इंटरव्यू

16 साल की उम्र में गए थे जेल, बरेली के कई ऐतिहासिक आंदोलनों के रहे सूत्रधार, अब हिलाकर रख दी हैं प्रशासन की चूलेें, पढ़ें व्यापारी नेता विशाल मेहरोत्रा का एक्सक्लूसिव इंटरव्यू

सियासत का हुनर उन्हें अपने पिता से विरासत में मिला है. 90 के दशक में हुए आरक्षण विरोधी आंदोलन मेें महज 16 साल की उम्र में जेल जाने वाले विशाल मेहरोत्रा इन दिनों कुतुबखाना ओवरब्रिज के विरोध में आंदोलन पर डटे हैं. विशाल का बचपन किन गलियों में बीता? व्यापार मंडल में कब और कैसे आना हुआ? विशाल मेहरोत्रा आंदोलनों में तो सक्रिय भूमिका निभाते रहे लेकिन कभी किसी पार्टी की सदस्यता नहीं ली. दो साल पहले ही वह भाजपा में शामिल हुए. कुतुबखाना ओवरब्रिज का विरोध वह क्यों कर रहे हैं? कैसा रहा उनका अब तक का सफर? विभिन्न पहलुओं पर विशाल मेहरोत्रा ने नीरज सिसौदिया के साथ खुलकर बात की. पेश हैं बातचीत के मुख्य अंश…
सवाल : आपका बचपन कहां बीता, पारिवारिक पृष्ठभूमि क्या रही?
जवाब : मैं बरेली के बिहारीपुर क्षेत्र का रहने वाला हूं. मेरा बचपन बिहारीपुर में ही बीता. मेरे पिता रविशंकर मेहरोत्रा बरेली कॉलेज के प्रीमियर थे. वे तीन बार बिहारीपुर वार्ड से ही पार्षद भी रहे. प्राइमरी की शिक्षा बरेली में लेने के बाद मैं अपने रिश्तेदारों के पास तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली चला गया था. वहां तीन-चार साल पढ़ाई की फिर क्योंकि मेरे पिताजी राजनीति में थे इसलिए मुझे वापस आना पड़ा और मैंने व्यापार संभाला. हम दो भाई एक बहन हैं जिनमें में सबसे बड़ा हूं.
सवाल : समाज सेवा के क्षेत्र में कब आना हुआ और आंदोलनों की शुरुआत कैसे हुई?
जवाब : पिताजी के राजनीति से जुड़े होने के कारण मेरे घर में समाजसेवियों और राजनेताओं का आना जाना रहता था. पिता जी के अंदर समाज सेवा का एक जज्बा था या यूं कह सकते हैं कि समाज सेवा और सियासत मुझे विरासत में अपने पिताजी से ही मिली है. मेरे पिता 9 साल हमारे खत्री समाज के अध्यक्ष भी रहे. ऐसे में हम जो कुछ घर में देखते थे वही सीखते थे और मेरा भी समाज सेवा से जुड़ा होता चला गया. वर्ष 1990 की बात है उस समय आरक्षण का आंदोलन चल रहा था तब मेरी उम्र 16 साल की थी लेकिन उस आंदोलन में मैंने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया जिसके चलते मुझे जेल में डाल दिया गया. एक बार जेल जाने के बाद फिर मैं इसी क्षेत्र का हिस्सा बन गया. उस आंदोलन में जेल जाने वाला मैं सबसे कम उम्र का आंदोलनकारी था.
सवाल : आगे का सफर कैसा रहा, व्यापार मंडल में कब जुड़ना हुआ?
जवाब : मैं वर्ष 1996 में पहली बार युवा व्यापार मंडल का हिस्सा बना. वर्ष 2003 की बात है. उस वक्त यहां बिजली की बड़ी समस्या हुआ करती थी. सिर्फ दो- 2 घंटे ही लाइट मिला करती थी और 22 घंटे तक लोगों को बिना बिजली के ही परेशान रहना पड़ता था. मुझे आज भी याद है कि वह जन्माष्टमी का दिन था और उस दिन सिर्फ 2 घंटे बिजली मिली थी. शहरवासियों की ऐसी अनदेखी बर्दाश्त योग नहीं थी. उस वक्त मैंने और मेरे दोस्त अविनेश मित्तल ने यह फैसला लिया कि जब तक बिजली की व्यवस्था ठीक नहीं हो जाती है तब तक हम दोनों आमरण अनशन करेंगे. इसके बाद जन्माष्टमी के अगले ही दिन हम दोनों आमरण अनशन पर मोती पार्क में बैठ गए. उस वक्त जो लोग हमारे पास आया करते थे वह बताते थे कि बरेली के इतिहास में ऐसा आंदोलन स्वतंत्रता संग्राम के बाद पहले कभी नहीं हुआ था जिसमें पूरा शहर, यहां तक कि ठेले और खोखे वाले तक हमारे साथ थे. यही वजह थी कि 3 दिन तक हमारे आमरण अनशन पर बैठने के बाद सरकार को झुकना पड़ा और चौथे दिन सरकार ने हमारी मांगें पूरी करते हुए 18 घंटे शहर को बिजली देने का भरोसा दिलाया. यह व्यवस्था आज भी लागू है. उस आंदोलन के बाद व्यापार मंडल में मेरी सक्रियता काफी बढ़ गई.

