नीरज सिसौदिया, बरेली
बरेली शहर विधानसभा सीट पर समाजवादी पार्टी की सियासत अब एक नए मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में बरेली कैंट सीट से किस्मत आजमा चुकीं पूर्व मेयर सुप्रिया ऐरन ने अब 2027 के विधानसभा चुनाव से खुद को अलग कर लिया है। लगातार चुनावी हार के बाद उन्होंने इस बार चुनाव न लड़ने का फैसला किया है। इस फैसले की औपचारिक घोषणा उनके पति, पूर्व सांसद और पूर्व मंत्री प्रवीण सिंह ऐरन ने गुरुवार को समाजवादी पार्टी कार्यालय में आयोजित मासिक बैठक के दौरान की।
प्रवीण ऐरन ने साफ शब्दों में कहा कि सुप्रिया ऐरन अब विधानसभा चुनावी राजनीति से दूरी बनाए रखेंगी और पार्टी जिसे टिकट देगी उसकी जीत सुनिश्चित कराने का काम करेंगे। हालांकि, कुछ महीने पहले उन्होंने लखनऊ से बरेली भेजे गए तत्कालीन प्रभारी अनुराग पटेल के सामने शहर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने की इच्छा जरूर जताई थी। उस समय माना जा रहा था कि सुप्रिया ऐरन 2027 में शहर सीट से ताल ठोक सकती हैं, लेकिन अब उनके मैदान से हटने के बाद सियासी तस्वीर काफी हद तक साफ होती दिख रही है।
सुप्रिया ऐरन के चुनावी मैदान से हटते ही सपा के शहर विधानसभा क्षेत्र अध्यक्ष हसीव खान** की दावेदारी और मजबूत हो गई है। पार्टी के भीतर और बाहर दोनों जगह यह चर्चा तेज हो गई है कि शहर सीट से समाजवादी पार्टी का सबसे मजबूत चेहरा फिलहाल हसीव खान** ही हैं। संगठन से जुड़े लोग भी मानते हैं कि अगर आज टिकट की बात हो, तो हसीव खान** सबसे आगे नजर आते हैं।
हसीव खान लंबे समय से संगठन में सक्रिय हैं और जमीनी स्तर पर उनकी पकड़ मजबूत मानी जाती है। उन्होंने नए साल की शुरुआत में एक भव्य बीएलए सम्मेलन** आयोजित कराया था, जिसमें भारी संख्या में कार्यकर्ता और बूथ लेवल एजेंट पहुंचे थे। इस सम्मेलन** में जुटी भीड़ को देखकर तत्कालीन एसआईआर प्रभारी वीरपाल सिंह यादव भी काफी प्रभावित नजर आए थे। खास बात यह रही कि यह कार्यक्रम भी ऐरन परिवार के होटल में ही आयोजित किया गया था, जिससे उस समय दोनों पक्षों के बीच बेहतर तालमेल की चर्चा थी।
हसीव खान सिर्फ संगठन तक ही सीमित नहीं रहे, बल्कि **एसआईआर (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन)** के काम में भी उनकी भूमिका अहम रही है। मतदाता सूची से जुड़े इस अभियान में उन्होंने सक्रिय भागीदारी निभाई और कार्यकर्ताओं को लगातार दिशा-निर्देश देते रहे। यही वजह है कि पार्टी के अंदर उन्हें एक जिम्मेदार और मेहनती संगठनकर्ता के रूप में देखा जाता है।
इसके अलावा हसीव खान की पहचान सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं है। वे समाजसेवा के क्षेत्र में भी सक्रिय रहते हैं। खास तौर पर स्कूली बच्चों को प्रोत्साहित करना, शिक्षा से जुड़े कार्यक्रमों में सहयोग देना और जरूरतमंदों की मदद करना उनकी दिनचर्या का हिस्सा माना जाता है। यही कारण है कि युवा वर्ग और अभिभावकों के बीच उनकी अच्छी छवि बनी हुई है।
इस बार शहर विधानसभा सीट पर सामाजिक समीकरण भी हसीव खान के पक्ष में जाता दिख रहा है। एसआईआर के बाद **मुस्लिम वोटरों की संख्या में निर्णायक बढ़ोतरी** की संभावना जताई जा रही है। माना जा रहा है कि यह बढ़ोतरी** चुनावी नतीजों में अहम भूमिका निभा सकती है। हसीव खान का **मुस्लिम समाज में प्रभाव तो है ही, साथ ही वे **हिंदू समाज के बीच भी लोकप्रिय** बताए जाते हैं। यही संतुलन उन्हें अन्य दावेदारों से अलग बनाता है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि शहर सीट पर समाजवादी पार्टी को ऐसा चेहरा चाहिए, जो सिर्फ एक वर्ग तक सीमित न हो, बल्कि हर समाज के बीच स्वीकार्य हो। इस कसौटी पर हसीव खान काफी हद तक खरे उतरते नजर आते हैं।
हालांकि शहर विधानसभा सीट से कुछ अन्य नेता भी दावेदारी जता रहे हैं, लेकिन फिलहाल वे सिर्फ चर्चाओं तक ही सीमित हैं। कुछ पार्षद जरूर टिकट की चाह रखते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर उनका प्रचार-प्रसार नजर नहीं आता। संगठनात्मक अनुभव और सक्रियता के मामले में वे हसीव खान के आसपास भी नहीं दिखते।
एक नाम जरूर ऐसा है जो थोड़ी सक्रियता दिखा रहा है, वह है अब्दुल कय्यूम खां उर्फ मुन्ना। इसके अलावा मोहम्मद कलीमुद्दीन का नाम भी चर्चा में है। पिछले विधानसभा चुनाव में कलीमुद्दीन ने पूरी दमदारी से अपनी दावेदारी पेश की थी और उस समय उन्हें बरेली की राजनीति के उभरते चेहरों में गिना जाने लगा था। हालांकि इस बार वे अपनी रणनीति सार्वजनिक नहीं कर रहे हैं और अंदरखाने तैयारी में जुटे बताए जाते हैं।
कुल मिलाकर देखा जाए तो सुप्रिया ऐरन के चुनावी मैदान से हटने के बाद हसीव खान की राह काफी हद तक साफ होती नजर आ रही है। संगठनात्मक अनुभव, सामाजिक संतुलन, जमीनी पकड़ और लगातार सक्रियता उन्हें अन्य दावेदारों पर बढ़त दिलाती है। अगर आने वाले समय में कोई बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम नहीं होता, तो शहर विधानसभा सीट से समाजवादी पार्टी के टिकट की दौड़ में हसीव खान सबसे आगे दिखाई दे रहे हैं।
अब देखना यह होगा कि समाजवादी पार्टी का शीर्ष नेतृत्व शहर सीट को लेकर क्या फैसला करता है, लेकिन फिलहाल सियासी माहौल यही इशारा कर रहा है कि हसीव खान 2027 की लड़ाई के लिए सबसे मजबूत समाजवादी चेहरा बनकर उभर रहे हैं।





