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आला हजरत के शहर में करवट ले रही मुस्लिम वोटों की राजनीति, इन चेहरों के इर्द-गिर्द घूम रही है बरेली महानगर की सियासत, जानिये कैसे महानगर में बढ़ रहा है मुस्लिम नेतृत्व का असर?

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नीरज सिसौदिया, बरेली
बरेली महानगर की राजनीति में मुस्लिम नेताओं की मौजूदगी हमेशा अहम रही है। यहां के लगभग सवा तीन लाख मुस्लिम मतदाता हर विधानसभा चुनाव में निर्णायक भूमिका में रहते हैं। यहां कैंट विधानसभा सीट पर लगभग 1 लाख 45 हजार और शहर विधानसभा सीट पर लगभग 1 लाख 75 हजार मुस्लिम मतदाता हैं। एक दौर था जब महानगर में इस्लाम साबिर और तौकीर रजा जैसे चुनिंदा मुस्लिम नेता ही प्रभावी नजर आते थे लेकिन आज के समय में इन नेताओं का राजनीतिक प्रभाव यहां लगभग खत्म हो चुका है। अब यहां नवाब मुजाहिद हसन खां, शमीम खां सुल्तानी, इंजीनियर अनीस अहमद खां, डॉ. अनीस बेग और हसीव खान जैसे नेता अपने-अपने स्तर पर न सिर्फ मुस्लिम समाज, बल्कि पूरे शहर की राजनीति को प्रभावित कर रहे हैं। आने वाले विधानसभा चुनावों में इन नेताओं की रणनीति और सक्रियता से तय होगा कि बरेली की सियासत किस दिशा में जाएगी। आज़ादी के बाद से लेकर अब तक यहां के मुस्लिम नेताओं ने न केवल अपनी पार्टी बल्कि पूरे शहर की सियासत को प्रभावित किया है। मौजूदा दौर में बरेली महानगर में कई ऐसे मुस्लिम चेहरे हैं जो अपने-अपने स्तर पर राजनीति की धारा को प्रभावित कर रहे हैं। इनमें कुछ चेहरे मूलरूप से बरेली के ही रहने वाले हैं लेकिन कुछ चेहरे ऐसे भी हैं जिनके बुजुर्ग दूसरे शहरों से यहां आए थे। आइए जानते हैं ऐसे ही प्रमुख नेताओं के बारे में-

1. नवाब मुजाहिद हसन खान

नवाब मुजाहिद हसन खान, बरेली के वरिष्ठ कांग्रेस नेता, एक पुराने और मज़बूत नवाब परिवार से आते हैं। उनके पूर्वजों ने स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लिया और अंग्रेजों की जेल में शहादत दी। उनके पूर्वज शफी अली खां को अंग्रेजों ने इलाहाबाद की नैनी जेल में फांसी दी थी। उनकी संपत्ति छीनकर देश के गद्दारों को बांट दी गई थी। उनकी सियासत कांग्रेस के राष्ट्रीय नेतृत्व से गहरे संबंधों पर आधारित रही है। दिग्विजय सिंह, शीला दीक्षित, राज बब्बर जैसे नेताओं से उनके ताल्लुकात बड़े ही दोस्ताना रहे हैं। वर्ष 2017 में वे सपा-कांग्रेस गठबंधन के उम्मीदवार के तौर पर 125 बरेली कैंट विधानसभा सीट से चुनाव लड़े थे। प्रदर्शन शानदार रहा, लेकिन जीत नहीं मिल सकी। कांग्रेस का आरोप है कि काउंटिंग रोककर गड़बड़ी की गई और भाजपा प्रत्याशी राजेश अग्रवाल को विजेता घोषित किया गया।

नवाब मुजाहिद हसन खां।

बावजूद इसके, मुजाहिद हसन खान की पकड़ और उनकी पहचान मुस्लिम समाज में मज़बूत बनी हुई है। वह मुस्लिम समाज के साथ ही हिन्दुओं के बीच भी बेहद लोकप्रिय है। आगामी विधानसभा चुनाव में वह एक बार फिर कैंट विधानसभा सीट से मैदान में उतरने की तैयारी कर रहे हैं। उन्हें यकीन है कि अगर सपा-कांग्रेस फिर से गठबंधन कर यूपी विधानसभा चुनाव लड़ते हैं और बरेली कैंट सीट से पार्टी उन्हें मैदान में उतारती है तो इस बार भाजपा को यहां से हार का सामना करना पड़ेगा।

2. शमीम खान सुल्तानी

समाजवादी पार्टी के महानगर अध्यक्ष शमीम खान सुल्तानी का नाम बरेली की राजनीति में एक मजबूत नेता के रूप में लिया जाता है। मूल रूप से सुल्तानपुर के रहने वाले सुल्तानी का परिवार पहले राजनीति में नहीं रहा, लेकिन उन्होंने अपनी मेहनत और संघर्ष से पहचान बनाई। सुल्तानी के पूर्वजों की भी स्वतंत्रता संग्राम में अहम भूमिका रही है। कहा जाता है कि उनके पूर्वज भाला युद्ध में सिद्धहस्त थे जिसके कारण अंग्रेजों ने उन्हें भाले सुल्तान का खिताब दिया था।

