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बढ़े किराए पर घमासान: सपा नेता राजेश अग्रवाल के नेतृत्व में दुकानदारों ने नगर निगम पहुंचकर जताया विरोध, भाजपा नेता अतुल कपूर ने मिलाये सुर में सुर, मेयर और कमिश्नर ने दिया राहत का भरोसा, पढ़ें क्या है पूरा मामला?

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नीरज सिसौदिया, बरेली
बरेली में नगर निगम की दुकानों के बढ़े किराए और नामांतरण शुल्क को लेकर व्यापारियों में नाराज़गी तेज हो गई है। सोमवार 17 फरवरी 2026 को बड़ी संख्या में नगर निगम के किराएदार दुकानदार पार्षद राजेश अग्रवाल के नेतृत्व में नगर निगम कार्यालय पहुंचे और अधिकारियों से सीधी वार्ता कर अपनी समस्याएं विस्तार से रखीं। प्रतिनिधिमंडल ने नगर आयुक्त संजीव कुमार मौर्य और महापौर उमेश गौतम से मुलाकात कर किराया घटाने तथा नामांतरण शुल्क कम करने की मांग की।
राजेश अग्रवाल ने अधिकारियों को बताया कि नगर निगम द्वारा बढ़ाया गया किराया इतना अधिक है कि अधिकांश छोटे व्यापारी उसे देने की स्थिति में नहीं हैं। उन्होंने कहा कि उनकी आय सीमित है और अचानक इतना बड़ा आर्थिक बोझ डालने से उनका कारोबार डगमगा गया है। उनका कहना था कि वे नगर निगम के विरोधी नहीं हैं और किराया देना चाहते हैं, लेकिन किराया ऐसा होना चाहिए जिसे वे वास्तविक रूप से जमा कर सकें।
राजेश अग्रवाल ने यह भी कहा कि किराया नीति और नामांतरण व्यवस्था में कई गंभीर विसंगतियां रह गई हैं। जब नई व्यवस्था लागू की गई थी, तब समिति ने सुझाव देकर इन्हें सुधारने का भरोसा दिया था, लेकिन उसके बाद भी कोई ठोस सुधार नहीं हुआ। इसके उलट, नगर निगम के कर्मचारी लगातार बढ़े हुए किराए की मांग कर रहे हैं और नोटिस भेज रहे हैं, जिससे दुकानदारों में भय और असुरक्षा का माहौल बन गया है।


इस पूरे मुद्दे को मजबूती से उठाते हुए राजेश अग्रवाल ने अधिकारियों के सामने व्यापारियों का पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि नगर निगम को जमीन की सच्चाई समझनी होगी और व्यापारियों पर ऐसा बोझ नहीं डालना चाहिए जिसे वे उठा ही न सकें। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि पड़ोसी शहर शाहजहांपुर में भी नगर निगम ने किराया बढ़ाया है, लेकिन वहां बढ़ोतरी बहुत कम है और बरेली की तुलना में लगभग दस प्रतिशत के आसपास ही है। ऐसे में बरेली के दुकानदारों पर इतना भारी बोझ डालना उचित नहीं है।


राजेश अग्रवाल ने नामांतरण शुल्क का मुद्दा भी जोरदार ढंग से उठाया। उन्होंने कहा कि नामांतरण की राशि इतनी अधिक तय कर दी गई है कि साधारण दुकानदार उसे जमा नहीं कर पा रहे हैं। यदि यही स्थिति बनी रही तो कई व्यापारी दुकान छोड़ने को मजबूर हो जाएंगे और इससे शहर के व्यापार पर भी असर पड़ेगा।


बैठक के बाद राजेश अग्रवाल ने मेयर और निगम कमिश्नर को ज्ञापन भी सौंपा। उन्होंने कहा, “हम व्यापारियों के साथ खड़े हैं। दुकानदार शहर की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। किराया और नामांतरण शुल्क दोनों इतने होने चाहिए जिन्हें व्यापारी आसानी से दे सकें। हमने अधिकारियों से साफ कहा है कि नीति की खामियां दूर कर तुरंत राहत दी जाए। यदि जरूरत पड़ी तो हम फिर से व्यापारियों के साथ खड़े होकर उनकी आवाज उठाएंगे।”
इस आंदोलन को शहर की राजनीति में भी समर्थन मिला। शहर विधानसभा सीट से टिकट के प्रबल दावेदार माने जा रहे पूर्व उपसभापति अतुल कपूर ने भी दुकानदारों और व्यापारियों का खुलकर समर्थन किया और प्रशासन से राहत देने की मांग की।


अतुल कपूर ने कहा, “छोटे दुकानदारों पर अचानक इतना भारी किराया और ऊंचा नामांतरण शुल्क डालना उचित नहीं है। व्यापारी वर्ग शहर की रीढ़ है। यदि वही परेशान होगा तो बाजार और रोजगार दोनों प्रभावित होंगे। प्रशासन को तुरंत संवेदनशील निर्णय लेकर किराया कम करना चाहिए और व्यापारियों को राहत देनी चाहिए। हमने इस मुद्दे को महापौर उमेश गौतम और निगम कमिश्नर संजीव कुमार मौर्य के समक्ष रखा है। उन्होंने समस्या के समाधान का भरोसा दिया है।”


बैठक के दौरान कई दुकानदारों ने अपनी व्यक्तिगत परेशानियां भी बताईं। किसी ने कहा कि बढ़े किराए के कारण परिवार चलाना मुश्किल हो गया है, तो किसी ने बताया कि लगातार नोटिस मिलने से मानसिक दबाव बढ़ गया है। व्यापारियों ने प्रशासन से आग्रह किया कि उन्हें परेशान करने के बजाय समाधान निकाला जाए ताकि वे नियमित रूप से भुगतान कर सकें।
वार्ता के अंत में महापौर उमेश गौतम ने दुकानदारों को भरोसा दिलाया कि किराया कम करने के प्रस्ताव पर गंभीरता से विचार किया जाएगा और व्यापारियों के हितों को ध्यान में रखकर निर्णय लिया जाएगा। नगर आयुक्त संजीव कुमार मौर्य ने भी आश्वासन दिया कि पूरे मामले की समीक्षा कर जहां संभव होगा वहां कमी की जाएगी ताकि दुकानदारों को अनावश्यक परेशानी न हो।


इस घटनाक्रम ने साफ कर दिया कि नगर निगम की किराया व्यवस्था अब शहर का बड़ा मुद्दा बन चुकी है। इस पूरे घटनाक्रम में राजेश अग्रवाल दुकानदारों की आवाज बनकर सबसे आगे दिखाई दिए, जबकि अतुल कपूर के समर्थन से व्यापारियों की मांग को अतिरिक्त राजनीतिक ताकत भी मिली। अब शहर के सैकड़ों दुकानदारों की निगाह प्रशासन के अंतिम फैसले पर टिकी है, क्योंकि यह केवल किराए का सवाल नहीं बल्कि हजारों परिवारों की रोजी-रोटी से जुड़ा हुआ मामला बन गया है।

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