नीरज सिसौदिया, बरेली
उत्तर प्रदेश की राजनीति में जहां अक्सर जातीय समीकरण और परंपरागत मुद्दे चुनावी रणनीति तय करते हैं, वहीं बरेली शहर विधानसभा सीट पर इस बार एक अलग तरह की चर्चा जोर पकड़ रही है। यह चर्चा है शिक्षा, समाजसेवा और जमीनी जुड़ाव की और इस चर्चा के केंद्र में हैं समाजवादी पार्टी के प्रदेश सचिव मोहम्मद कलीमुद्दीन, जिन्हें इस बार भी सपा का प्रबल दावेदार माना जा रहा है।
“लाल-हरे या भगवा रंग से परे, इंसान को इंसान बनाना ही असली सियासत है”, इस सोच के साथ आगे बढ़ने वाले कलीमुद्दीन की राजनीति की नींव किसी परंपरागत राजनीतिक मंच पर नहीं, बल्कि क्लासरूम में रखी गई। यही वजह है कि उनकी पहचान एक नेता से पहले एक शिक्षक और समाजसेवी की है। इस बार मोहम्मद कलीमुद्दीन का सबसे बड़ा एजेंडा शिक्षा के क्षेत्र में “क्रांतिकारी बदलाव” लाना है। उनका मानना है कि जब तक शिक्षा मजबूत नहीं होगी, तब तक समाज और राजनीति दोनों में सकारात्मक बदलाव संभव नहीं है। वह चाहते हैं कि बरेली शहर में ऐसी व्यवस्था बने, जहां हर बच्चा चाहे वह गरीब हो या अमीर, उच्च गुणवत्ता की शिक्षा प्राप्त कर सके। उनका फोकस सिर्फ स्कूल और कॉलेज तक सीमित नहीं, बल्कि रोजगारपरक शिक्षा और प्रोफेशनल स्किल्स पर भी है, जिससे युवाओं को नौकरी के लिए भटकना न पड़े।
बरेली शहर सीट पर इस बार मुकाबला दिलचस्प होने वाला है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या समाजवादी पार्टी इस बार “एजुकेशन मॉडल” पर दांव लगाएगी? अगर पार्टी मोहम्मद कलीमुद्दीन को उम्मीदवार बनाती है, तो यह केवल एक टिकट नहीं, बल्कि एक संदेश होगा—कि राजनीति में शिक्षा और समाजसेवा को भी प्राथमिकता दी जा रही है।
मोहम्मद कलीमुद्दीन का जन्म नवाबगंज तहसील के एक छोटे से गांव टहा प्यारी नवादा में हुआ। एक किसान परिवार से आने वाले कलीमुद्दीन ने बचपन में ही संसाधनों की कमी और ग्रामीण जीवन की चुनौतियों को करीब से देखा। उनकी शुरुआती पढ़ाई गांव और आसपास के क्षेत्रों में हुई, लेकिन आगे की पढ़ाई के लिए उन्हें बाहर जाना पड़ा। मेडिकल की तैयारी के दौरान उन्हें खुद जिन कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, वही आगे चलकर उनकी सोच की सबसे बड़ी प्रेरणा बनी।
कलीमुद्दीन अक्सर कहते हैं कि “जब तक आप खुद दर्द नहीं झेलते, तब तक किसी और के दर्द को समझ नहीं सकते।” यही समझ उन्हें एक अलग रास्ते पर ले गई।
वर्ष 2013 में राजेंद्र नगर में शुरू हुई “ओमेगा क्लासेस” आज बरेली मंडल में एक अलहदा पहचान बना चुकी है। लेकिन यह केवल एक कोचिंग संस्थान नहीं, बल्कि उन सपनों की प्रयोगशाला है, जहां आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों को भी डॉक्टर बनने का मौका मिलता है। यहां मेडिकल एंट्रेंस की तैयारी कराई जाती है, और कोचिंग की सालाना फीस करीब 72 हजार रुपए है। लेकिन खास बात यह है कि गरीब और होनहार बच्चों से कलीमुद्दीन कोई फीस नहीं लेते। साथ ही कोरोना काल में जिन बच्चों ने अपने माता-पिता को खो दिया उन्हें भी यहां मुफ्त कोचिंग कराई जा रही है।
