नीरज सिसौदिया, बरेली
समाजवादी पार्टी ने विधानसभा चुनाव की तैयारियां जितने जोर-शोर से शुरू कर दी हैं उतने ही जोर-शोर से बरेली जिले में पार्टी की अंदरूनी कलह भी सामने आने लगी है। जिले की कुल नौ में से चार सीटें ऐसी हैं जहां पार्टी की अंदरूनी कलह इतने चरम पर पहुंच चुकी है यहां से सपा की जीत लगभग नामुमकिन सी प्रतीत होती है। इनमें भोजीपुरा, बरेली कैंट, बिथरी चैनपुर और फरीदपुर विधानसभा सीटें शामिल हैं।
इनके अलावा मीरगंज, शहर और आंवला विधानसभा सीटों में टिकट के कुछ दावेदार तो हैं लेकिन वो फिलहाल उतने दमदार नजर नहीं आते कि उनके चेहरे पर पार्टी जीत हासिल कर सके। सिर्फ नवाबगंज और बहेड़ी विधानसभा सीटें ही ऐसी हैं जहां समाजवादी पार्टी में फिलहाल कोई अंदरूनी कलह खुलकर सामने नहीं आई है। इसकी एक वजह यहां के दो कद्दावर नेता भी हैं। नवाबगंज में पूर्व मंत्री भगवत सरन गंगवार का दबदबा पार्टी में कायम है तो वहीं, बहेड़ी विधानसभा सीट पर पूर्व मंत्री अता उर रहमान ने जिस तरह से पूर्व चेयरमैन पति और पूर्व सपा नेता नसीम अहमद की समाजवादी राजनीति पर ब्रेक लगाकर उन्हें पार्टी से चलता कर दिया है उसके बाद यहां अता उर रहमान का एकछत्र राज हो गया है। अब कम से कम उन्हें आगामी विधानसभा चुनाव से पहले अपनों से जंग बिल्कुल नहीं लड़नी पड़ेगी। उनका मुकाबला दूसरे दलों से होगा।


गुटबाजी की सबसे गंभीर स्थिति भोजीपुरा और बरेली कैंट विधानसभा सीट पर है। भोजीपुरा में दो समाजवादी दिग्गज आमने-सामने हैं। इनमें मौजूदा विधायक शहजिल इस्लाम और मीरगंज के पूर्व विधायक सुल्तान बेग सपा के टिकट पर चुनाव लड़ना चाहते हैं। कहा यह भी जा रहा है कि सुल्तान बेग किसी भी हाल में शहजिल इस्लाम को विधायक बनते नहीं देखना चाहते, चाहे इसके लिए उन्हें निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर ही चुनाव में क्यों न उतरना पड़े। हालांकि, सुल्तान बेग ने निर्दलीय चुनाव लड़ने की संभावनाओं की पुष्टि भी नहीं की है।


यहां समाजवादी पार्टी का संगठन भी दो गुटों में बंट चुका है। कुछ कार्यकर्ता सुल्तान बेग के साथ हैं तो कुछ शहजिल इस्लाम के साथ। ऐसे में शहजिल इस्लाम को अगर टिकट मिलता है तो उनका जीत पाना लगभग नामुमकिन सा लगता है। क्योंकि वर्ष 2017 में जब सुल्तान बेग के छोटे भाई सुलेमान बेग इस सीट से चुनाव लड़ेे थे तो शहजिल इस्लाम को मुंह की खानी पड़ी थी। इस बार शहजिल के लिए हालात और भी बदतर हो सकते हैं।
इसी तरह कैंट विधानसभा सीट पर विधानसभा क्षेत्र अध्यक्ष रोहित राजपूत की पिटाई ने पार्टी की गुटबाजी को सड़कों पर लाकर रख दिया है। यहां टिकट के दावेदारों के बीच वर्चस्व की जंग इतनी हावी हो चुकी है कि एक दावेदार का बढ़ता कद दूसरे को रास नहीं आ रहा। स्वस्थ प्रतिस्पर्धा की जगह यहां गुंडागर्दी और धमकाने की राजनीति होने लगी है।

यहां अनीस बेग जिस तरह से मोहब्बत का पैगाम लेकर जनता के बीच जा रहे हैं वह पार्टी को मजबूती देने का काम कर रहे हैं लेकिन समर्थ मिश्रा और विधानसभा क्षेत्र अध्यक्ष रोहित राजपूत के बीच जिस तरह की जंग शुरू हो चुकी है उसने पार्टी के विरोध में माहौल बनाना शुरू कर दिया है। इस गुटबाजी से राजेश अग्रवाल की तैयारियों पर भी ग्रहण लग सकता है। ये गुटबाजी सपा को कमजोर बना रही है। इन परिस्थितियों में सुधार नहीं हुआ तो पार्टी की हार यहां से हर बार की तरह तय है।
अगली विवादित सीट फरीदपुर सुरक्षित सीट है। यहां समाजवादियों का एकमात्र मकसद पूर्व विधायक विजयपाल सिंह को हराना है, फिर चाहे इसके लिए विजयपाल के विरोधी नेताओं को निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर ही क्यों न लड़ना पड़े या किसी और पार्टी से लड़ना पड़े। पिछले चुनाव में भी ऐसा ही हुआ था।