कुतुबखाना आंदोलन के बारे में जानकारी देते विशाल मेहरोत्रा.

सवाल : राष्ट्र जागरण व्यापार मंडल से कब जुड़ना हुआ?
जवाब : पहले मैं जिस व्यापार मंडल का हिस्सा था उसका नाम पश्चिमी उद्योग व्यापार मंडल था. स्व. नेकीराम गर्ग उसके प्रदेश अध्यक्ष हुआ करते थे. फिर कुछ विवाद होने के चलते हम लोग उत्तर प्रदेश उद्योग व्यापार संगठन से जुड़ गए जो नरेश अग्रवाल जी का था लेकिन नरेश अग्रवाल सत्ता के साथ ही ज्यादा रहते थे, यह बात हमें बिल्कुल भी पसंद नहीं थी. उस दौरान स्थानीय व्यापारियों की मांग थी कि स्थानीय स्तर पर एक ऐसा व्यापार मंडल बनाया जाए जो व्यापारियों की समस्याओं के साथ ही समाज सेवा के क्षेत्र में भी अहम भूमिका अदा कर सके. व्यापारियों की इसी मांग को देखते हुए मार्च 2020 में हमने स्थानीय स्तर पर राष्ट्र जागरण व्यापार मंडल का गठन किया और मैं उसमें बतौर संस्थापक सदस्य एवं महानगर अध्यक्ष जुड़ा हुआ हूं.
सवाल : हाल ही में आपने कुतुबखाना ओवरब्रिज को लेकर बड़ा आंदोलन शुरू किया है, इसका विरोध आप क्यों कर रहे हैं?
जवाब : देखिए कुतुबखाना ओवरब्रिज बनाने की मांग सबसे पहले हम ही लोगों ने उठाई थी लेकिन जब हम व्यापारियों के बीच गए और उनका दर्द जाना तो लगा कि अभी इसकी आवश्यकता नहीं है. जाम से निजात दिलाने के लिए अन्य उपाय भी हो सकते हैं. इसके लिए अंडर पास बनाया जा सकता है और अतिक्रमण हटाने का काम भी किया जाए तो समस्या का समाधान हो सकता है लेकिन प्रशासन यह काम नहीं करना चाहता. एक दौर था जब कोहाड़ा पीर से कुतुबखाना के लिए बसें और ट्रक जाया करते थे. यहां मिनी बसें चला करती थीं जहां आज कोहाड़ापीर चौकी है उसके पास मिनी बस स्टैंड हुआ करता थ. कुतुब खाना सब्जी मंडी कभी तांगा स्टैंड हुआ करती थी और यहां से तांगे चला करते थे. उस वक्त यह नेशनल हाईवे हुआ करता था. अब सड़कें तो वही हैं लेकिन कुछ अधिकारियों की मिलीभगत से उस पर अतिक्रमण हो गया है जिसकी वजह से आज यह स्थिति पैदा हुई है. अगर प्रशासन ईमानदारी से काम करे तो इस समस्या का समाधान हो सकता है. जिस इलाके में जिस सड़क पर कभी बसें चला करती थीं आज वहां एक स्कूटर भी निकल जाता है तो जाम लग जाता है. यह स्थिति निश्चित तौर पर अधिकारियों की अनदेखी और उनकी मिलीभगत से पैदा हुई है.

