नीरज सिसौदिया, बरेली
बरेली कैंट विधानसभा सीट की राजनीति पिछले एक दशक में पूरी तरह बदल चुकी है। कभी यह सीट मुस्लिम राजनीति का मजबूत केंद्र मानी जाती थी, लेकिन परिसीमन के बाद बदले भौगोलिक स्वरूप ने यहां की सामाजिक और राजनीतिक संरचना को भी बदल दिया। आज बरेली कैंट विधानसभा सीट की राजनीति का केंद्र वैश्य समाज बन चुका है। यही वजह है कि 2022 के विधानसभा चुनाव में इस सीट पर जीत और हार का फैसला भी काफी हद तक वैश्य मतदाताओं के रुख से तय हुआ और भारतीय जनता पार्टी यहां से वैश्य नेता को ही उम्मीदवार बनाती है।
वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस छोड़कर सपा में आई वैश्य समाज की ही नेता सुप्रिया ऐरन को मैदान में उतारा। सपा को उम्मीद थी कि वैश्य प्रत्याशी उतारकर वह भाजपा के कोर वोट बैंक में सेंध लगा पाएगी और मुस्लिम वोटों के साथ वैश्य वोटों का संतुलन बनाकर चुनाव जीत लेगी। रणनीति कागजों पर मजबूत दिख रही थी, लेकिन जमीन पर यह दांव उल्टा पड़ गया। नतीजा यह हुआ कि भाजपा के संजीव अग्रवाल चुनाव जीत गए और सपा को एक बार फिर बरेली कैंट सीट से खाली हाथ लौटना पड़ा।
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि यह संजीव अग्रवाल की जीत से ज्यादा सुप्रिया ऐरन की हार थी। सपा ने जाति का चुनाव तो सही किया, लेकिन चेहरा गलत चुन लिया। यही वह सबसे बड़ी भूल थी, जिसकी कीमत पार्टी को चुकानी पड़ी।
दरअसल, सुप्रिया ऐरन और उनके पति प्रवीण सिंह ऐरन कोई नए चेहरे नहीं थे। बरेली की जनता उन्हें कई बार मौका दे चुकी थी। कभी सांसद बनाकर, कभी विधायक बनाकर और कभी महापौर का ताज पहनाकर। लेकिन इन मौकों के बावजूद ऐरन दंपति जनता की उम्मीदों पर खरे नहीं उतर पाए। यही वजह है कि उनके खिलाफ पहले से ही एंटी इनकंबेंसी का माहौल बन चुका था।
पिछले लगभग एक दशक में ऐरन परिवार का कोई भी सदस्य कोई बड़ा चुनाव नहीं जीत सका। प्रवीण सिंह ऐरन लगातार लोकसभा चुनाव हारते रहे, वहीं सुप्रिया ऐरन को विधानसभा चुनावों में जनता ने बार-बार नकारा। एक समय तो ऐसा भी आया जब सुप्रिया ऐरन बरेली कैंट विधानसभा सीट पर तीसरे स्थान पर भी अपनी जगह नहीं बना सकी थीं।
वैश्य समाज तो पहले ही ऐरन परिवार से दूरी बना चुका था। इसकी एक बड़ी वजह उनका वीआईपी अंदाज भी माना जाता है। स्थानीय लोग कहते हैं कि ऐरन दंपति जनता से दूरी बनाकर चलने लगे थे। कार्यकर्ताओं और व्यापारियों से उनका संवाद कमजोर हो गया था। यही कारण है कि जब सपा ने 2022 में सुप्रिया ऐरन को उम्मीदवार बनाया तो वैश्य समाज पूरी तरह एकजुट होना तो दूर एक चौथाई भी उनके पक्ष में नहीं आ सका।
राजनीतिक हलकों में यह चर्चा आम है कि अगर समाजवादी पार्टी ने वरिष्ठ सपा पार्षद और जमीनी नेता राजेश अग्रवाल को बरेली शहर की जगह कैंट विधानसभा सीट से मैदान में उतारा होता तो नतीजे कुछ और हो सकते थे। राजेश अग्रवाल लगभग तीन दशक से बरेली की वैश्य राजनीति में सक्रिय हैं और समाज के बीच उनकी मजबूत पकड़ मानी जाती है।
राजेश अग्रवाल की पहचान एक जमीनी नेता की है। वह न सिर्फ समाजवादी पार्टी के पुराने और भरोसेमंद कार्यकर्ता हैं, बल्कि व्यापार मंडल, अग्रवाल सभा और वैश्य समाज से जुड़े कई संगठनों में अहम जिम्मेदारियां भी निभा रहे हैं। समाज के छोटे-बड़े आयोजनों में उनकी मौजूदगी लगभग तय रहती है। यही वजह है कि वैश्य समाज के बीच उनकी स्वीकार्यता सुप्रिया ऐरन की तुलना में कहीं अधिक है।
इन दिनों बरेली कैंट की वैश्य राजनीति की धुरी बन चुके हैं राजेश अग्रवाल। वह जिस भी सामाजिक या व्यापारिक कार्यक्रम में जाते हैं, वहां उन्हें सम्मानित किया जाता है। सत्ता पक्ष के नेता भी उनकी अनदेखी नहीं कर पाते। यह संकेत है कि राजेश अग्रवाल केवल विपक्ष के नेता नहीं, बल्कि समाज के एक प्रभावशाली चेहरे के तौर पर उभर चुके हैं।
स्थानीय राजनीति में यह भी चर्चा है कि मौजूदा विधायक संजीव अग्रवाल के कुछ करीबी लोग भी अंदरखाने राजेश अग्रवाल का नाम आगे बढ़ाते नजर आ रहे हैं। इसका मतलब साफ है कि राजेश अग्रवाल की बढ़ती लोकप्रियता ने भाजपा के खेमे में भी हलचल पैदा कर दी है।