शमीम खां सुल्तानी

बहुत छोटी सी उम्र में पिता को खोने वाले सुल्तानी के दादा ने उनकी परवरिश की थी। उनके दादा पुलिस में नौकरी करते थे। सुल्तानी ने वर्ष 1987 में लोकदल के साथ अपना राजनीतिक सफर शुरू किया और आज बरेली महानगर में समाजवादी पार्टी के संगठन की रीढ़ माने जाते हैं। कोरोना काल में उन्हें महानगर अध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई और 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने पार्टी के वोट बैंक को मजबूत करने में बड़ी भूमिका निभाई। सुल्तानी खुद चुनाव नहीं लड़ते, लेकिन उनके भाई अलीम खान सुल्तानी लगातार तीसरी बार उनके वार्ड से पार्षद बने हैं। हाल ही में शमीम खां सुल्तानी ने पार्टी कार्यालय में एक बैठक की थी जिसमें न सिर्फ महानगर बल्कि पूरे जिले के नए- पुराने दिग्गज समाजवादी एकजुट हुए थे। सुल्तानी वैसे तो मुस्लिम समाज से ताल्लुक रखते हैं लेकिन हिन्दू समाज पर भी उनका खासा प्रभाव है। वर्तमान मुस्लिम नेताओं में सुल्तानी सबसे अधिक सक्रिय और प्रभावी नजर आते हैं। बरेली के मुस्लिम नेतृत्व की एक धुरी के तौर पर उन्हें देखा जा रहा है। वह संगठन में तो कई अहम भूमिकाएं निभा ही चुके हैं, सामाजिक क्षेत्र में भी उनका योगदान सराहनीय है।

3. इंजीनियर अनीस अहमद खां

शाहजहांपुर के मूल निवासी इंजीनियर अनीस अहमद खान राजनीति और प्रशासनिक समझदारी के लिए मशहूर हैं। सिंचाई विभाग में इंजीनियर रहने के बाद सरकारी नौकरी से वीआरएस लेकर उन्होंने राजनीति का रुख किया। वह रहने वाले भले ही शाहजहांपुर के हैं लेकिन उन्होंने अपनी कर्मभूमि के तौर पर बरेली को चुना है।
बसपा सरकार के दौर में उनका प्रभाव इतना था कि मंत्रालयों तक में उनकी पकड़ मानी जाती थी। वर्तमान में वे सपा के अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के प्रदेश उपाध्यक्ष हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में आज़म खान की परंपरागत सीट रामपुर से मौलाना मोहिबुल्लाह नदवी को जिताने में उनकी भूमिका बेहद अहम रही। राजनीतिक परिवार से ताल्लुक रखने वाले इंजीनियर अनीस अहमद खां दो बार निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर विधानसभा चुनाव भी लड़ चुके हैं और बड़े नेताओं को कड़ी टक्कर दे चुके हैं।

इंजीनियर अनीस अहमद खां

जब वह कैंट विधानसभा सीट से चुनाव लड़े थे तो पूर्व मेयर सुप्रिया ऐरन को भी पछाड़ दिया था। बरेली कैंट और शहर क्षेत्र में उनकी लोकप्रियता मुस्लिम समाज के साथ-साथ दलित और पिछड़े वर्ग में भी काफी है। साफ-सुथरी छवि वाले इंजीनियर अनीस अहमद खां छल-कपट और मौकापरस्ती की राजनीति से कोसों दूर हैं। उनकी यही सादगी उन्हें समाज के हर वर्ग में लोकप्रिय बनाती है। समाजसेवा के क्षेत्र में वह अहम भूमिका निभा रहे हैं। यह अनीस अहमद खां ही हैं जिनके घर में गीता भी पढ़ी जाती है और कुरान भी। तमाम बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाने में वह आज भी अहम भूमिका निभा रहे हैं। न जाने कितनी गरीब बेटियों का घर बसाने में भी उन्होंने अहम भूमिका निभाई है। उनके सेवा कार्य ही उन्हें एक धर्मनिरपेक्ष मुस्लिम चेहरे के तौर पर स्थापित कर रहे हैं। अनीस अहमद एक बार फिर बरेली कैंट विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं।

