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जिलाध्यक्ष पद पर महेंद्र सिंह राजपूत का लोधी दांव, 3 लाख से ज्यादा वोटों का हवाला, ढाई दशक तक यादव, अब किसकी बारी?, शिवचरण कश्यप को बाहर का रास्ता दिखाने के बाद अब युवा चेहरे की तैयारी

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नीरज सिसौदिया, बरेली
सोमवार को समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष श्याम लाल पाल ने बरेली जिला अध्यक्ष शिवचरण कश्यप सहित पूरी जिला कार्यकारिणी को भंग कर दिया। संगठन के इस बड़े फैसले के बाद जिले में नए अध्यक्ष की नियुक्ति को लेकर अटकलों का दौर तेज हो गया है। पार्टी सूत्रों और स्थानीय नेताओं के बीच यह आम राय बन रही है कि इस बार भी जिलाध्यक्ष पद किसी पिछड़े वर्ग के नेता को ही दिया जाएगा। ऐसे में लोधी समाज से आने वाले किसी युवा चेहरे को भी तरजीह मिलने की संभावना जताई जा रही है, जिससे महेंद्र सिंह लोधी की दावेदारी और ज्यादा प्रासंगिक हो गई है।
समाजवादी पार्टी के महानगर सचिव महेंद्र सिंह राजपूत लोधी ने प्रदेश अध्यक्ष श्याम लाल पाल को पत्र लिखकर बरेली जिलाध्यक्ष पद पर लोधी समाज को मौका देने की जोरदार मांग की है। यह आवेदन अब स्थानीय राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया है, क्योंकि इसमें न केवल पिछले जिलाध्यक्षों का जातीय ब्योरा दिया गया है बल्कि लोधी समाज की निर्णायक वोट हिस्सेदारी का भी विस्तृत उल्लेख किया गया है।
महेंद्र सिंह लोधी ने अपने पत्र में स्पष्ट कहा है कि बरेली में समाजवादी पार्टी का जिला संगठन बनने के बाद से अब तक यादव, गंगवार, सोलंकी, मौर्य और कश्यप समाज के नेताओं को जिलाध्यक्ष बनाया गया, लेकिन लोधी समाज को कभी यह जिम्मेदारी नहीं दी गई। उन्होंने पुराने जिलाध्यक्षों के नाम और कार्यकाल का उल्लेख करते हुए लिखा कि वीरपाल सिंह यादव का लंबा कार्यकाल रहा, जबकि अन्य समाजों के नेताओं को भी क्रमशः संगठन की कमान मिली। वर्तमान में भी शिवचरण कश्यप जिलाध्यक्ष थे, जिनकी कार्यकारिणी अब भंग हो चुकी है।
पत्र में महेंद्र सिंह लोधी ने प्रदेश नेतृत्व को यह संदेश देने की कोशिश की है कि लोधी समाज अब सपा की ओर तेजी से झुक रहा है और इसे राजनीतिक रूप से संगठित करने का श्रेय राष्ट्रीय सचिव राकेश राजपूत लोधी को जाता है। उन्होंने दावा किया कि 2024 के लोकसभा चुनाव में लोधी वोटों के रुझान में बड़ा बदलाव आया और कई क्षेत्रों में भाजपा को नुकसान हुआ। उदाहरण के तौर पर एटा लोकसभा सीट का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि वहां भाजपा के चार विधायक होने के बावजूद लोधी समाज ने भाजपा उम्मीदवार को वोट नहीं दिया जो सपा की रणनीति और लोधी नेतृत्व की सक्रियता का परिणाम है।
