बिल्सी विधानसभा सीट से चुनाव जीतकर विधायक के रूप में अपनी पहचान बनाई। 1996 के विधानसभा चुनाव में वह मायावती के खिलाफ मैदान में उतरे और कड़ी चुनौती दी। उन्हें महज दो हजार मतों के अंतर से हार का सामना करना पड़ा था। इसके बाद बिल्सी सीट पर हुए उपचुनाव में भाजपा के टिकट पर मैदान में उतरे, लेकिन बसपा के भोला शंकर मौर्य ने जीत हासिल की। भाजपा और बसपा के बीच गठबंधन सरकार के दौरान योगेंद्र सागर को भाजपा कोटे से आईटीआर का अध्यक्ष बनाया गया था और उन्हें लालबत्ती भी मिली थी।
2002 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने योगेंद्र सागर को टिकट नहीं दिया। इसके बाद वह कल्याण सिंह की पार्टी राष्ट्रीय क्रांति दल में शामिल हो गए और चुनाव लड़ा, लेकिन जीत नहीं सके। वर्ष 2007 में उन्होंने बसपा के टिकट पर बिल्सी से चुनाव जीतकर फिर विधानसभा में जगह बनाई। बाद में परिसीमन के दौरान बिल्सी सामान्य सीट हो गई और बिसौली आरक्षित विधानसभा क्षेत्र बना। इसके बाद परिवार की राजनीतिक सक्रियता बिसौली की ओर केंद्रित हुई। योगेंद्र सागर की पत्नी पुष्पा देवी, जिन्हें प्रीति सागर के नाम से भी जाना जाता है, ने बसपा के टिकट पर चुनाव लड़ा, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली।

2017 में भाजपा के टिकट पर जीते कुशाग्र सागर
कुशाग्र सागर की राजनीति में निर्णायक मोड़ वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव से पहले आया। शुरुआत में उन्हें बसपा का टिकट दिए जाने की चर्चा थी, लेकिन चुनाव से पहले उनका टिकट कट गया। इसके बाद भाजपा ने उन्हें बिसौली विधानसभा सीट से उम्मीदवार बनाया। कुशाग्र सागर ने चुनाव जीतकर परिवार की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाया।
2022 के विधानसभा चुनाव में भी भाजपा ने उन पर भरोसा जताया। हालांकि, इस बार समाजवादी पार्टी के आशुतोष मौर्य ने उन्हें बेहद करीबी मुकाबले में हरा दिया। आधिकारिक चुनावी आंकड़ों के मुताबिक, कुशाग्र सागर को 1,08,735 वोट मिले, जबकि आशुतोष मौर्य को 1,10,569 वोट हासिल हुए। हार का अंतर महज 1,834 वोट था। यह परिणाम बताता है कि बिसौली में मुकाबला कितना करीबी था और कुशाग्र सागर के पास अपना एक चुनावी आधार मौजूद था।
अब कुशाग्र सागर का सपा में जाना बिसौली की राजनीति में महत्वपूर्ण हो सकता है। वह पहले भाजपा के विधायक रह चुके हैं और 2022 में भी उन्होंने एक मजबूत चुनावी मुकाबला किया था। यदि वह अपने पुराने समर्थकों का एक हिस्सा सपा के साथ जोड़ पाते हैं, तो इससे पार्टी को लाभ मिल सकता है। लेकिन भाजपा से जुड़े सभी मतदाताओं का उनके साथ आना तय नहीं है। चुनावी राजनीति में उम्मीदवार के साथ पार्टी का आधार, स्थानीय नेतृत्व और मतदाताओं का रुझान भी निर्णायक होता है।
भाजपा से दूरी और सपा की ओर रुख
कुशाग्र सागर ने 21 अक्टूबर को भाजपा से इस्तीफा दिया। उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर इसके बाद चर्चाएं तेज हुईं। सपा में शामिल होने की तैयारी को इसी क्रम में देखा जा रहा है। 26 अक्टूबर को लखनऊ में औपचारिक ज्वाइनिंग की बात सामने आने से यह संभावना और मजबूत हुई है।
भाजपा के लिए यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है कि कुशाग्र सागर केवल पूर्व विधायक नहीं हैं, बल्कि उनका परिवार लंबे समय से क्षेत्रीय राजनीति में सक्रिय रहा है। उनके पिता की राजनीतिक विरासत, परिवार के स्थानीय संपर्क और 2017 तथा 2022 के चुनावों में उनका प्रदर्शन बिसौली में उन्हें एक पहचाना हुआ चेहरा बनाते हैं। सपा के लिए उनका साथ मिलना भाजपा के पुराने समर्थक वर्ग तक पहुंच बनाने का अवसर हो सकता है।
फिलहाल इतना तय है कि कुशाग्र सागर का भाजपा से अलग होकर सपा में जाना बदायूं की राजनीति में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम है। चंद्रसेन सागर की भूमिका ने इस घटनाक्रम को और राजनीतिक महत्व दिया है। आने वाले विधानसभा चुनाव में यह देखना दिलचस्प होगा कि परिवार की पुरानी राजनीतिक विरासत और बदले हुए दलगत समीकरण समाजवादी पार्टी को कितना फायदा पहुंचाते हैं।




