नीरज सिसौदिया, बरेली
सतीश चंद्र सक्सेना कातिब उर्फ ‘मम्मा’ बरेली की राजनीति में एक ऐसा नाम है, जिसे हर गली-कूचे का बच्चा भी जानता है। बरेली शहर विधानसभा सीट के दिग्गज कायस्थ नेताओं में शुमार सतीश चंद्र सक्सेना कातिब उर्फ मम्मा वर्तमान में बरेली नगर निगम कार्यकारिणी के सदस्य भी हैं। लगभग साढ़े तीन दशक से अधिक का राजनीतिक सफर तय कर चुके मम्मा ने कभी भी स्थानीय निकाय का चुनाव नहीं हारा। यही वजह है कि उनकी पहचान आज केवल एक पार्षद या समाजसेवी तक सीमित नहीं है, बल्कि एक ऐसे जननेता की बन चुकी है, जिन पर बरेली की जनता आंख बंद करके भरोसा करती है। उन्होंने पिछले विधानसभा चुनाव में शहर विधानसभा सीट से भाजपा के टिकट की दावेदारी पूरी मजबूती के साथ की थी। इसके बाद एमएलसी चुनाव में भी उन्हें प्रबल दावेदार माना जा रहा था लेकिन उन्हें टिकट नहीं मिल सका। अब एक बार फिर वह विधानसभा चुनाव की दावेदारी कर रहे हैं और खुद मानते हैं कि अगर पार्टी मौका देती है तो वह बरेली शहर की जनता की आवाज विधानसभा तक पहुंचाने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे।
दरअसल, बरेली शहर विधानसभा सीट से इस बार मौजूदा भाजपा विधायक अरुण कुमार सक्सेना का टिकट उम्र संबंधी कारणों के चलते कटना तय माना जा रहा है। ऐसे में इस विधानसभा सीट के लगभग 70 हजार कायस्थ मतदाताओं को साधने के लिए पार्टी को एक जमीनी स्तर के कायस्थ नेता की तलाश है। पार्टी को जिस तरह का नेता चाहिए मम्मा उस कसौटी पर पूरी तरह खरे उतरते हैं।
सतीश चंद्र सक्सेना ‘मम्मा’ का सफर इस बात का प्रमाण है कि राजनीति में केवल विरासत से नहीं, बल्कि कड़ी मेहनत और जनसेवा से भी पहचान बनाई जा सकती है। बरेली की सियासत में मम्मा का नाम भरोसे और विकास का पर्याय बन चुका है। मम्मा जमीन से जुड़े नेता हैं और वह अब तक विधायक भी बन चुके होते अगर पार्टी ने उन्हें मौका दिया होता। व्यापारी संगठनों से लेकर समाजसेवी संगठनों तक शायद ही ऐसा कोई प्रतिष्ठित संगठन होगा जिसके पदाधिकारी के रूप में मम्मा ने सेवाएं न दी हों। वह बरेली तक ही सीमित नहीं हैं। उनकी लोकप्रियता रामपुर तक है।

मम्मा का परिवार राजनीति से नहीं जुड़ा था। उनके पिता पेशे से कातिब थे और समाज में एक सम्मानित व्यक्ति माने जाते थे। मम्मा खुद भी इसी काम से जुड़े लेकिन दिल में समाज सेवा का जज्बा हमेशा रहा। अब जरा एक नजर डालते हैं मम्मा के सियासी सफर पर। मम्मा का यह सफर वर्ष 1989 से शुरू होता है जब मम्मा पार्षद भी नहीं बने थे। उसी साल चुनाव हुए और जनता ने मम्मा को अपना नेता चुना और वह पहली बार में ही सभासद का इलेक्शन जीत गए। वर्ष 1990 से वह लगातार (वर्ष 2012-17 को छोड़कर) पार्षद का चुनाव जीतते आ रहे हैं। वर्ष 1990 में वह बरेली विकास प्राधिकरण के सदस्य भी चुने गए। वह दो बार बीडीए सदस्य चुने गए। इसी दौरान एक बार उनकी पत्नी भी बीडीए की सदस्य और पार्षद रही हैं। मम्मा भाजपा किसान मोर्चा के महानगर अध्यक्ष भी रहे। वर्ष 1994 में वह भाजपा साहूकारा मंडल के अध्यक्ष भी निर्वाचित हुए। इतना ही नहीं प्रदेश स्तर पर भी मम्मा अपनी काबिलियत का डंका बजा चुके हैं। वह दस्तावेज लेखक कल्याणकारी समिति के प्रदेश महामंत्री भी रहे। वहीं, दस्तावेज लेखक कल्याणकारी समिति, सदर के दस बार लगातार निर्विरोध अध्यक्ष निर्वाचित हुए। अखिल भारतीय कायस्थ महासभा के युवा संभाग के प्रदेश महामंत्री और प्रदेश अध्यक्ष रहने के कारण प्रदेश भर में सतीश चंद्र सक्सेना कातिब उर्फ मम्मा अपनी एक अलग पहचान बना चुके हैं। नगर निगम के पूर्व उपसभापति और महानगर भाजपा कार्यकारिणी के सदस्य की भूमिका निभा चुके मम्मा व्यापारिक राजनीति में भी गहरी पैठ रखते हैं। वह उद्योग बंधु के पूर्व सदस्य, रोहिलखंड व्यापार मंच के जिला अध्यक्ष रहने के साथ है उत्तर प्रदेश उद्योग व्यापार मंडल के भी जिला अध्यक्ष रह चुके हैं। जिला योजना समिति में सर्वाधिक 458 मतों से जीत हासिल करने वाले मम्मा अखिल भारतीय कायस्थ महासभा के जिला अध्यक्ष भी रह चुके हैं।

