नीरज सिसौदिया, बरेली
बरेली जिले की राजनीति हमेशा से उत्तर प्रदेश की सियासत का आईना मानी जाती रही है। गंगा-जमुनी तहज़ीब, धार्मिक-सामाजिक विविधता और जातीय समीकरण यहां की राजनीति को बेहद जटिल बनाते हैं। यही वजह है कि यहां जीत का रास्ता केवल किसी एक वर्ग पर निर्भर नहीं होता, बल्कि हर दल को सामाजिक समूहों के बीच संतुलन साधना पड़ता है। 2022 के विधानसभा चुनावों ने यह तस्वीर और साफ कर दी, जब 9 में से 7 सीटों पर भाजपा ने कब्ज़ा जमाकर अपना वर्चस्व दिखाया और सपा को केवल भोजीपुरा और बहेड़ी सीट से संतोष करना पड़ा। अब 2024 के लोकसभा चुनाव और आगे की सियासत में सपा की नई पीडीए (पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक) रणनीति ने बरेली की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। बरेली की राजनीति इस समय भाजपा के मजबूत किले के तौर पर दिखती है लेकिन सपा का नया पीडीए फॉर्मूला इस किले को हिला सकता है। चुनावी राजनीति में समीकरण अक्सर आखिरी वक्त पर बदल जाते हैं और बरेली की जटिल सामाजिक संरचना को देखते हुए कहना मुश्किल नहीं कि आने वाले दिनों में यहां का हर चुनाव दिलचस्प और निर्णायक होगा।
2022 के विधानसभा नतीजे: भाजपा का दबदबा
2022 में बरेली जिले की कुल 9 विधानसभा सीटों पर मुकाबला हुआ। परिणाम इस प्रकार रहे—
बरेली शहर – भाजपा
बरेली कैंट – भाजपा
नवाबगंज – भाजपा
फरीदपुर (सुरक्षित) – भाजपा
बिथरी चैनपुर – भाजपा
मीरगंज – भाजपा
आंवला – भाजपा
भोजीपुरा – सपा
बहेड़ी – समाजवादी पार्टी
इन नतीजों से साफ था कि मोदी-योगी फैक्टर और भाजपा की सामाजिक इंजीनियरिंग ने जिले में विपक्ष को लगभग अप्रभावी कर दिया।
भाजपा का वोट बैंक और रणनीति
भाजपा ने उच्च जातियों के साथ-साथ गैर-यादव ओबीसी और दलित वर्ग को जोड़ने में बड़ी सफलता हासिल की है। योगी आदित्यनाथ की छवि कानून-व्यवस्था और हिंदुत्व की राजनीति के चलते शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में मजबूत हुई है। इसके अलावा केंद्र और राज्य की योजनाओं का सीधा लाभ मिलने से गरीब और मध्यम वर्ग के वोटरों का झुकाव भाजपा की तरफ बना रहा। भाजपा के लिए बरेली शहर और कैंट की सीटें पारंपरिक गढ़ हैं। यहां मौजूदा मंत्री अरुण कुमार, कैंट विधायक संजीव अग्रवाल, वरिष्ठ पार्षद और नगर निगम कार्यकारिणी के सदस्य सतीश चंद्र सक्सेना कातिब उर्फ मम्मा, पूर्व उपसभापति और युवा खत्री -पंजाबी समाज के नेता अतुल कपूर जैसे नेता लगातार जनता की सेवा में लगे हुए हैं। खास तौर पर शहर विधानसभा सीट पर जहां कायस्थ बिरादरी बहुतायत में है और खत्री-पंजाबी समाज भी सम्मानजनक स्थिति में है। ग्रामीण इलाकों में भी पार्टी ने गैर-यादव ओबीसी और अनुसूचित जातियों को संगठनात्मक स्तर पर जोड़कर मजबूत पकड़ बनाई है। यहां मौजूदा विधायकों और मंत्रियों के अलावा पूर्व विधायक राजेश मिश्रा उर्फ पप्पू भरतौल जैसे ब्राह्मण नेता पार्टी के मजबूत स्तम्भ बने हुए हैं।
सपा की स्थिति और चुनौतियां
समाजवादी पार्टी ने 2022 में भोजीपुर और बहेड़ी सीट जीती, लेकिन अन्य सभी जगह हार का सामना करना पड़ा। पारंपरिक ‘एम-वाई’ (मुस्लिम-यादव) समीकरण अब उतना कारगर नहीं रहा, क्योंकि भाजपा ने गैर-यादव ओबीसी को अपने पाले में कर लिया और दलितों को भी बड़ी संख्या में आकर्षित किया। हालांकि, अखिलेश यादव ने अब रणनीति बदली है। सपा ने ‘पीडीए’ यानी पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक वर्ग को केंद्र में रखकर राजनीति शुरू की है। महानगर की दो सीटों पर पार्टी अध्यक्ष शमीम खां सुल्तानी, शहर विधानसभा क्षेत्र अध्यक्ष हसीव खान, चिकित्सा