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अलग नहीं हैं खत्री और पंजाबी, बस सियासी फायदे के लिए बांट दिए गए, पंजाबी को अलग और खत्रियों को अलग बताते रहे बरेली के नेता, इसलिए नए दौर में विधानसभा और लोकसभा से महरूम रहा ये समाज, पढ़ें कैसे बदलती रही सियासत और सियासतदान?

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नीरज सिसौदिया, बरेली
अंग्रेजी हुकूमत की गुलामी से जब भारत को आजादी मिली तो पाकिस्तान स्थित पंजाब से बड़ी तादाद में शरणार्थी भारत आए थे। इनमें से सैकड़ों परिवार बरेली आकर बस गए। इनमें कुछ सिख परिवार थे तो कुछ हिन्दू परिवार। अपने जज्बे और कड़ी मेहनत के दम पर इन लोगों ने अपनी एक अलग पहचान बनाई और एक अलग मुकाम भी हासिल किया। इनमें से ज्यादातर लोगों ने कारोबार को चुना और आज इनमें से कई कारोबारियों की गिनती आज बरेली के सबसे बड़े कारोबारियों में भी होती है। लेकिन कुछ सियासतदानों ने अपने निजी हित साधने के लिए इन पंजाबी समाज के लोगों को दो हिस्सों में बांट दिया। जो पगड़ीधारी थे उन्हें पंजाबी कहा जाने लगा और जो बाकी को खत्री कहा जाने लगा। चूंकि जातिगत गणना अब तक नहीं हो सकी है, इसलिए उत्तर प्रदेश में खत्री और पंजाबी समुदाय की सटीक आबादी के आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं और न ही बरेली में ऐसा कोई आंकड़ा आधिकारिक तौर पर तैयार किया गया है लेकिन यह समुदाय निर्णायक स्थिति में जरूर मौजूद हैं।
अब सवाल यह उठता है कि खत्री कौन हैं। ऐतिहासिक साक्ष्य बताते हैं कि खत्री मुख्य रूप से पंजाब क्षेत्र से आते हैं, लेकिन व्यापार या नौकरी के सिलसिले में उत्तर प्रदेश सहित भारत के विभिन्न हिस्सों में बस गए हैं। पंजाबी समुदाय, जिसमें खत्री भी शामिल हैं, उत्तर प्रदेश में एक महत्वपूर्ण अल्पसंख्यक समुदाय है।
यह मुद्दा अब इसलिए अहम हो जाता है क्योंकि केंद्र सरकार ने अब जातिगत गणना की भी तैयारी शुरू कर दी है। इसमें हर परिवार को अपनी जाति बतानी होगी। पंजाबी कोई जाति नहीं होती है, वह एक क्षेत्र विशेष से जुड़ी पहचान है। जिस तरह बंगाल का रहने वाला बंगाली, बिहार का रहने वाला बिहारी और गुजरात का रहने वाला गुजराती होता है, उसी तरह पंजाब के निवासी पूरी दुनिया में पंजाबी के तौर पर जाने जाते हैं।
बरेली शहर विधानसभा में पंजाबी समुदाय का अनुमानित आंकड़ा कायस्थ समाज से कुछ ही कम बताया जाता है। इसके बावजूद भारतीय जनता पार्टी ने पंजाबी समुदाय से किसी भी नेता को न तो विधानसभा का टिकट दिया और न ही लोकसभा का। हालांकि, कांग्रेस ने जरूर स्वर्गीय राम सिंह खन्ना को मंत्री तक बनाया था। लेकिन भाजपा ने कभी इस समाज को बरेली में प्रतिनिधित्व नहीं दिया।
