नीरज सिसौदिया, बरेली
भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय स्तर पर होने वाले सांगठनिक चुनाव के लिए सांसद लक्ष्मण के नेतृत्व में कमेटी गठन के साथ ही महानगर भाजपा में भी नए अध्यक्ष को लेकर कयासों का दौर तेज हो गया है। मौजूदा महानगर अध्यक्ष अधीर सक्सेना की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है और नए अध्यक्ष की तलाश तेजी से की जा रही है। इस बार संगठन यह चाहता है कि कोई ऐसा चेहरा बरेली भाजपा का नेतृत्व करे जो पूरी तरह निष्पक्ष और निर्भीक हो और किसी स्थानीय नेता का पिछलग्गू तो बिल्कुल भी न हो। जाहिर तौर पर इस बार महानगर अध्यक्ष के चयन में प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर के नेताओं और संघ के पदाधिकारियों की अहम भूमिका होने वाली है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि बरेली में ऐसा कौन सा नेता हो सकता है जो पार्टी के मानदंडों पर खरा उतर सके। वो किस जाति से होगा? ठाकुर होगा, ब्राह्मण होगा, कायस्थ होगा, पंजाबी होगा या फिर दलित समाज से होगा? यूं तो अध्यक्ष पद के कई दावेदार हैं लेकिन इन सबके बीच चर्चा में हैं उनमें एक ठाकुर, एक दलित, एक कायस्थ, एक पंजाबी और दो ब्राह्मण शामिल हैं।
सबसे पहले बात करते हैं कायस्थ चेहरे की तो कायस्थों में मौजूदा महानगर अध्यक्ष अधीर सक्सेना का नाम आता है। मौजूदा अध्यक्ष होने के नाते वो इस दौड़ में तो शामिल हैं लेकिन गुटबाजी को बढ़ावा देने के गंभीर आरोपों से घिरे अधीर सक्सेना पर एक स्थानीय नेता का पिछलग्गू होने का भी ठप्पा लगा हुआ है।

अधीर सक्सेना से उस स्थानीय नेता के विरोधी विधायक से लेकर दिग्गज नेता तक नाराज बताए जा रहे हैं। ऐसे में अधीर सक्सेना पर दोबारा भरोसा करने की गलती संगठन बिल्कुल भी नहीं करने वाला। वैसे भी कायस्थ विधायक अरुण सक्सेना को मंत्री पद से नवाजे जाने के बाद गैर कायस्थ जातियों में इस बात को लेकर भी रोष व्याप्त है कि मंत्री पद भी कायस्थ को और महानगर अध्यक्ष पद भी कायस्थ को देना अन्य जातियों के साथ अन्याय है। इसलिए अगर पार्टी को आगामी विधानसभा चुनाव में जातीय समीकरण साधना है तो अधीर सक्सेना की जगह किसी गैर कायस्थ को ही यह पद सौंपना होगा। इतना ही नहीं अधीर सक्सेना का एक माइनस प्वाइंट यह भी है कि विगत लोकसभा चुनाव में उनके नेतृत्व में भाजपा की जीत का मार्जिन वर्ष 2019 के लोकसभा और 2022 के विधानसभा चुनावों की तुलना में काफी कम रहा है।
अब बात करते हैं ब्राह्मणों की। ब्राह्मणों में दो चेहरे सिर्फ पार्टी ही नहीं बल्कि पूरे महानगर में चर्चा का विषय बने हुए हैं। इनमें पहला नाम है पूर्व महानगर अध्यक्ष पुष्पेंदु शर्मा का और दूसरा नाम है महानगर भाजपा के ही पदाधिकारी देवेंद्र जोशी का। पुष्पेंदु शर्मा निश्चित तौर पर इस पद के लिए डिजर्विंग कैंडिडेट हो सकते हैं। उनके कार्यकाल में महानगर में भाजपा का प्रदर्शन अच्छा रहा था। हालांकि, उनके साथ एक माइनस प्वाइंट यह है कि उनकी छवि एक स्थानीय विधायक के पिछलग्गू नेता की बनी हुई है।

हालांकि, पुष्पेंदु शर्मा उन नेताओं में से नहीं हैं जिनके पास अपना कोई विजन नहीं होता बल्कि उनके बारे में कहा जाता है कि वो जिस भी बड़े नेता के साथ रहे हैं उसे अपने अनुसार चलाते रहे हैं। मौजूदा समय में भी उनके बारे में यही चर्चा कि पुष्पेंदु शर्मा की सलाह पर ही विधायक जी ज्यादातर फैसले ले रहे हैं जिससे विधायक जी के चुनावों में जी-तोड़ मेहनत करने वाले कुछ कार्यकर्ताओं में नाराजगी पनप रही है। इतना जरूर तय है कि अगर पुष्पेंदु शर्मा को अध्यक्ष पद मिलता है तो वो पिछलग्गू तो बिल्कुल भी साबित नहीं होंगे। रही बात देवेंद्र जोशी की तो देवेंद्र जोशी शांत स्वभाव के नेता हैं जो सबका साथ सबका विकास में विश्वास रखते हैं। वो मौजूदा समय में जिला उपाध्यक्ष हैं। राजनीतिक जीवन में विवादों से उनका दूर-दूर तक कोई नाता नहीं रहा लेकिन उनके अपने ही रिश्तेदार उन पर कई गंभीर आरोप लगा चुके हैं।