प्रकोष्ठ के जिला अध्यक्ष डॉ. अनीस बेग, महानगर उपाध्यक्ष राजेश अग्रवाल और अल्पसंख्यक सभा के प्रदेश उपाध्यक्ष इंजीनियर अनीस अहमद खां और प्रदेश सचिव मोहम्मद कलीमुद्दीन जैसे नेता संगठन के साथ ही व्यक्तिगत स्तर पर भी पीडीए समाज को जोड़ने का काम कर रहे हैं। लेकिन जिला अध्यक्ष शिवचरण कश्यप इस दिशा में बेहद कमजोर साबित हो रहे हैं। वह जिले की जगह इन दिनों महानगर के नेताओं के घरों पर ज्यादा नजर आ रहे हैं। खुद पिछड़े समाज से होने के बावजूद वह भाजपा के ओबीसी वोटर को तोड़ने में सफल नजर नहीं आ रहे। हालांकि दलितों के नेता और पूर्व ब्लॉक प्रमुख चंद्रसेन सागर फरीदपुर में, अता उर रहमान बहेड़ी में संगठन को मजबूती देने का काम कर रहे हैं। लेकिन पूर्व जिला उपाध्यक्ष जयप्रकाश भास्कर द्वारा धोबी समाज पर आधारित सर्वजन आम पार्टी के गठन से धोबी समाज में बिखराव नजर आने लगा है। इसका असर सिर्फ फरीदपुर में ही नहीं बल्कि पूरे जिले में ही देखने को मिल सकता है।
बरेली की सामाजिक संरचना
अल्पसंख्यक (मुख्यतः मुस्लिम): लगभग 32%
ओबीसी (कुर्मी, मौर्य, प्रजापति, कश्यप, गूजर, निषाद आदि): 38-40%
दलित (जाटव, पासी, कोरी आदि): 18-20%
उच्च जातियां (ब्राह्मण, ठाकुर, कायस्थ, खत्री, वैश्य आदि): 10-12%
यानी, पीडीए का जोड़ बरेली की लगभग 90% आबादी को कवर करता है। यही कारण है कि सपा इस फार्मूले पर आक्रामक तरीके से काम कर रही है।
पीडीए रणनीति से सपा को संभावित फायदा
अगर सपा मुस्लिम वोट को मजबूती से अपने साथ रखती है और ओबीसी-दलित वर्गों में सेंध लगा लेती है, तो भाजपा का गणित बिगड़ सकता है।
बहेड़ी और भोजीपुरा जैसी सीटों पर मुस्लिम निर्णायक भूमिका निभाते हैं। यहां सपा का पलड़ा मजबूत हो सकता है। अगर ओबीसी और दलित वोटरों में 10-15% का भी शिफ्ट हुआ, तो मीरगंज, बिथरी चैनपुर और फरीदपुर जैसी सीटों पर भाजपा को चुनौती मिल सकती है। बसपा का प्रभाव लगातार घट रहा है। दलितों का वोट अब इधर-उधर जा रहा है, जिसका फायदा सपा को मिल सकता है।
लेकिन खतरे भी कम नहीं
ओबीसी वर्ग का बड़ा हिस्सा भाजपा से जुड़ा हुआ है। योगी सरकार में इन्हें प्रतिनिधित्व भी मिला है। दलितों में भाजपा की पकड़ मज़बूत है क्योंकि पार्टी खुद को सुरक्षा और सम्मान का प्रतीक बताती है। अगर सपा पीडीए पर ज़्यादा ज़ोर देती है, तो यादव वर्ग को लग सकता है कि उनकी पारंपरिक भूमिका कमजोर हो रही है। इससे आंतरिक असंतोष भी उभर सकता है।
कांग्रेस और बसपा की स्थिति
बरेली में कांग्रेस अब हाशिए पर है। संगठनात्मक कमजोरी और स्थानीय नेतृत्व के अभाव में पार्टी भाजपा और सपा के मुकाबले कहीं नहीं ठहरती। हालांकि, कांग्रेस में नवाब मुजाहिद हसन खां और प्रेम प्रकाश अग्रवाल जैसे कुछ नेता आज भी हैं जिनकी वजह से पार्टी में कुछ दमखम बचा हुआ है। लेकिन बसपा का जनाधार लगातार घटता जा रहा है। दलित वोटरों का बड़ा हिस्सा भाजपा की तरफ खिसक गया है, और बचे हुए हिस्से पर सपा नजर गड़ाए हुए है।
लोकसभा चुनाव और आगे का समीकरण
बरेली लोकसभा सीट पर भाजपा का मजबूत दबदबा है लेकिन बरेली जिले के कुछ विधानसभा क्षेत्र आंवला लोकसभा सीट के अंतर्गत लगते हैं और आंवला संसदीय सीट पर समाजवादी पार्टी काबिज है। यह संभव हुआ है लोकसभा चुनाव में सपा के पीडीए के फॉर्मूले की वजह से। अगर सपा का पीडीए फार्मूला विधानसभा में भी काम करता है, तो मुकाबला दिलचस्प हो सकता है। भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि वह ओबीसी और दलित वोटरों को अपने साथ बनाए रखे। वहीं सपा को यह देखना होगा कि मुस्लिम वोट बैंक पूरी तरह उसके साथ रहे और ओबीसी-दलितों में पैठ मजबूत हो।