विजयपाल सिंह लगभग 3200 वोटों से चुनाव हार गए थे। यहां चंद्रसेन सागर और उनके बड़े भाई स्वर्गीय सियाराम सागर के परिवार के एकजुट होने के बाद सपा के लिए उम्मीद की किरण जरूर नजर आती है लेकिन पूरा सागर परिवार, पूर्व बसपा प्रत्याशी शालिनी सिंह सहित अन्य नेता बिल्कुल भी नहीं चाहते कि विजयपाल सिंह यहां से विधायक बनें। पिछले चुनावों में भी इन्हीं चेहरों के बीच हुए वोटों के बंटवारे के कारण विजयपाल सिंह को शिकस्त झेलनी पड़ी थी। अगर पार्टी यहां से एक बार फिर से विजयपाल सिंह को मैदान में उतारती है तो निश्चित तौर पर सपा को इस बार भी यह सीट गंवानी पड़ सकती है। अन्य कोई भी उम्मीदवार मैदान में उतरे उसका विपरीत असर सपा पर नहीं पड़ेगा। यहां पूर्व ब्लॉक प्रमुख चंद्रसेन सागर काफी मजबूत स्थिति में नजर आते हैं। वह जीतने का दम भी रखते हैं और विजयपाल सिंह का खेल बिगाड़ने की चाहत भी।
अगली सीट है बिथरी चैनपुर। पिछले चुनाव में यहां से सपा ने अगम मौर्य को मैदान में उतारा था। यहां से पूर्व जिला अध्यक्ष वीरपाल सिंह यादव टिकट मांग रहे थे। वह चुनाव से ठीक पहले शिवपाल यादव की प्रगतिशील समाजवादी पार्टी छोड़कर सपा में आए थे और टिकट की दावेदारी भी जता रहे थे। लेकिन पार्टी ने उन्हें टिकट नहीं दिया। इससे वीरपाल सिंह के समर्थक नाराज हो गए और उनके समर्थकों ने भाजपा उम्मीदवार डॉक्टर राघवेंद्र शर्मा का सहयोग किया था। यही वजह थी कि शुरुआती लगभग 20 राउंड में बढ़त बनाने वाले सपा उम्मीदवार अगम मौर्य गंगा पार इलाके के वोट खुलते ही औंधे मुंह गिर पड़े। फिलहाल वीरपाल सिंह यादव सपा के राष्ट्रीय सचिव हैं। इस बार उनके सुपुत्र डॉक्टर देवेंद्र यादव टिकट की दावेदारी कर रहे हैं। वीरपाल सिंह यादव का परिवार यहां काफी मजबूत स्थिति में है।



वीरपाल सिंह के भतीजे आदेश यादव उर्फ गुड्डू भी इसी सीट से टिकट के संभावित दावेदार बताए जाते हैं। आदेश यादव तीन बार ब्लॉक प्रमुख रह चुके हैं जिसमें दो बार वह वीरपाल सिंह यादव की कृपा से ब्लॉक प्रमुख बने थे। फिलहाल चाचा-भतीजे के संबंधों में खटास आ चुकी है। दोनों के गुट अलग-अलग हो चुके हैं। दूसरी तरफ, सपा जिला अध्यक्ष शिवचरन कश्यप की नजर भी इसी सीट पर है। इनके अलावा सूरज यादव भी टिकट की दावेदारी पुरजोर तरीके से कर रहे हैं। वह जगह-जगह घूमकर अभी से अपने पक्ष में माहौल बनाने में जुट गए हैं। ऐसे में ये गुटबाजी पार्टी को निश्चित तौर पर ले डूबेगी।
इसके अतिरिक्त सुल्तान बेग के भोजीपुरा का रुख करने के बाद मीरगंज सीट लगभग वीरान सी हो गई है। हालांकि, हाजी गुड्डू, मनोहर पटेल, साधना सिंह लोधी राजपूत और सुरेश गंगवार सहित कई दावेदार यहां से सपा के टिकट पर चुनाव लड़ना चाहते हैं लेकिन इनकी आपसी गुटबाजी उस स्तर की नहीं है कि वे एक-दूसरे को बहुत बड़ा नुकसान पहुंचा सकें।


हालांकि, कैंट में जिस तरह से लोधी राजपूत नेता से मारपीट के आरोप पार्टी नेता पर लगे हैं उसके बाद से यहां लोधी समाज में सपा के खिलाफ काफी नाराजगी है। ऐसे में अगर पार्टी यहां से किसी लोधी राजपूत को मैदान में उतारती है तो इस नाराजगी को काफी हद तक दूर किया जा सकता है लेकिन जीत की गारंटी नहीं दी जा सकती।
आंवला विधानसभा सीट से पूर्व विधायक महिपाल सिंह यादव, पूर्व जिला अध्यक्ष अगम मौर्य, पूर्व ब्लॉक प्रमुख जीराज यादव, भारती चौहान सहित कई दावेदार हैं। जीराज यादव पिछली बार निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर मैदान में उतरे थे और इतने वोट काट ले गए कि सपा प्रत्याशी आरके शर्मा चुनाव हार गए थे।



अंत में बात शहर विधानसभा सीट की। यह सीट फिलहाल बरेली जिले में समाजवादी पार्टी की सबसे कमजोर सीट है। अगर हसीव खान को छोड़ दें तो यहां कोई भी दावेदार इतना मजबूत नजर नहीं आता जो पार्टी को मजबूती दिला सके या जीत की उम्मीद जगा सके। यहां दावेदारों में मोहम्मद कलीमुद्दीन और गौरव सक्सेना भी हैं। हालांकि, हिन्दुओं में सबसे मजबूत चेहरा पूर्व मेयर सुप्रिया ऐरन का है।



हालांकि यहां के दावेदारों के बीच गुटबाजी का स्तर इतना गंभीर नहीं है कि पार्टी को उससे कोई नुकसान हो सके। उसके विपरीत यहां भाजपा बहुत बड़ी चुनौती बनी हुई है। फिलहाल इस सीट से भाजपा की जीत चुनाव से पहले ही तय मानी जा रही है।





