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इबादतों के सफर पर बरस रही हैं रहमतें, थम नहीं रहा ‘मुबारकों’ का सिलसिला, यादगार रहा डॉ. अनीस बेग का पहला ‘उमरा’, वतन लौटे तो स्वागत में उमड़ पड़ा पूरा शहर, पढ़ें अनीस बेग की उमरा यात्रा का सफरनामा

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नीरज सिसौदिया, बरेली
यूं तो काबा शरीफ में इबादत करना हर मुसलमां का सपना होता है लेकिन अल्लाह के इस पाक दर पर पहुंचता वहीं है जिस पर खुदा की इनायत होती है। अल्लाह की इस पाक जमीं पर कदम उसी के पड़ते हैं जिसकी नीयत और सीरत भी पाक होती है। हाल ही में आला हजरत के पाक शहर बरेली शरीफ में डॉ. अनीस बेग और उनकी पत्नी डॉ. फहमी खान की उमरा यात्रा काफी चर्चा में है। दोनों की यह पहली उमरा यात्रा थी।

चर्चा इसलिए भी हो रही है कि बरेली शहर में पिछले कई वर्षों में गिने-चुने ही ऐसे मौके आए जब उमरा करके लौटने वाले शख्स को मुबारकबाद देने का सिलसिला चार दिन तक लगातार चलता आ रहा है।

चर्चा इसलिए भी है क्योंकि पिछले लगभग एक दशक के दौरान संभवत: यह पहला मौका है जब उमरा करके लौटने वाले किसी शख्स को मुबारकबाद देने मुस्लिमों से अधिक हिन्दू पहुंच रहे हैं और चर्चा इसलिए भी है क्योंकि मुबारकबाद देने वालों में हर खास-ओ-आम शामिल है।

इनमें समाजवादी पार्टी के बाबा साहेब अंबेडकर वाहिनी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मिठाई लाल भारती, जिला अध्यक्ष शिवचरण कश्यप, महानगर अध्यक्ष शमीम खां सुल्तानी, महिला जिला अध्यक्ष स्मिता यादव, महिला महानगर अध्यक्ष गजल अंसारी, पूर्व विधायक विजयपाल सिंह, इसवा के अध्यक्ष डॉ फाजिल, इलेक्टिव प्रेसीडेंट डॉ. अयूब, डॉ. जावेद, डॉ. आफताब अंसारी, डॉ. फिरासत  हुसैन अंसारी के अलावा बड़ी संख्या में स्थानीय युवा भी शामिल हैं।

ये तो उन लोगों के नाम हैं जिन्होंने डॉ. अनीस बेग के मैक्स लाइफ सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल एंड फहमी मैटरनिटी सेंटर में जाकर उन्हें मुबारकबाद दी।

इसके अलावा फोन पर बधाई देने वालों की कोई गिनती ही नहीं है। अनीस बेग के प्रति ये शहरवासियों का प्यार ही है जो मुबारकबाद के रूप में उनके पास पहुंच रहा है।


डॉ. अनीस बेग ने अपनी उमरा यात्रा विगत 28 नवंबर को बरेली से शुरू की थी। इसके बाद वो दिल्ली पहुंचे और वहां से मक्का मदीना गए। वहां उमरा की सभी रस्में अदा कीं और फिर चार दिन पहले ही वतन वापसी की। इसके बाद से मुबारकबाद का जो सिलसिला शुरू हुआ वह अब तक बदस्तूर जारी है।


डॉ. अनीस बेग की पहली उमरा यात्रा बेहद यादगार रही। डॉ. बेग बताते हैं, ‘मैं अपनी पत्नी डॉ. फहमी खान और रिश्तेदारों के साथ उमरा यात्रा पर गया था। काबा शरीफ पहुंचने पर यूं लगा कि जैसे हम खुदा से रूबरू हो गए हैं। खुदा और हमारे अलावा वहां कुछ नजर ही नहीं आ रहा था। लाखों लोगों की भीड़ के बावजूद किसी के होने का एहसास ही नहीं था। बस अल्लाह की इबादत और दुआओं का सिलसिला ही चलता जा रहा था। मन वहीं रम चुका था और अल्लाह के उस दर से निकलने का दिल ही नहीं करता था।’


डॉ. अनीस बेग मक्का मदीना आने वालों के लिए वहां की सरकार के इंतजामात से भी काफी प्रभावित हुए।

वह बताते हैं, ‘लाखों की भीड़ वहां हर पल रास्तों से गुजरती है लेकिन इंतजामात इतने व्यवस्थित थे कि हर कोई मुरीद हो जाए। मशीनों के माध्यम से मिनटों में सफाई हो जाती थी और मक्का मदीना की राह पर धूल का एक कण भी परेशान नहीं करता था।’


अल्लाह के दरबार में अमीर-गरीब का कोई भेद नहीं होता। अनीस बेग ने अपनी उमरा यात्रा में इस बात का भी अहसास किया। दुनियाभर के मुसलमानों के इस सबसे बड़े तीर्थ में हर कोई एक समान था। डॉ. अनीस बेग बताते हैं, ‘ऊपर वाला कभी अमीर-गरीब में भेद नहीं करता। मक्का-मदीना में इसका अहसास आप ही किया जा सकता है। वहां अमीर हो या गरीब सब एक साथ इबादत करते हैं। उस दर पर कभी कोई भूखा नहीं सोता। राह में सबील (लंगर) इतने होते हैं कि हर गरीब और बेबस को भी दो वक्त की रोटी हर रोज नसीब होती है। यही अल्लाह का करिश्मा है कि उसके दर पर आने वाला न खाली हाथ जाता है और न ही खाली पेट रहता है। शायद जन्नत इसी को कहते हैं।’


अल्लाह के इस दर पर अपराध का तो नाम-ओ-निशान तक मिट चुका है। यहां बाहर निकलने से पहले महिलाओं को दिन या रात नहीं देखना पड़ता है। डॉ. अनीस बेग बताते हैं, ‘वहां महिलाओं को किसी प्रकार का कोई डर नहीं होता। दिन हो या रात महिलाएं कभी भी और कहीं भी बेखौफ होकर आ-जा सकती हैं। डॉ. फहमी खुद रात को दो बजे नमाज अदा करने जाती थीं। दुआ करता हूं कि दुनिया में हर जगह महिलाओं के लिए इतनी ही महफूज हो जाए और बेटियां भी खुलकर अपनी जिंदगी जी सकें।’


डॉ. अनीस बेग ने अपनी पहली उमरा यात्रा को यादगार बताते हुए कहा कि अल्लाह के दर पर मैंने अपने मुल्क के अमन -चैन और भाईचारे की दुआ मांगी है। वहां से प्रसाद के तौर पर और की तरह मैं भी आबे जम जम और खजूर लेकर आया हूं। ये खजूर उस धरती के हैं जहां हमारे पैगम्बर मोहम्मद साहब ने खुद खजूर का पेड़ लगाया था। मैं अल्लाह से ये दुआ करता हूं कि मुझे बार-बार ये मौका दे कि जब तक ये सांसें चलें मैं उसकी इबादत के लिए उमरा करता रहूं।

मुझे वतन वापसी पर अपनों का और शहरवासियों का जो प्यार मिल रहा है उसके लिए मैं तहे दिल से उनका ऐहतराम करता हूं। ये मेरे उमरा का फल ही तो है जो मुझ पर वतन लौटते ही रहमतों की बारिश हो रही है। ये सिलसिला यूं ही चलता रहे, बस यही दुआ है।

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