नीरज सिसौदिया, बरेली
बरेली जिले की बहेड़ी विधानसभा सीट पर 2027 के चुनाव से पहले नसीम अहमद की नई राजनीतिक पारी चर्चा में है। 2017 में बहुजन समाज पार्टी के टिकट पर 66,009 वोट हासिल कर दूसरे स्थान पर रहे नसीम अब आजाद समाज पार्टी के साथ अपनी सियासी जमीन तलाश रहे हैं। बसपा से समाजवादी पार्टी, फिर बसपा और अब आजाद समाज पार्टी तक का उनका सफर कई सवाल खड़े करता है। क्या वह 2017 का प्रदर्शन दोहरा पाएंगे? क्या उनकी नई राजनीतिक भूमिका बहेड़ी विधानसभा सीट से समाजवादी पार्टी के मौजूदा विधायक अताउर रहमान के लिए चुनौती बनेगी? और बसपा तथा आजाद समाज पार्टी बहेड़ी में कितना प्रभाव छोड़ पाएंगी?
इन सवालों के जवाब के लिए नसीम अहमद के पिछले चुनावी प्रदर्शन और उनके राजनीतिक सफर को समझना जरूरी है। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के छत्रपाल सिंह गंगवार 1,08,846 वोट हासिल कर विधायक बने थे। बसपा के नसीम अहमद को 66,009 वोट मिले और वह दूसरे स्थान पर रहे। नसीम अहमद का यह पहला विधानसभा चुनाव था। समाजवादी पार्टी के अता उर रहमान 63,841 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर खिसक गए थे। नसीम और अता उर रहमान के बीच 2,168 वोटों का अंतर था।
नसीम अहमद के लिए यह प्रदर्शन इसलिए अहम था, क्योंकि उन्होंने अपने पहले बड़े चुनावी मुकाबले में सपा के उम्मीदवार को पीछे छोड़ दिया था। हालांकि, भाजपा की जीत का अंतर काफी बड़ा था। इसलिए 2017 का चुनाव नसीम की भाजपा को चुनौती देने से ज्यादा विपक्ष की राजनीति में अपनी पहचान बनाने के लिहाज से महत्वपूर्ण रहा।

लेकिन अब परिस्थितियां काफी बदल चुकी हैं। नसीम अहमद 2017 में जब बसपा से चुनाव लड़े थे तब बसपा इतनी कमजोर पार्टी नहीं थी। उसका अपना एक जनाधार था और नसीम अहमद का वह पहला विधानसभा चुनाव था। उसके बाद नसीम अहमद का सियासी कद काफी बढ़ गया था। फिर नगरपालिका चेयरमैन पद के चुनाव हुए और नसीम अहमद की पत्नी चेयरमैन बनीं। पांच साल तक नसीम अहमद ने पत्नी की चेयरमैनी पूरी दबंगई से चलाई। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले नसीम अहमद समाजवादी पार्टी में शामिल हुए थे। उन्हें उम्मीद थी कि 2017 के प्रदर्शन और बहेड़ी में अपनी पहचान के दम पर पार्टी उन्हें उम्मीदवार बना सकती है। लेकिन अखिलेश यादव ने बहेड़ी से अता उर रहमान को टिकट दिया। नसीम अहमद को करहल विधानसभा क्षेत्र का प्रभारी बना दिया गया, जिससे वह बहेड़ी की चुनावी राजनीति से दूर रहे। सपा में शामिल होने के बाद उनके सियासी सफर पर ग्रहण लगना शुरू हो गया। पहले उन्हें बहेड़ी से विधानसभा का टिकट नहीं दिया गया। नसीम के समर्थकों के नजरिये से यह उनके लिए बड़ा झटका था। जिस सीट पर उन्होंने पिछली बार सपा के उम्मीदवार को पीछे छोड़ा था, उसी सीट से उन्हें चुनाव लड़ने का अवसर नहीं मिला। नसीम अहमद का यह जख्म अभी भरा भी नहीं था कि अखिलेश यादव ने उन्हें एक और जख्म दे दिया। उन्हें बहेड़ी नगरपालिका चुनाव में चेयरमैन पद का टिकट देकर वापस ले लिया। उसके बाद नसीम अहमद की हिस्ट्रीशीट खोल दी गई। उन पर कई मुकदमे भी दर्ज किए गए। इन घटनाक्रमों का असर दो तरह से पड़ सकता है पहला यह कि नसीम अहमद के प्रति एक सहानुभूति हो सकती है और दूसरा यह कि उन्हें अब कमजोर नेता मानते हुए जनता दूर हो सकती है।
2022 के चुनावी नतीजे अता उर रहमान के पक्ष में रहे। उन्होंने 1,24,145 वोट हासिल कर भाजपा के छत्रपाल सिंह गंगवार को 3,355 वोटों से हराया। बसपा के असे राम 15,814 वोट पाकर तीसरे स्थान पर रहे। यानी बसपा का जनाधार अब भी बहुत कमजोर नहीं रहा था।
हालांकि नसीम अहमद की गैरमौजूदगी को अता उर रहमान की जीत का एकमात्र कारण नहीं माना जा सकता। फिर भी, इतना स्पष्ट है कि सपा के भीतर संभावित प्रतिस्पर्धा खत्म होने के बाद अता उर रहमान बहेड़ी में पार्टी का प्रमुख चेहरा बनकर चुनाव लड़े और जीत गए।
बसपा में वापसी के बाद अब आजाद समाज पार्टी का साथ