हालांकि ये उनका पारिवारिक मामला है जिसका संगठन पर कोई विशेष असर नहीं पड़ने वाला। इन दोनों ब्राह्मणों के साथ भी एक माइनस प्वाइंट जुड़ा हुआ है। दरअसल, बरेली के मेयर डॉक्टर उमेश गौतम भी ब्राह्मण हैं। अगर ब्राह्मण को ही महानगर अध्यक्ष का पद दे दिया जाएगा तो अन्य जातियां नाराज हो जाएंगी। इसलिए अगर भाजपा को महानगर में जातीय समीकरण साधना है तो उसे महानगर अध्यक्ष पद से ब्राह्मणों को दूर ही रखना होगा।
अगला नंबर आता है उस जाति का जिस जाति से खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ आते हैं। जी हां, हम बात कर रहे हैं क्षत्रिय समाज की। योगी आदित्यनाथ पर क्षत्रियों के पक्ष में पक्षपात के आरोप तो लगाए जा रहे हैं लेकिन बरेली के परिप्रेक्ष्य में इसका उलट देखने को मिल रहा है। यहां ठाकुर उपेक्षित हैं। न उन्हें विधानसभा का टिकट गया, न मेयर का, न लोकसभा का और न ही एमएलसी का। बरेली में महानगर अध्यक्ष के लिए जिस क्षत्रिय का नाम सबसे ऊपर है वह हैं अजय प्रताप सिंह उर्फ अज्जू भैया। अज्जू भैया फिलहाल महानगर उपाध्यक्ष की भूमिका में हैं। विधायकों के परिवार की विरासत संभालने वाले अज्जू भैय्या ने पिछली बार भी महानगर अध्यक्ष पद के लिए आवेदन किया था लेकिन क्योंकि वो किसी नेता के पिछलग्गू कभी नहीं रहे इसलिए बरेली की सियासत में अपने परिजनों के समान कोई बड़ा मुकाम हासिल नहीं कर पाए।

अगर भाजपा को एक निष्पक्ष, निर्भीक और अनुभवी महानगर अध्यक्ष चाहिये तो अज्जू भैया एक बेहतर विकल्प हो सकते हैं। अज्जू भैया पूर्व विधायक सुमनलता सिंह के भाई हैं। सुमनलता सिंह की गिनती अपने दौर के तेज तर्रार विधायकों में होती थी। बताया जाता है कि उनका परिवार केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का करीबी रहा है। इसके बावजूद अज्जू भैया ने कभी इन संबंधों का इस्तेमाल निजी हित के लिए नहीं किया। अज्जू भैया को यह पद देने से जातीय समीकरण और आसान हो जाएंगे। महानगर में एक और जाति को साधा जा सकेगा।
अब बात उस समाज की जिससे वित्त मंत्री सुरेश खन्ना आते हैं। इस समाज का बरेली में भाजपा का सबसे बड़ा चेहरा यूं तो गुलशन आनंद हैं लेकिन उम्र का असर उनकी राह की बाधा बन सकता है। फिर इस रेस में पूर्व महानगर अध्यक्ष डॉ केएम अरोड़ा भी शामिल हैं। अरोड़ा के कार्यकाल में विपरीत परिस्थितियों में भी भाजपा ने बरेली कैंट और शहर विधानसभा सीटें अधीर सक्सेना के कार्यकाल की तुलना में कहीं अधिक वोटों से जीती थीं।

खास तौर पर कैंट विधानसभा सीट पर अधीर सक्सेना के कार्यकाल में लोकसभा चुनाव में उसके आधे वोटों का मार्जिन भी नहीं रहा जितने विधानसभा चुनाव में केएम अरोड़ा के कार्यकाल में रहा था। हालांकि, शराब माफिया से संबंध और जमीनों से जुड़े मामलों को लेकर वह भी विवादों में रहे थे।
अंत में बात उस समाज की जिस पर इस वक्त सभी राजनीतिक दलों का फोकस है। सपा, बसपा, कांग्रेस, भाजपा सारी पार्टियां उस वर्ग को अपने साथ जोड़ना चाहती हैं। जी हां, हम बात कर रहे हैं दलित समाज की। भाजपा ने दलित समाज के उमेश कठेरिया को महानगर अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी सौंपी थी लेकिन अब वो इस दौड़ में नहीं हैं। दलित समाज के जिस नेता की सबसे अधिक चर्चा महानगर अध्यक्ष पद के लिए हो रही है वह हैं मनोज थपलियाल। मनोज पहले भी इस दौड़ में शामिल थे लेकिन अधीर सक्सेना बाजी मार ले गए थे।