महेंद्र सिंह लोधी का आवेदन केवल भावनात्मक अपील नहीं बल्कि राजनीतिक गणित पर आधारित दस्तावेज जैसा प्रतीत होता है। उन्होंने बरेली जिले की नौ विधानसभा सीटों में लोधी समाज की वोट संख्या का विस्तृत आंकड़ा प्रस्तुत किया है। उनके अनुसार मीरगंज में 85 हजार, आंवला में 65 हजार, बिथरी में 55 हजार, कैंट में 45 हजार, फरीदपुर में 25 हजार, नवाबगंज में 30 हजार, बहेड़ी में 25 हजार, भोजीपुरा में 28 हजार और शहर में 20 हजार लोधी वोट हैं। यह आंकड़ा इस बात की ओर संकेत करता है कि जिले में लोधी समाज कई सीटों पर निर्णायक भूमिका निभा सकता है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि सपा लंबे समय से गैर-यादव पिछड़े वर्गों में पैठ बनाने की कोशिश कर रही है। प्रदेश अध्यक्ष श्याम लाल पाल स्वयं पिछड़े वर्ग से आते हैं और हाल के वर्षों में पार्टी ने लोधी, मौर्य, कुर्मी और कश्यप समाज को जोड़ने के लिए कई स्तरों पर रणनीति बनाई है। बरेली की जिला कार्यकारिणी भंग होने के बाद यह सामाजिक संतुलन का सवाल और अहम हो गया है। बरेली में सपा की संगठनात्मक राजनीति पर नज़र रखने वाले लोग बताते हैं कि जिला स्तर पर अब तक नेतृत्व की धुरी मुख्यतः यादव और अन्य पिछड़े वर्गों के बीच ही रही है। लेकिन भाजपा के उभार के बाद लोधी समाज का एक बड़ा हिस्सा सपा से दूर चला गया था। अब यदि यह समाज दोबारा सपा के साथ मजबूती से जुड़ रहा है तो उसे संगठन में प्रतिनिधित्व देना पार्टी के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
महेंद्र सिंह लोधी ने अपने पत्र में यह भी लिखा कि यदि संख्या के आधार पर देखा जाए तो बरेली में लोधी समाज की उपेक्षा विरोधियों के लिए फायदेमंद साबित हो सकती है। उन्होंने प्रदेश अध्यक्ष से आग्रह किया कि इस बार जिलाध्यक्ष पद पर लोधी समाज को मौका देकर पार्टी एक बड़ा सामाजिक संदेश दे सकती है।
अब जबकि पूरा जिला संगठन भंग हो चुका है और नए नेतृत्व के चयन की प्रक्रिया शुरू होने वाली है, सपा के भीतर यह चर्चा जोर पकड़ रही है कि इस बार किसी ऐसे चेहरे को आगे लाया जाए जो सामाजिक रूप से प्रभावशाली होने के साथ युवा और संघर्षशील भी हो। लोधी समाज से आने वाले महेंद्र सिंह लोधी खुद को इसी श्रेणी में रखते हुए पार्टी के सामने एक मजबूत विकल्प के रूप में पेश कर रहे हैं।
यह मांग ऐसे समय में उठी है जब समाजवादी पार्टी 2027 विधानसभा चुनावों की तैयारी में जुट चुकी है और जिला संगठनों को मजबूत करने की कवायद चल रही है। सपा के भीतर भी यह चर्चा तेज हो गई है कि यदि पार्टी को भाजपा के मजबूत सामाजिक आधार को चुनौती देनी है तो उसे पिछड़े वर्गों में संतुलन बनाना होगा।
स्थानीय स्तर पर कई सपा कार्यकर्ता मानते हैं कि लोधी समाज का संगठन में प्रतिनिधित्व बढ़ने से पार्टी को ग्रामीण बेल्ट में मजबूती मिलेगी। खासकर मीरगंज, आंवला, भोजीपुरा और बिथरी जैसी सीटों पर लोधी वोट निर्णायक माने जाते हैं। ऐसे में जिलाध्यक्ष पद पर लोधी चेहरा आने से इन इलाकों में सपा को सीधा फायदा मिल सकता है।
हालांकि पार्टी नेतृत्व की ओर से अभी तक इस आवेदन पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन यह तय है कि महेंद्र सिंह लोधी का यह पत्र और जिला कार्यकारिणी भंग होने की घटना सपा के भीतर सामाजिक प्रतिनिधित्व की बहस को और तेज करेगी। यह आवेदन केवल एक व्यक्ति की दावेदारी नहीं बल्कि एक पूरे समाज की राजनीतिक हिस्सेदारी की मांग बनकर उभरा है।
अब सबकी नजरें लखनऊ पर टिकी हैं- क्या सपा इस बार बरेली में संगठन की कमान लोधी समाज के किसी युवा चेहरे को सौंपकर नया सामाजिक समीकरण बनाएगी? आने वाला फैसला बरेली की सियासत में बड़ा बदलाव ला सकता है।

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