सपा से टिकट नहीं मिलने के बाद नसीम अहमद ने फिर बसपा का दामन थामा। उनकी बसपा में वापसी को 2027 के चुनाव की तैयारी माना जा रहा था। अब आजाद समाज पार्टी से जुड़ने के बाद उनकी राजनीतिक संभावनाएं फिर सुर्खियों में आ गई हैं। आजाद समाज पार्टी में बसपा के कई नेता शामिल हो चुके हैं। एक दौर में संगठन की राजनीति में माहिर माने जाने वाले ब्रह्मस्वरूप सागर कुछ समय पूर्व ही आजाद समाज पार्टी का हिस्सा बने थे। संभव है कि पार्टी में नसीम अहमद की एंट्री के पीछे सागर का बड़ा हाथ हो। लेकिन नसीम के इस कदम के पीछे का वास्तविक कारण बसपा का कमजोर होना बताया जा रहा है। राजनीतिक नजरिये से यह बदलाव अपनी अलग पहचान बनाने और नए मंच से चुनावी संभावनाएं तलाशने की कोशिश हो सकता है। लेकिन नसीम अहमद को इसका कितना लाभ मिलेगा यह फिलहाल नहीं कहा जा सकता। इसकी वजह भी स्पष्ट है। आजाद समाज पार्टी का बहेड़ी में कोई जनाधार नहीं है। ऐसे में नसीम के समक्ष बहेड़ी में पहली चुनौती तो संगठन को खड़ा करने की होगी। नसीम अहमद पार्टी के लिए तो फायदेमंद हो सकते हैं लेकिन पार्टी उनके लिए फायदेमंद बिल्कुल नहीं होगी। जबकि इसके उलट बसपा में रहने का लाभ उन्हें कुछ हद तक मिल सकता था। लगातार दल बदलने से उनके सामने एक चुनौती भी है, उन्हें मतदाताओं और समर्थकों को भरोसा दिलाना होगा कि उनकी बहेड़ी की राजनीति के प्रति प्रतिबद्धता कायम है।
इस तस्वीर का एक और पहले है कि अगर आजाद समाज पार्टी इंडिया गठबंधन में शामिल हो जाती है तो नसीम अहमद 2022 की तरह फिर से खुद ठगा हुआ महसूस कर सकते हैं। क्योंकि अता उर रहमान के मौजूदा विधायक होने के कारण यह सीट अखिलेश यादव किसी भी कीमत पर यह सीट किसी भी गठबंधन सहयोगी को नहीं देने वाले।
बसपा और आजाद समाज पार्टी के प्रदर्शन पर भी नजर
बहेड़ी में बसपा का पिछला प्रदर्शन भी गौर करने लायक है। 2017 में नसीम अहमद ने बसपा के टिकट पर 66,009 वोट हासिल किए थे, जबकि 2022 में पार्टी के उम्मीदवार असे राम को 15,814 वोट मिले। इन आंकड़ों से पता चलता है कि दोनों चुनावों में बसपा का प्रदर्शन काफी अलग रहा। लेकिन यह मान लेना सही नहीं होगा कि 2017 में मिले सभी वोट नसीम अहमद के व्यक्तिगत प्रभाव के कारण ही आए थे।
अब नसीम अहमद आजाद समाज पार्टी के साथ आगे बढ़ते हैं, तो बसपा को भी अपना संगठन और उम्मीदवार मजबूत करने की चुनौती होगी। वहीं आजाद समाज पार्टी के लिए बहेड़ी में अपनी पहचान बढ़ाने का अवसर होगा। दोनों दलों के प्रभाव का वास्तविक आकलन तभी हो सकेगा, जब उनके उम्मीदवार और चुनावी तैयारी स्पष्ट होगी।

अता उर रहमान के सामने कैसी चुनौती?
2027 में अता उर रहमान के सामने अपनी जीत दोहराने की चुनौती होगी। 2022 में उनकी जीत का अंतर केवल 3,355 वोट था, इसलिए चुनावी समीकरण में छोटा बदलाव भी महत्वपूर्ण हो सकता है। नसीम अहमद यदि प्रभावशाली उम्मीदवार के रूप में सामने आते हैं, तो सपा को उनके संभावित प्रभाव का आकलन करना पड़ेगा।
हालांकि, यह पहले से तय नहीं है कि नसीम अहमद के मैदान में उतरने से अता उर रहमान के वोट ही प्रभावित होंगे। वह नए मतदाताओं को भी आकर्षित कर सकते हैं या उनका प्रभाव सीमित रह सकता है। दूसरी ओर, भाजपा को भी इस बार विधानसभा चुनाव में नए चेहरे के साथ मैदान में उतरना पड़ सकता है, क्योंकि छत्रपाल सिंह गंगवार अब सांसद हैं।
नसीम अहमद के लिए असली परीक्षा यह होगी कि क्या वह 2017 जैसा चुनावी प्रभाव नए दल के साथ कायम रख पाते हैं। पिछला प्रदर्शन उन्हें राजनीतिक पहचान देता है, लेकिन पांच साल से अधिक समय में पार्टी, उम्मीदवार और मतदाताओं के समीकरण बदल चुके हैं।
उनकी सफलता आजाद समाज पार्टी के संगठन, स्थानीय मुद्दों पर पकड़ और समर्थकों को एकजुट रखने की क्षमता पर निर्भर करेगी। साथ ही, बसपा की रणनीति और सपा के उम्मीदवार का चयन भी बहेड़ी की लड़ाई को प्रभावित करेगा।
बहेड़ी की सियासत में नसीम अहमद पहले ही दिखा चुके हैं कि वह अता उर रहमान को पीछे छोड़ सकते हैं। अब सवाल यह है कि क्या वह नए राजनीतिक मंच पर अपनी ताकत फिर साबित कर पाएंगे, या दल बदलने की चुनौती उनके रास्ते में बाधा बनेगी। इसका फैसला 2027 की चुनावी तैयारी और मतदाताओं के रुख से ही होगा।