विशाल मेहरोत्रा

सवाल : कुतुबखाना ओवरब्रिज बनने से क्या नुकसान होगा?
जवाब : कुतुबखाना ओवरब्रिज अगर अस्तित्व में आता है तो यहां कि बाजारों का ऐतिहासिक स्वरूप पूरी तरह से नष्ट हो जाएगा. साथ ही व्यापार भी चौपट हो जाएगा. अगर हम कुतुबखाना चौराहे पर खड़े हों तो देखेंगे कि यहां से 500 मीटर के दायरे में दुनिया का सबसे बड़ा मॉल है. 500 मीटर के अंदर जन्म से लेकर अंतिम संस्कार तक जरूरत का हर सामान मिलता है. प्रशासन अपनी मनमानी के चलते बाजार के ऐतिहासिक स्वरूप को ही खत्म करना चाहता है. यहां जो दुकानें हैं वह आज से नहीं बल्कि चार- चार, पांच-पांच पीढ़ियों से हैं. पहले परदादा, फिर दादा फिर पिता और फिर युवा कारोबार संभाल रहे हैं. अब आप बताइए कि जो व्यापार चार पीढ़ियों से चला आ रहा है अचानक उसे हटा दिया जाएगा तो वे लोग कहां जाएंगे? उम्र के इस पड़ाव में क्या जिंदगी की दोबारा शुरुआत संभव है. ये मुद्दे ऐसे हैं जब प्रशासन व्यापारियों के और जनप्रतिनिधियों के साथ बैठेगा, उनकी बात सुनेगा उनकी बातों को समझेगा तो उसे इस चीज का एहसास होगा. हम विकास विरोधी नहीं हैं विकास हम भी चाहते हैं लेकिन विकास के नाम पर किसी व्यापारी का अहित नहीं होने देंगे. जाम की समस्या का एकमात्र कारण पुलिस की लापरवाही और अतिक्रमण है. इसे हटा दिया जाए तो समस्या का समाधान हो सकता है. इनकी ट्रैफिक पुलिस क्या कर रही है पुलिस वाले काम क्यों नहीं कर रहे. हाल ही में कहा गया था कि जिस इलाके में भी अतिक्रमण होगा वहां की जिम्मेदार चौकी और थाना पुलिस होगी लेकिन अतिक्रमण हो रहा है. हटाने के बाद लोग दोबारा अतिक्रमण करके बैठे हुए हैं और कुछ लोग उनसे अवैध वसूली कर रहे हैं मगर पुलिस खामोश है. आप ठेले पर वालों को क्यों नहीं हटाते? नगर निगम की इतनी जमीन है, सरकार की कितनी जमीनें खाली पड़ी हुई हैं आप उन लोगों को उन जगहों पर शिफ्ट क्यों नहीं करते? उनके लिए अलग से जोन बनाइए, उन्हें वहां स्थापित किया जाए ताकि उनकी भी रोजी-रोटी चलती रहे और उनकी वजह से व्यापारियों का भी नुकसान न हो. आज एक व्यापारी 5 करोड़ की दुकान खोल कर बैठा है और 10 करोड़ का माल उसने दुकान में रखा है, उसे बैंक की किश्त भी देनी है लेकिन उसके आगे एक ठेले वाला अपनी दुकान लगा लेता है और जो रोजाना ₹500 बनाकर चलता बनता है. उसके इन ₹500 की वजह से 5 करोड़ की दुकान लगाने वाले व्यापारी का कारोबार पूरी तरह से चौपट हो जाता है. इसके बावजूद ये लोग हटाने को तैयार नहीं होते क्योंकि कुछ लोग इनसे अवैध वसूली करते हैं और वह नहीं चाहते कि अतिक्रमण हटे व समस्या का समाधान हो. सिर्फ व्यापारियों का ही नुकसान किया जा रहा है. पिछले दिनों खुद महापौर उमेश गौतम शहर की सड़कों पर उतर गए थे और अतिक्रमण हटवाया. इसके बावजूद दोबारा अतिक्रमण हो गया. जब मंत्री का दौरा होता है, मुख्यमंत्री का दौरा होता है तब एक दिन में ही सड़कें चौड़ी हो जाती हैं और अतिक्रमण साफ हो जाता है लेकिन बाद में व्यवस्था और स्थिति वैसी ही हो जाती है ऐसा क्यों हो रहा है? प्रशासनिक अधिकारियों को व्यापारी हित में कार्य करना चाहिए न कि दमनकारी नीतियों को अपनाना चाहिए. उन्हें कोई भी योजना लागू करनी है तो पहले व्यापारियों और जनप्रतिनिधियों की राय ले कि उन्हें क्या चाहिए जबरदस्ती लोगों पर योजनाएं ना थोपी जाएं.

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