4. डॉ. अनीस बेग 

मूल रूप से बरेली जिले की मीरगंज तहसील के रहने वाले के जाने-माने चाइल्ड स्पेशलिस्ट और समाजवादी पार्टी के चिकित्सा प्रकोष्ठ के जिला अध्यक्ष डॉ. अनीस बेग भी राजनीति के उभरते हुए मुस्लिम चेहरों में शामिल हैं। उन्होंने शहर विधानसभा सीट से बसपा के टिकट पर चुनाव लड़ा था, जहां उन्होंने अच्छा प्रदर्शन किया, हालांकि जीत नहीं मिली। चिकित्सा क्षेत्र में उनका बड़ा नाम है। पहले वे शहर विधानसभा क्षेत्र में “बेग हॉस्पिटल” चलाते थे और अब उन्होंने कैंट क्षेत्र में “मैक्सा लाइफ सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल एंड फैहमी IVF सेंटर” खोला है। समाज सेवा और स्वास्थ्य क्षेत्र में सक्रियता की वजह से उनकी पहचान सिर्फ राजनीतिक नहीं बल्कि सामाजिक रूप से भी मजबूत हो चुकी है।

डॉक्टर अनीस बेग

हंसमुख और मिलनसार स्वभाव के अनीस बेग महिला सशक्तिकरण की दिशा में भी सराहनीय कार्य कर रहे हैं। यही वजह है कि उनकी फैन फॉलोइंग में बड़ी संख्या महिलाओं और बच्चों की भी हो। होली हो, दीपावली हो या फिर ईद, त्योहारों की खुशियां कैसे बांटनी हैं यह अनीस बेग बाखूबी जानते हैं। उनकी छवि भी एक धर्मनिरपेक्ष मुस्लिम नेता की है। हाल ही में सावन माह और मोहर्रम जब एक साथ आए तो अनीस बेग ने हिन्दू-मुस्लिम एकता और गंगा-जमुनी तहज़ीब की अनोखी मिसाल पेश करते हुए कांवड़ियों पर पुष्प वर्षा की और मोहब्बत का शरबत बांटकर लोगों के दिलों को ठंडक पहुंचाई। अनीस बेग इस बार कैंट विधानसभा सीट से चुनाव लड़ना चाहते हैं।

5. हसीव खान

सादगी और सरल स्वभाव के लिए पहचाने जाने वाले हसीव खान, सपा के शहर विधानसभा क्षेत्र अध्यक्ष हैं। वह मूलरूप से बरेली के ही रहने वाले हैं। वे समाज सेवा से गहराई से जुड़े हुए हैं और बच्चों की शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए अपने घर पर एक लाइब्रेरी भी चलाते हैं। लगभग ढाई दशक से समाजसेवा के क्षेत्र में अहम भूमिका निभा रहे हसीव खान कभी चुनाव नहीं लड़े लेकिन सपा के शहर विधानसभा क्षेत्र अध्यक्ष पद की कमान संभालने के बाद उन्होंने ऐसी रणनीति अपनाई कि शहर विधानसभा क्षेत्र में 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा को पिछले सभी चुनावों के मुकाबले रिकॉर्ड वोट मिले।

हसीव खान

उनका लक्ष्य युवाओं और बच्चों को जागरूक कर समाज को आगे बढ़ाना है। हाल ही में हुए चुनाव में उनकी मेहनत ने पार्टी को बरेली शहर सीट पर अब तक का सबसे बड़ा वोट शेयर दिलाया। यही वजह है कि वे मुस्लिम समाज के बीच लगातार लोकप्रियता हासिल कर रहे हैं।

6- शमीम अहमद
बरेली महानगर के मुस्लिम चेहरों में एक चेहरा बानखाना के पार्षद शमीम अहमद का भी है। मूल रूप से इलाहाबाद के रहने वाले दरगाह आला हजरत की देखरेख करने वाली जमात रजा मुस्तफा की कोर कमेटी के सदस्य शमीम अहमद नगर निगम की राजनीति में खासा प्रभाव रखते हैं।

शमीम अहमद

दरगाह से जुड़े होने के कारण उनका प्रशासन में भी खासा दखल रहता है। समाजवादी पार्टी में अल्पसंख्यक सभा के महानगर अध्यक्ष रह चुके शमीम अहमद सपा महानगर अध्यक्ष पद के प्रबल दावेदार भी माने जाते रहे हैं। वह पार्टी के कई अहम पदों पर भी रह चुके हैं। हालांकि दरगाह के कार्यों में उनकी रुचि ज्यादा रही है। उनकी छवि एक सरल स्वभाव वाले मुस्लिम नेता की है। धर्म संबंधी मामलों में होने वाली पुलिस-प्रशासनिक बैठकों में भी उनकी अहम भूमिका रहती है। वह विधानसभा चुनाव कभी नहीं लड़े लेकिन कई नए नेताओं को लोकप्रियता के शिखर तक पहुंचाने की रणनीति उन्होंने ही तैयार की थी। पार्टी के साथ ही सामाजिक कार्यों में उनकी सहभागिता उनकी लोकप्रियता में इजाफा करती है।

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