हिन्दुत्व की कसौटी पर भी खरे हैं मम्मा
भाजपा के हिंदुत्व के एजेंडे को आगे बढ़ाने में भी मम्मा अहम भूमिका निभा रहे हैं। यही वजह है कि वह बरेली शहर के जाने-माने नीलकंठ मंदिर, राजेंद्र नगर, मां दुर्गा मंदिर, गुलमोहर पार्क कॉलोनी, दुर्गा माता मंदिर, राजेंद्र नगर आदि के ट्रस्टी/संरक्षक आदि के रूप में सेवाएं दे रहे हैं. बात सिर्फ धार्मिक या राजनीतिक पहलुओं की नहीं है। बच्चों की शिक्षा के क्षेत्र में भी सतीश चंद्र सक्सेना कातिब उर्फ मम्मा का उल्लेखनीय योगदान है। वह भारत इंटर कॉलेज के प्रबंध समिति सदस्य भी हैं. वह निर्धन और जरूरतमंद विद्यार्थियों की स्कूल की फीस से लेकर जरूरत का सामान भी मुहैया कराते हैं।
इसके अलावा अनगिनत गरीब कन्याओं का विवाह संस्कार मम्मा के माध्यम से संपन्न हुआ। पिछले 35 वर्षों से मम्मा इस कार्य में अहम भूमिका निभाते आ रहे हैं।
दिनेश जौहरी की प्रेरणा से उतरे थे चुनावी राजनीति में
1989 में जब लंबे अंतराल के बाद नगर पालिका के चुनाव होने वाले थे, तो तत्कालीन विधायक दिनेश जौहरी ने उन्हें चुनाव लड़ने के लिए प्रेरित किया। शुरू में मम्मा ने इनकार किया, लेकिन बार-बार आग्रह के बाद उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ने का फैसला किया क्योंकि पार्टी ने टिकट नहीं दिया था। परिणाम आया तो सबको चौंका दिया- 38 हजार मतदाताओं वाले वार्ड से वह 1457 वोटों से जीतकर पहली बार सभासद बने। यहीं से उनके राजनीतिक जीवन की शुरुआत हुई।
लगातार जीत का सफर
वर्ष 1989 के बाद से आज तक मम्मा ने कभी भी हार का सामना नहीं किया। नगर निगम बनने के बाद जब वार्ड महिला आरक्षित हुआ तो उन्होंने अपनी पत्नी को चुनाव मैदान में उतारा।
पत्नी माया सक्सेना 5228 रिकार्ड मतों से विजय हुई। माया सक्सेना को 5475 मत मिले तथा उनके प्रतिनिधि दूसरे नंबर पर रही उर्मिला असर को 247 वोट मिले। यह रिकॉर्ड आज भी कायम है। इसके बाद चाहे खुद चुनाव लड़ना हो या पत्नी को उतारना, मम्मा परिवार ने हर बार जीत का परचम लहराया।
विकास की सोच
मम्मा कहते हैं कि किसी भी इलाके के विकास के लिए सबसे जरूरी है जनप्रतिनिधि की इच्छाशक्ति। वह अपने वार्ड का उदाहरण देते हुए बताते हैं कि एक वक्त ऐसा भी था जब बरसात में लोगों के घरों का सामान पानी में तैरता था। उन्होंने लगातार प्रयास कर नाले बनवाए, सीवर लाइन डलवाई और जलभराव की समस्या खत्म की। इसके लिए वह आजम खान जैसे बड़े नेताओं के पास भी महीनों चक्कर काटते रहे और आखिरकार अपने वार्ड के लिए करोड़ों रुपए की परियोजनाएं मंजूर कराईं।
बरेली नगर निगम की सबसे बड़ी चुनौती हमेशा से कूड़ा निस्तारण रही है। इस पर मम्मा का कहना है कि समाधान मौजूद है। महापौर उमेश गौतम ने खुद सौ बीघा से अधिक जमीन निगम को दान में दी थी। इसके अलावा सतरखपुर में जमीन खरीदी गई है। जल्द ही कूड़े का स्थायी समाधान निकाल लिया जाएगा। उनके अनुसार, इस दिशा में काम शुरू हो चुका है।

लॉकडाउन में मदद
कोरोना लॉकडाउन के दौरान जब गरीब मजदूरों और जरूरतमंदों को खाने की परेशानी हुई, तब मम्मा ने स्वयंसेवकों की मदद से हजारों परिवारों तक भोजन पहुंचाया। उन्होंने साफ कहा कि यह काम अकेले संभव नहीं था। उनके साथी व्यापारी नेता और भाजपा कार्यकर्ताओं ने मिलकर यह जिम्मेदारी निभाई।