2022 के विधानसभा चुनाव में बरेली कैंट विधानसभा सीट पर कुल मतदाताओं की संख्या लगभग 3 लाख 74 हजार 239 थी। इसमें अनुमानित तौर पर करीब 1 लाख मुस्लिम मतदाता थे, जबकि वैश्य मतदाताओं की संख्या लगभग 75 हजार मानी जाती है। इसके अलावा अनुसूचित जाति के लगभग 30 हजार, ब्राह्मण 20 हजार, कुर्मी 15 हजार, कश्यप 15 हजार, कायस्थ 10 हजार, सिख 5 हजार और यादव लगभग 5 हजार मतदाता थे। बाकी अन्य जातियों के मतदाता भी इस सीट पर मौजूद हैं।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि वैश्य मतदाता भाजपा का कोर वोटर माना जाता है। आमतौर पर यह वोट बैंक भाजपा के साथ मजबूती से खड़ा रहता है। यही वजह है कि भाजपा हर हाल में वैश्य वोटों को अपने पक्ष में बनाए रखना चाहती है।
एसआईआर (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) से पहले बरेली कैंट विधानसभा सीट पर वैश्य मतदाताओं की संख्या लगभग 75 हजार मानी जाती थी। हालांकि, एसआईआर के बाद यह संख्या कितनी रह जाएगी, इसका सही पता 10 अप्रैल को अंतिम मतदाता सूची के प्रकाशन के बाद ही चल पाएगा। बरेली कैंट विधानसभा (125) में कुल 1 लाख 34 हजार 933 वोट कटने की भी बात सामने आ चुकी है।
भाजपा और सपा दोनों ही इस बात को लेकर सतर्क हैं कि कहीं वैश्य मतदाताओं के नाम कटने से चुनावी गणित न बिगड़ जाए। हालांकि, यह भी माना जा रहा है कि अगर वोट कटते भी हैं तो उसका ज्यादा नुकसान भाजपा की बजाय समाजवादी पार्टी को लाभ पहुंचा सकता है, क्योंकि राजेश अग्रवाल के जरिए सपा वैश्य वोटों के ध्रुवीकरण की कोशिश कर रही है।
राजेश अग्रवाल की बढ़ती सक्रियता ने भाजपा को असमंजस में डाल दिया है। भाजपा को यह समझ नहीं आ रहा है कि वैश्य समाज का कौन सा वर्ग राजेश अग्रवाल के साथ जा सकता है और कौन सा वर्ग पार्टी के साथ बना रहेगा। यही वजह है कि भाजपा के रणनीतिकार लगातार कैंट सीट पर नजर बनाए हुए हैं।
भाजपा की एक रणनीति यह भी मानी जा रही है कि वह चाहती है कि समाजवादी पार्टी कैंट विधानसभा सीट से किसी मुस्लिम प्रत्याशी को मैदान में उतार दे। ऐसा होने पर भाजपा को उम्मीद है कि वैश्य वोट एकजुट होकर उसके पक्ष में आ जाएगा और उसकी चुनावी राह आसान हो जाएगी। इसके लिए भाजपा ने अपना राजनीतिक जाल फैलाना भी शुरू कर दिया है।
हालांकि, राजेश अग्रवाल भी सियासत के अनुभवी खिलाड़ी माने जाते हैं। उन्होंने अब तक अपने पत्ते पूरी तरह नहीं खोले हैं। लेकिन उन्होंने गली-मोहल्लों में अपने त्योहारों के बधाई संदेश देते हुए स्टीकर लगवाने शुरू कर दिए हैं, जो यह संकेत देता है कि वह आने वाले चुनाव के लिए पूरी तरह तैयार हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर समाजवादी पार्टी इस बार सही समय पर सही जाति का सही चेहरा चुनती है, तो बरेली कैंट विधानसभा सीट पर मुकाबला बेहद दिलचस्प हो सकता है। राजेश अग्रवाल की जमीनी पकड़, वैश्य समाज में उनकी स्वीकार्यता और बदलते राजनीतिक समीकरण इस बात के संकेत दे रहे हैं कि आगामी विधानसभा चुनाव भाजपा के लिए आसान नहीं होने वाला।
कुल मिलाकर बरेली कैंट विधानसभा सीट की राजनीति इस समय एक नए मोड़ पर खड़ी है। 2022 में सही जाति के गलत चेहरे पर दांव लगाकर समाजवादी पार्टी भले ही हार गई हो, लेकिन अब पार्टी के पास एक ऐसा चेहरा है जो वैश्य राजनीति की धुरी बन चुका है। आने वाले चुनाव यह तय करेंगे कि क्या राजेश अग्रवाल वाकई भाजपा के अभेद्य माने जाने वाले वैश्य वोट बैंक में सेंध लगा पाएंगे या फिर भाजपा एक बार फिर इस सीट पर अपना कब्जा बरकरार रखेगी।
यदि राजेश अग्रवाल को जाति के खाचे से दूर कर दे तो राजेश अग्रवाल बरेली शहर के एकमात्र नेता हैं जो सभी वर्ग के काम करते हैं और सभी वर्ग उन्हें इसलिए पसंद करते हैं कि राजेश अग्रवाल मुसीबत के समय काम आने वाले व्यक्ति हैं लगातार उनके आंदोलन इस बात के गवाह है।