हर साल करीब 100 से ज्यादा जरूरतमंद बच्चों को नि:शुल्क कोचिंग दी जाती है। इतना ही नहीं, जिन बच्चों के पास रहने और खाने के पैसे नहीं होते, उनके लिए हॉस्टल और भोजन की व्यवस्था भी मुफ्त में कराई जाती है। अब तक सैकड़ों छात्र एमबीबीएस में चयनित हो चुके हैं, जिनमें दर्जनों ऐसे बच्चे हैं जो पूरी तरह मुफ्त कोचिंग पाकर देश के प्रतिष्ठित सरकारी मेडिकल कॉलेजों में पढ़ रहे हैं।
मोहम्मद कलीमुद्दीन का मानना है कि प्रतिभा किसी की जागीर नहीं होती और उसे पैसे के आधार पर नहीं आंका जा सकता। यही वजह है कि उनके यहां गरीब बच्चों के चयन के लिए एक तय प्रक्रिया है-
पहले छात्र की शैक्षणिक क्षमता देखी जाती है, फिर उसके परिवार की आर्थिक स्थिति का सर्वे कराया जाता है। अगर बच्चा होनहार और जरूरतमंद है, तो उसे बिना किसी भेदभाव के मौका दिया जाता है। यहां यह भी खास बात है कि वह धर्म, जाति या क्षेत्र के आधार पर कोई भेदभाव नहीं करते। उनके यहां हिंदू और मुस्लिम, दोनों समुदायों के हजारों बच्चे पढ़ चुके हैं।
अगर आंकड़ों की बात करें तो बरेली शहर क्षेत्र में ही करीब 8 हजार से ज्यादा हिंदू परिवारों और 10 हजार से अधिक मुस्लिम परिवारों के बच्चे उनके संस्थान से जुड़ चुके हैं।
कलीमुद्दीन का मकसद सिर्फ छात्रों को मेडिकल कॉलेज तक पहुंचाना नहीं है, बल्कि उन्हें एक जिम्मेदार नागरिक और संवेदनशील डॉक्टर बनाना भी है। वह अपने छात्रों को हमेशा यह सिखाते हैं कि डॉक्टर होना सिर्फ एक पेशा नहीं, बल्कि एक सामाजिक जिम्मेदारी है। आज जब चिकित्सा क्षेत्र पर व्यवसायिकता के आरोप लगते हैं, ऐसे में उनकी यह सोच अलग पहचान बनाती है। उनके कई छात्र आज एम्स गोरखपुर, एम्स ऋषिकेश, सैफई मेडिकल कॉलेज, लखनऊ और कन्नौज जैसे संस्थानों में पढ़ाई कर रहे हैं और अपने क्षेत्र में नाम कमा रहे हैं।
शिक्षा के साथ-साथ मोहम्मद कलीमुद्दीन समाजसेवा में भी लगातार सक्रिय रहे हैं। उन्होंने “ओमेगा वेलफेयर सोसाइटी” के माध्यम से कई सामाजिक कार्य किए। लॉकडाउन के दौरान जरूरतमंदों को राशन और दवाइयों का वितरण, ठंड में कंबल वितरण और गरीब बेटियों की शादी में सहयोग वह करते रहते हैं। खास बात यह है कि उनकी संस्था न तो सरकारी मदद लेती है और न ही किसी से चंदा। पूरी व्यवस्था समिति के सदस्यों के सहयोग से चलती है।
कलीमुद्दीन की बढ़ती लोकप्रियता और समाज में उनकी स्वीकार्यता ने उन्हें राजनीति की ओर बढ़ने का रास्ता दिया। समाजवादी पार्टी में प्रदेश सचिव के रूप में सक्रिय रहते हुए उन्होंने युवाओं के बीच मजबूत पकड़ बनाई है। अखिलेश यादव को अपना रोल मॉडल मानने वाले कलीमुद्दीन की राजनीति भी विकास, शिक्षा और सामाजिक समरसता के इर्द-गिर्द घूमती है।
बरेली शहर विधानसभा सीट पर उनकी दावेदारी कई कारणों से मजबूत मानी जा रही है। शिक्षा के माध्यम से हर वर्ग में गहरी पकड़, हिंदू-मुस्लिम दोनों समुदायों में स्वीकार्यता, युवाओं में मजबूत नेटवर्क, साफ-सुथरी और समाजसेवी छवि और जमीनी स्तर पर लगातार सक्रियता उनकी खासियत है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर सपा उन्हें टिकट देती है, तो वह इस सीट पर “गेम चेंजर” साबित हो सकते हैं।

बरेली शहर में पहली बार ‘एजुकेशन मॉडल’ की सियासत: शिक्षा से बदलाव का सपना लेकर आए मोहम्मद कलीमुद्दीन, हजारों छात्रों की सफलता से मजबूत हुई पहचान, शिक्षा के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव का है अरमान