नगर निगम चुनाव में जरूर इस समाज के चेहरे मैदान में उतारे गए। संगठन में भी इन्हें महत्वपूर्ण पद पर सुशोभित किया गया लेकिन बात जब विधानसभा या लोकसभा के टिकट की आई तो एक वर्ग को पंजाबी और दूसरे को खत्री बताकर इनके मतदाताओं का आंकड़ा कमतर दर्शाकर इन्हें किनारे कर दिया गया जबकि हकीकत यह है कि यह समुदाय निर्णायक भूमिका में है।
अब बात करें इस समुदाय के नेताओं की तो भाजपा के पास यहां पुराने और युवा दोनों तरह के चेहरे हैं। इनमें पूर्व मेयर प्रत्याशी गुलशन आनंद, पूर्व महानगर अध्यक्ष डॉक्टर केएम अरोड़ा और पूर्व उपसभापति अतुल कपूर के चेहरे प्रमुख रूप से शामिल हैं।
खत्री समाज के सबसे वरिष्ठ नेता गुलशन आनंद कहते हैं, ‘वर्ष 1947 में हिन्दुस्तान के बंटवारे के बाद हम लोग पंजाब छोड़कर बरेली में आ गए थे। वहीं, कुछ खत्री समाज के लोग बरेली में 250 से 300 साल पहले आए थे। हम सभी खत्री ही हैं। इस आधार पर हम इतना जरूर कह सकते हैं खत्री दो प्रकार के हैं, एक पंजाब से बंटवारे के समय आने वाले पंजाबी खत्री और दूसरे तीन सौ साल से यहीं बसे हुए नॉन पंजाबी खत्री। लेकिन जाति की बात होगी तो हम सब एक ही जाति खत्री के तहत रखे जाएंगे। इनमें मल्होत्रा, अरोड़ा, आनंद, कपूर आदि शामिल हैं। फिलहाल हमारे समुदाय की आबादी बरेली में कितनी है, इसका कोई आंकड़ा हमारे पास नहीं है। सही आंकड़ा जातिगत जनगणना के बाद ही सामने आ सकेगा।’
खत्री समाज को विधानसभा का टिकट देने की मांग के संबंध में पूछे जाने पर गुलशन आनंद कहते हैं कि यह पार्टी को तय करना है कि किसे टिकट देना है और किसे नहीं। रही बात मांग करने की तो हमारे समाज के कई नेता टिकट मांगते रहे हैं। भूतपूर्व मंत्री स्व. राम सिंह खन्ना भी हमारे खत्री समाज से ही थे। तो ऐसा नहीं है कि खत्री समाज का व्यक्ति चुनाव न जीत पाए।
अतुल कपूर ने पिछले विधानसभा चुनाव में पुरजोर तरीके से विधानसभा के टिकट के लिए दावेदारी की थी लेकिन उन्हें टिकट नहीं दिया गया। अतुल कपूर के अलावा अनुपम कपूर भी दावेदारों में शामिल थे लेकिन उन्हें भी टिकट नहीं दिया गया। अब एक बार फिर अतुल कपूर दावेदारी की तैयारी कर रहे हैं। इस बार मौजूदा विधायक अरुण कुमार 75 वर्ष के पूरे हो जाएंगे। ऐसे में तय माना जा रहा है कि शहर विधानसभा सीट से भारतीय जनता पार्टी उम्मीदवार बदलेगी और अरुण कुमार की जगह किसी नए चेहरे को मौका देगी। लेकिन हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के एक बयान के बाद उम्र सीमा के आधार पर मौजूदा विधायकों के रिटायरमेंट पर अनिश्चितता का माहौल बन गया है। अमित शाह ने हाल ही में कहा था कि भाजपा के संविधान में ऐसा कहीं नहीं लिखा है कि 75 साल के नेता को पार्टी से सेवानिवृत कर दिया जाए। बहरहाल, जातिगत जनगणना इस भ्रम को पूरी तरह तोड़ देगी कि पंजाबी और खत्री समाज अलग-अलग हैं। इसके बाद खत्री समाज को भी बरेली से विधानसभा या लोकसभा जाने का अवसर मिल सकता है।

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